शनिवार, जुलाई 18, 2020

रुद्राक्ष - १: परिचय

रुद्राक्ष हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र वस्तुओं में से एक माना गया है। कहते हैं कि भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने हेतु रुद्राक्ष सबसे सरल माध्यम है क्यूंकि ये स्वयं रूद्र से ही जन्मा है। शिव पुराण और पद्म पुराण में कहा गया है कि रुद्राक्ष धारण करने से अधम से अधम व्यक्ति भी स्वर्ग को प्राप्त होता है। रुद्राक्ष वास्तव में एक वृक्ष का फल होता है। ऐसे वृक्ष हिमालय में सबसे अधिक पाए जाते हैं। उसकेअतिरिक्त नेपाल और इंडोनेशिया में भी रुद्राक्ष के वृक्ष मिलते हैं। भारत में भी रुद्राक्ष के वृक्ष होते हैं किन्तु इनकी लकड़ियों को अंधाधुंध काटने के कारण भारत में ये दुर्लभ वृक्ष विलुप्त होने की कगार पर है।

इसकी उत्पत्ति के विषय में कहा गया है कि जब ब्रह्मा जी ने तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली को त्रिपुर प्रदान किये तो उन्होंने उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया। उनके नाश का एक ही उपाय था कि १००० वर्षों में एक बार वे तीनों त्रिपुर जब एक सीध में आएं तो कोई एक ही प्रहार से उसका नाश कर सके। उनके नाश हेतु सभी देवता महादेव की शरण में गए। तब उन्होंने आश्वासन दिया कि वे अवश्य ही त्रिपुर का नाश करेंगे।

त्रिपुरों के एक सीध में आने की प्रतीक्षा करते हुए महादेव ने १००० वर्षों तक खुली आँखों से तपस्या की। तप समाप्त होने के बाद जब उन्होंने अपनी ऑंखें बंद की तो अश्रु की बूंदें पृथ्वी पर गिर पड़ी। जहाँ-जहाँ ये बूंदें गिरी, वहाँ रुद्राक्ष के वृक्ष ने जन्म लिया। इसी लिए इसका नाम रुद्राक्ष (रूद्र + अक्ष), अर्थात "रूद्र का नेत्र" पड़ा। तत्पश्चात महादेव ने त्रिपुर का संहार किया और त्रिपुरारि कहलाये। एक उद्धरण ये भी आता है कि त्रिपुर के नाश के बाद महादेव अत्यंत द्रवित हो गए और उनके आँखों से अश्रु टपक पड़े जिससे रुद्राक्ष का जन्म हुआ। इसपर एक विस्तृत लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

कई लोग ये मानते हैं कि स्त्रियों को रुद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए किन्तु ऐसा नहीं है। रुद्राक्ष को स्त्री एवं पुरुष दोनों पहन सकते हैं। रुद्राक्ष १ से २१ मुखी तक हो सकते हैं। किन्तु आम तौर पर १ से १४ मुखी रुद्राक्ष उपलब्ध होता है, उनमे से भी पंचमुखी रुद्राक्ष सबसे अधिक मिलता है। इनके अतिरिक्त दो विशेष रुद्राक्ष भी होते हैं जिन्हे गौरी-शंकर रुद्राक्ष और गणेश रुद्राक्ष कहते हैं। जिन रुद्राक्षों में प्राकृतिक छिद्र हो वो सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ऊपर के छिद्र से नीचे के छिद्र तक जितनी लंबवत रेखाएं जाती है वो उसने ही मुख का माना जाता है। रुद्राक्ष के मुख भी अलग-अलग शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

उपनिषदों में कहा गया है कि ब्राह्मण को श्वेत, क्षत्रिय को लाल, वैश्य को पीला और शूद्र को काला रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। हालाँकि अगर आप दूसरे रुद्राक्ष भी धारण करें तो कोई हानि नहीं होती। वैसे तो सभी रुद्राक्ष शुभ फल देने वाले होते हैं किन्तु अगर किसी माला में १ मुखी से लेकर २१ मुखी रुद्राक्ष पिरोये हों तो वो साक्षात् शिव का रूप ही माना जाता है। रुद्राक्ष की ऐसी माला को "इंद्रमाला" कहा जाता है। इंद्रमाला को पाना अत्यंत कठिन होता है क्यूंकि एक साथ सभी प्रकार के रुद्राक्ष दुर्लभ होते हैं। आपको शायद यकीन ना हो किन्तु अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक इंद्रमाला की कीमत करीब ३ करोड़ या उससे भी अधिक होती है। 

वैज्ञानिकों ने भी रुद्राक्ष की महत्ता को माना है। ये सिद्ध हो चुका है कि रुद्राक्ष धारण करने से हृदयघात, रक्तचाप, तनाव और ह्रदय सम्बन्धी रोग नहीं होते। मधुमेह की बीमारी में भी रुद्राक्ष अत्यंत लाभकारी माने गए हैं। पुराणों में कहा गया है कि रुद्राक्ष पहनने से भूत-पिशाच और अन्य नकारात्मक शक्तियां पास नहीं फटकती। जिस व्यक्ति के पास रुद्राक्ष होता है वहाँ तीनों महादेवियाँ (पार्वती, लक्ष्मी एवं सरस्वती) अपना स्थाई निवास बना लेती हैं। वैसे तो पंचाक्षरी मन्त्र "ॐ नमः शिवाय" अपने आप में ही अतिशक्तिशाली होता है किन्तु अगर इसका जाप रुद्राक्ष के साथ किया जाये तो इसका फल असीमित हो जाता है। 

अब प्रश्न ये आता है कि जब रुद्राक्ष इतना शक्तिशाली है तो सभी रुद्राक्ष पहनने वालों को इच्छित फल क्यों नहीं प्राप्त होता? इसके दो मुख्य कारण हैं:
  1. प्रभाव: पहला कारण ये है कि किसी भी व्यक्ति को कोई भी रुद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए। रुद्राक्ष का असर भी वैसा ही होता है जैसा किसी रत्न का। जिस प्रकार कोई रत्न अलग-अलग व्यक्तियों को अलग फल प्रदान करता है, ठीक वैसा रुद्राक्ष के साथ भी होता है। अगर आप दुकानदार से कोई भी रुद्राक्ष खरीद कर पहन रहे हैं तो ये ठीक नहीं। रुद्राक्ष को किसी जानकर से खरीदकर ही पहनना चाहिए। हर रुद्राक्ष का अपना अलग असर होता है। इसीलिए अगर आपको पता नहीं कि कौन सा रुद्राक्ष आपके लिए सही है तो आप पंचमुखी रुद्राक्ष पहन सकते हैं। पंचमुखी रुद्राक्ष सभी को शुभ फल ही प्रदान करता है। 
  2. गुणवत्ता: दूसरा कारण ये है कि वास्तविक रुद्राक्ष मिलना बहुत मुश्किल है। आज आपको बाजार में जितने भी रुद्राक्ष दिखते हैं उनमे से ९९% नकली ही होते हैं। बिहार और उत्तरप्रदेश में एक जहरीला वृक्ष होता है जिसे "भद्राक्ष" कहते हैं। ये हू-बहु रुद्राक्ष की तरह ही दिखता है और यकीन मानिये, अच्छे-अच्छे जानकर लोग रुद्राक्ष और भद्राक्ष में अंतर नहीं बता सकते। यही भद्राक्ष रुद्राक्ष के नाम पर धड़ल्ले से बाजार में बिकता है। बाजार में आपको ९०% पंचमुखी रुद्राक्ष ही मिलेंगे और भद्राक्ष भी ९९% पंचमुखी ही होता है। किन्तु चूँकि ये जहरीला बीज है, इसे पहनने से नुकसान ही होता है। इसीलिए याद रखें, कभी भी किसी भी दुकान से ऐसे ही रुद्राक्ष ना खरीदें। नेपाल में भी ये धांधली आरम्भ हो चुकी है फिर भी वहाँ अभी भी असली रुद्राक्ष अधिक मिलते हैं।
अगले लेख में हम १-१४ मुखी रुद्राक्षों के विषय में बात करेंगे और जानेंगे कि किस रुद्राक्ष को पहनने से आपको क्या लाभ हो सकता है।

...शेष

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर जानकारी।हार्दिक बधाई।
    मैं भी शेयर कर रही हूं।
    धन्यवाद जी

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  2. बेहतरीन जानकारी, मै आपके ब्लॉग का हर पोस्ट पढता हूँ, आपके हर पोस्ट से मुझे अपने हिन्दू धर्म के बारे में कुछ नया और कुछ दिलचस्प जानकारी मिलती है,नीलाभ जी आपका बहुत बहुत धन्यबाद ऐसे गुप्त और ज्ञानवर्धक जानकारी देने के लिए

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    1. आपका बहुत धन्यवाद। कल रुद्राक्ष के प्रकारों के विषय में एक लेख प्रकाशित होगा जिसमे १ से २१ मुखी रुद्राक्षों के विषय में जानकारी दी जाएगी। अवश्य पढ़ें।

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  3. जब भगवान शिवजीले तारकाक्ष अथवा त्रिपुराशुरका युद्यमे बध किया तव भोलेनाथ १००० वर्षोकि युद्धसे थके शीतशैल कहेजानेवाले नेपालके पूरवमे कोशीनदीसे पूर्व एक जगहको आकर थकान मेटने बैठे । अपना तारणहारके सम्मुख सभि देवताओने भोलेनाथको प्रार्थना करके कृतज्ञता ज्ञापन की । देवताओके प्रार्थनासे भगवान भोलेनाथ भावविह्वल हो बैठे और उनके ऑखोसे ऑशुके दो बुॅद धरतीपर गिरे । चुॅकि भगवान उससमय रूद्रावतारमे थे । इसलिए उसबुॅदसे उत्पन्न हुवे बृक्ष एवम् फलको रूद्राक्ष कहा जानेलगा । रूद्राक्षकी उत्पत्ति हुए क्षेत्रको स्कन्ध पुराणके हिमवत्खण्डमे रूद्रात्क्षारण्य बताया गया है ।
    प्रचिन भारतवर्षको १४ अरण्यके रूपमे विभाजन किया गयाथा । पहला नौमिषारण्य एवम् छठा रूद्राक्षारण्य ।
    रूद्राक्ष रूद्रके प्रभावसे उत्पन्न होनेके कारण यह फल संसारके सबसे कठोर फल है । पर ऑशुके प्रभावके कारण इसको स्पर्ष मात्र करनेसे मनुष्यको लाभ प्राप्ति होती है ।
    रूद्राक्षारण्यका केन्द्र हालके नेपालका धरानमे पडता है । वहाॅ रूद्राक्षके प्रधान देवता श्रीपिण्डेश्वर महादेव विराजमान है ।रूद्राक्षको धारण करनेसे पहले श्रीपिण्डेश्वरके शिवलिङ्गमे स्पर्श करानेसे वह रूद्राक्ष सदैव जिवित रहती है ऐसा रूद्राक्षारण्य महात्ममे बतलाया गया है ।

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