बुधवार, अगस्त 19, 2020

महर्षि जमदग्नि

ब्रह्मा जी के श्रेष्ठ पुत्रों में एक थे महर्षि भृगु जिन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा ली थी। इनकी कई पत्नियां थी जिनमे से एक थी दानवराज पौलोम की पुत्री "पौलोमी"। इन दोनों के एक परम तेजस्वी पुत्र हुए महर्षि च्यवन। च्यवन ने आरुषि नामक कन्या से विवाह किया जिनसे उन्हें और्व नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। और्व के एक पुत्र हुए ऋचीक, जो परम तपस्वी थे। इनका विवाह महाराज गाधि की पुत्री और विश्वामित्र की बहन सत्यवती से हुआ। सत्यवती को प्राप्त करने के लिए ऋचीक ने १००० श्यामकर्ण अश्व महाराज गाधि को भेंट किये थे। कालांतर में इन्ही श्यामकर्ण अश्व को प्राप्त करने के लिए ऋषि गालव ने ययाति कन्या माधवी का विनिमय किया था।

महर्षि ऋचीक के विवाह पर ब्रह्मापुत्र महर्षि भृगु भी पधारे। विवाह के पश्चात वे कुछ समय वे ऋचीक के आश्रम पर ही रुक गए। महर्षि ऋचीक की पत्नी सत्यवती ने उनकी बड़ी मन से सेवा की जिससे महर्षि भृगु बड़े प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा। तब सत्यवती ने कहा - "हे पितामह! अगर आप मुझे कोई वरदान देना चाहते हैं तो कृपया मुझे एक ब्राह्मण पुत्र और मेरी माता को एक क्षत्रिय पुत्र प्राप्त होने का वरदान दीजिये।"

तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को रस के दो पात्र प्रदान किये और कहा - "हे पुत्री! बांयें हाथ पर रखे गए पात्र को तुम अपनी माता को दे देना और दाहिने हाथ में रखे गए पात्र को तुम स्वयं रखना। ऋतुस्नान करने के बाद अपनी माता से कहना कि पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर वो पीपल के वृक्ष का आलिंगन करे और तुम स्वयं वही भावना रखकर गूलर के वृक्ष का आलिंगन करना। उसके बाद अपन-अपने पात्र का रस सावधानी से अलग-अलग पी लेना। इससे तुम्हे ब्राह्मण और तुम्हारी माता को क्षत्रिय पुत्र की प्राप्ति होगी।"

ऐसा सुनकर सत्यवती दोनों पात्र लेकर अपनी माता के पास गयी और उन्हें उनका पात्र देकर महर्षि भृगु का आदेश सुनाया। सत्यवती की माता ने सोचा कि अवश्य ही महर्षि भृगु ने अपनी पुत्रवधु को अधिक श्रेष्ठ पुत्र का आशीर्वाद दिया होगा। ये सोच कर उन्होंने वो दोनों पात्र बदल दिए। उसके इस अनुचित कार्य के कारण सत्यवती ने अपनी माता के पात्र का रस पी लिया। महर्षि भृगु को अपनी योगविद्या से इसका ज्ञान हो गया। तब उन्होंने सत्यवती को बुलाया और कहा - "हे पुत्री! तुम्हारी माता ने छल करके तुम्हे अपना पात्र दे दिया था इसी कारण तुम्हारा पुत्र जन्म से तो ब्राह्मण ही होगा किन्तु कर्म से घोर क्षत्रिय होगा।" ये कहकर महर्षि भृगु सत्यवती की माता को श्राप देने को उद्धत हुए।

तब सत्यवती ने उनसे अपनी माता को क्षमा करने की प्रार्थना की। उसकी ये मातृभक्ति देख कर महर्षि भृगु पुनः प्रसन्न हुए और उनसे पूछा कि वो क्या चाहती है? ये सुनकर सत्यवती ने कहा "हे पितामह! मैंने सदैव एक ब्राह्मण पुत्र की ही कामना की है। अतः मेरी इच्छा है कि मेरा ये पुत्र ब्राह्मण प्रवित्ति का ही हो। आप कृपा कर उसे मिलने वाली क्षत्रिय प्रवृत्ति उसके पुत्र अर्थात मेरे पौत्र में स्थानांतरित कर दें।" महर्षि भृगु ने उसकी ये प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसके पुत्र को मिलने वाले क्षत्रिय गुण उसके होने वाले पौत्र में स्थानांतरित कर दिया।

उनके आशीर्वाद से कुछ समय बाद ही ऋषि ऋचीक और सत्यवती को एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई जो जन्म और कर्म दोनों से ब्राह्मण था। उन दोनों ने उसका नाम जमदग्नि रखा। आज हरियाणा के कैथल जिले में एक गांव है जाजनापुर। ऐसी मान्यता है कि जमदग्नि का जन्म उसी गांव में हुआ था और यही पर उनका आश्रम था। आज भी यहाँ प्रत्येक वर्ष उनके सम्मान में मेला लगता है।

जमदग्नि बचपन से ही बहुत मेधावी थे। केवल १६ वर्ष की आयु में ही उन्होंने वेद वेदांगों का पूर्ण अध्यन कर लिया। इसके अतिरिक्त वे एक श्रेष्ठ योद्धा भी थे और उन्होंने प्रारंभिक शस्त्र विद्या बिना किसी गुरु के, स्वयं अपने परिश्रम से प्राप्त की। बाद में उनकी योग्यता देख कर महर्षि ऋचीक ने आगे की युद्ध शिक्षा के लिए उन्हें उनके मामा विश्वामित्र के पास भेज दिया, जहाँ से वे एक श्रेष्ठ योद्धा बन कर लौटे। ऐसा कहा जाता है कि एक प्राचीन धनुर्विद्या जिसके नाम औषांश था, उसे जमदग्नि और शुक्राचार्य ने मिल कर बहुत दिनों तक जीवित रखा। हालाँकि बाद में वो धनुर्विद्या लुप्त हो गयी।

एक कथा के अनुसार एक बार महर्षि जमदग्नि सूर्यनारायण के ताप के कारण अत्यंत व्याकुल हो गए। उन्होंने पहले सूर्यदेव से अपना ताप कम करने की प्रार्थना की किन्तु जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने सूर्य की ओर १००० बाण छोड़े। ये देख कर सूर्यदेव स्वयं उनके पास आये और उनसे उनकी इच्छा पूछी। तब जमदग्नि ने कहा कि वे चाहते हैं कि उनका (सूर्य का) ताप कम हो जाये। किन्तु सूर्यदेव ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वे अपना ताप तो कम नहीं कर सकते किन्तु उन्हें ऐसी दो वस्तुएं दे सकते हैं जो उनके ताप से रक्षा करने में उनकी सहायता करेगी। तब सूर्यदेव ने जमदग्नि को खड़ाऊ एवं छत्र प्रदान किये। 


युवा होने पर महर्षि ऋचीक ने जमदग्नि का विवाह सूर्यवंश में इक्षवाकु कुल की राजकुमारी रेणुका से करवाया। रेणुका के पिता का नाम प्रसेनजित था और ये श्रीराम के पूर्वज थे। श्रीराम के वंश के बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं। जमदग्नि और रेणुका के पाँच पुत्र हुए - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्ववानस एवं राम। इनके सबसे छोटे पुत्र राम ही आगे चल कर परशुराम के नाम से विख्यात हुए जो श्रीहरि के छठे अवतार थे।

रेणुका एक पतिव्रता स्त्री थी। उनका पतिव्रत ऐसा था कि वे प्रतिदिन नदी किनारे जा कर, गीली मिट्टी के बने घड़े में जल भर कर आश्रम में लाती थी। उनके पतिव्रत धर्म के कारण वो घड़ा कभी टूटता अथवा जल में घुलता नहीं था। एक दिन वो प्रतिदिन की भांति वो नदी से जल भर रही थी कि उसी समय वहां चित्ररथ नामक गन्धर्व अपने रथ पर आये। रेणुका उन्हें देख कर केवल एक क्षण के लिए उनसे प्रभावित हो गयी। ऐसा करते ही उनकी गीली मिट्टी का घड़ा जल में घुल गया। ये देख कर रेणुका बहुत घबरा गयी और आश्रम वापस ना जाकर वही नदी के तट पर बैठ गयी।


जब बहुत समय तक रेणुका आश्रम नहीं आयी तो जमदग्नि ने अपनी दिव्य दृष्टि से सत्य का पता लगा लिया। क्रोध में आकर उन्होंने अपने अपने ज्येष्ठ पुत्र रुक्मवान से अपनी माता की हत्या करने को कहा किन्तु वो मातृहंता बनने को तैयार ना हुआ। तब जमदग्नि ने अपने अन्य पुत्रों से ऐसा ही करने को कहा किन्तु उनमे से कोई भी अपनी माता के वध का साहस ना कर सका। तब जमदग्नि ने उन सभी को चेतनाशून्य हो जाने का श्राप दे दिया। 

अंततः उन्होंने परशुराम से अपनी माता का सर काटने को कहा तो परशुराम ने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता का सर अपने परशु से काट डाला। अपने पुत्र की ऐसी पितृभक्ति देख कर जमदग्नि प्रसन्न हो गए और उन्हें दो वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने कहा कि उनकी माता जीवित हो जाये और उन्हें इस घटना का भान ना रहे और उनके भाई चेत हो जाएँ। तब जमदग्नि ने रेणुका को जीवन दान दिया और अपने अंत पुत्रों को अपने श्राप से मुक्त कर दिया। 

जमदग्नि अपने समय के महान समाज सुधारकों में जाने जाते हैं। उन्होंने ब्राह्मण समाज के कल्याण के लिए बहुत प्रयत्न किया। उन्होंने हैहैयवंशी सम्राट कर्त्यवीर्य से भी मित्रता की जिससे उन्हें समाजिक सुरक्षा भी प्राप्त हुई। उनके मित्र कर्त्यवीर्य की मृत्यु के पश्चात उनका पुत्र अर्जुन सिंहासन पर बैठा। वो महान राजा बना और अपने पिता की ही भांति उसकी मित्रता जमदग्नि से हुई। 

एक बार वो अपनी सेना सहित जमदग्नि के आश्रम आया। तब जमदग्नि ने अपनी गाय कामधेनु की सहायता से सहस्त्रार्जुन एवं उसकी सेना के लिए भोजन की व्यवस्था की। ऐसी अद्भुत गाय को देख कर कर्त्यवीर्य अर्जुन ने उसे अपने लिए माँगा किन्तु जमदग्नि ने मना कर दिया। इसपर सहस्त्रार्जुन बलात कामधेनु को अपने साथ ले गया। जब परशुराम आश्रम आये तो उन्हें जमदग्नि ने सब बताया। इसपर परशुराम ने मार्ग में सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में घोर युद्ध हुआ। दोनों अपने समय के महान योद्धा थे किन्तु अंततः परशुराम ने उस युद्ध में कर्त्यवीर्य अर्जुन का वध कर दिया और कामधेनु को लेकर वापस आश्रम लौटे। 

जब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने ये सुना तो वे प्रतिशोध लेने जमदग्नि के आश्रम पहुँचे। परशुराम को वहाँ ना पाकर उन सबने मिलकर जमदग्नि की हत्या कर दी और वापस लौट गए। अपने पति को मृत देख कर रेणुका ने भी अपने प्राण त्याग दिए। जब परशुराम वापस आये और उन्होंने अपने माता-पिता को मृत देखा तो उन्होंने प्रतिशोधवश पूरे हैहयवंश का नाश कर दिया और उनके रक्त से ही जमदग्नि का तर्पण किया। किन्तु उसपर भी उनका क्रोध ना मिटा तो उन्होंने २१ बार इस पृथ्वी को क्षत्रियों से शून्य कर दिया और सम्यक पंचक में उनके रक्त से पांच सरोवर भर दिए। अंत में महर्षि कश्यप द्वारा ये रक्तपात रोका गया और परशुराम महेंद्र पर्वत पर चले गए।

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