गुरुवार, जून 11, 2020

आदि शंकराचार्य - ४: चार मठों की स्थापना

पिछले लेख में हमने आदि शंकराचार्य के जीवन के विषय में जाना। वैसे तो आदि शंकराचार्य ने केवल ३२ वर्ष की आयु में ही अनेक महान कार्य किये किन्तु उनके द्वारा चार दिशाओं में चार मठों, जिसे हम चार धाम के नाम से भी जानते हैं, की स्थापना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। हिन्दू धर्म का समस्त संत समाज इन्ही चारो मठों के अधीन है। जिसे इन चारो मठों में से किसी एक से भी स्वीकृति मिलती है, केवल वही संत माना जा सकता है।

जब शंकराचार्य ने अपनी यात्रा आरम्भ की तो उनके साथ उनके चार प्रमुख शिष्य थे - तोटकाचार्य, हस्तामलक, सुरेश्वर एवं पद्मपाद। ऐसी मान्यता है कि शंकराचार्य ने जिन भी विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त किया था ये चारों उनमे सर्वश्रेष्ठ थे। ये चारो शिष्य चार अलग वर्णों से थे। इन्ही चारो शिष्यों को अदि शंकराचार्य ने इन चार मठों का प्रथम अधिपति बनाया और उन्हें शंकराचार्य की उपाधि प्रदान की। इसी कारण आज भी इन मठों के मठाधीशों को "शंकराचार्य" के नाम से ही जाना जाता है। आइये अब उन चार मठों और उनके अधिपति शिष्यों के विषय में संक्षेप में जानें। 
  1. ज्योतिर्मठ पीठ
    • दिशा: उत्तर 
    • स्थान: जोशीमठ (उत्तराखंड)
    • तीर्थ: बद्रीनाथ
    • स्थापना: २६४५ युधिष्ठिर सम्वत
    • प्रथम शंकराचार्य: तोटकाचार्य - इनका वास्तविक नाम गिरी था जो सदैव शंकराचार्य की सेवा में रत रहते थे। इस कारण वेदाभ्यास में वे कच्चे थे। एक बार अन्य शिष्यों द्वारा परिहास उड़ाने के कारण शंकराचार्य ने इन्हे मानसिक ज्ञान दिया। तब इन्होने टोटक वृत्त की रचना की जिससे इनका नाम तोटकाचार्य पड़ गया। इन्होने केरल के त्रिशूर में "वदक्के मठ" की स्थापना की।
    • वर्तमान शंकराचार्य: स्वामी माधवाश्रम (४४वें)
    • महावाक्य: अयंआत्मानं ब्रह्म।
    • वेद: अथर्ववेद
    • संप्रदाय: नन्दवल
  2. कलिका पीठ
    • दिशा: पश्चिम
    • स्थान: द्वारिका (गुजरात)
    • तीर्थ: द्वारिका प्रभास तीर्थ
    • स्थापना: २६४८ युधिष्ठिर सम्वत
    • प्रथम शंकराचार्य: हस्तामलक - इनसे शंकराचार्य कोल्लूर के श्रीवल्ली ग्राम में मिले। इनके पिता का नाम भास्कर था। उस गांव में २००० परिवार थे और सभी विद्वान और वेद अग्निहोत्र करने वाले। एक दिन भास्कर अपने पुत्र को लेकर शंकराचार्य के पास आये और उनसे कहा कि उनका पुत्र मुर्ख है, कृपया उसे कुछ शिक्षा दें। तब शंकराचार्य ने उस बालक से पूछा कि वो कौन है? इसपर वो बालक, जिसके हाथ में "आमलक" (आंवला) था, उसने अद्वैत सिद्धांत के के १२ श्लोक सुना दिए। तब शंकराचार्य ने उसे अपना शिष्य स्वीकारा और उसका नाम हस्तामलक (हाथ में आंवला रखने वाला) रख दिया। इन्होने त्रिशूर में "इडयिल मठ" की स्थापना की।
    • वर्तमान शंकराचार्य: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (७९वें)
    • महावाक्य: तत्त्वमसि।
    • वेद: सामवेद
    • संप्रदाय: कितवल 
  3. शारदा पीठ
    • दिशा: दक्षिण
    • स्थान: श्रृंगेरी, चिकमंगलूर (कर्नाटक)
    • तीर्थ: रामेश्वरम
    • स्थापना: २६४८ युधिष्ठिर सम्वत
    • प्रथम शंकराचार्य: सुरेश्वर - इन्ही का नाम पहले मण्डन मिश्र था जिन्हे शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ में परास्त किया था। इनके विषय में विस्तृत लेख पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इन्होने त्रिशूर में "नाडूविल मठ" की स्थापना की।
    • वर्तमान शंकराचार्य: स्वामी भारती कृष्णतीर्थ (३६वें)
    • महावाक्य: अहं ब्रह्मास्मि। 
    • वेद: यजुर्वेद
    • संप्रदाय: भूरिवल
  4. गोवर्धन पीठ
    • दिशा: पूर्व
    • स्थान: पुरी (उड़ीसा)
    • तीर्थ: पुरी जगन्नाथ
    • स्थापना: २६५५ युधिष्ठिर सम्वत
    • प्रथम शंकराचार्य: पद्मपाद - ये शंकराचार्य के प्रिय शिष्य थे जिन्होंने अद्वैतवाद में गहन शोध किये। इनकी और मण्डन मिश्र की घनिष्ठ मित्रता थी। आदि शंकराचार्य की आज्ञा पर इन्होने ब्रह्मसूत्रभाष्य पर एक शोध लिखा था किन्तु उनके चाचा ने ईर्ष्यावश इसे जला दिया। इन्होने गुरु-शिष्य परंपरा का प्रचार किया। इन्होने त्रिशूर में "थेक्के मठ" की स्थापना की।
    • वर्तमान शंकराचार्य: स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (१४५वें)
    • महावाक्य: प्रज्ञानं ब्रह्म।
    • वेद: ऋग्वेद
    • संप्रदाय: भोगवल
जैसे-जैसे समय बीता, कुछ शंकराचार्य के शिष्यों ने स्वयं अपने मठ बना लिए तथा स्वयं को शंकराचार्य कहने लगे। उनमे से सबसे प्रसिद्ध तमिलनाडु स्थिति काँचीपीठ है। किन्तु केवल इन्ही चार पीठों के मठाधीशों को शंकराचार्य की उपाधि रखने का अधिकार है और अन्य किसी भी मठ को इनसे मान्यता प्राप्त नहीं हुई है। 

इन्ही मठों में से श्रृंगेरी मठ के मठाधीश शंकराचार्य को ही आज के लोग भूल से आदि शंकाचार्य समझ लेते हैं। ये वास्तव में अभिनव शंकराचार्य हैं जिनका जन्म ७८८ ईस्वी में हुआ था किन्तु इनकी मृत्यु ३२ वर्ष की आयु में नहीं अपितु ४५ वर्ष की आयु में कैलाश पर्वत पर हुई थी। जबकि वास्तविक आदि शंकराचार्य का जन्म २५२८ वर्ष पहले ५०८ ईस्वी पूर्व, ५१५९ युधिष्ठिर सम्वत में हुआ था और उनकी मृत्यु ४७४ ईस्वी पूर्व केवल ३२ वर्ष की आयु में केदारनाथ में हुई थी। 

इन चार पीठों के अतिरिक्त आदि शंकराचार्य ने ही दसनामी सम्प्रदाय की स्थापना की थी। चार वैदिक ऋषि इन सम्प्रदायों के इष्ट के रूप में माने जाते हैं। 
  1. गिरि: ऋषि - भृगु 
  2. पर्वत: ऋषि - भृगु
  3. सागर: ऋषि - भृगु 
  4. पुरी: ऋषि - शांडिल्य 
  5. भारती: ऋषि - शांडिल्य 
  6. सरस्वती: ऋषि - शांडिल्य 
  7. वन: ऋषि - कश्यप
  8. अरण्य: ऋषि - कश्यप 
  9. तीर्थ: ऋषि - अवगत
  10. आश्रम: ऋषि - अवगत
अगले और अंतिम लेख में हम आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कुछ ग्रंथों के बारे में जानेंगे और इसके साथ ही इस श्रृंखला को हम समाप्त करेंगे।

4 टिप्‍पणियां:

  1. शोध-विवेचना से परिपूर्ण आलेख, साधुवाद

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  2. नीलाभ जी । आज के समय हम अपनी अमुल्य संस्कृति और संस्कृत को छोड़कर पश्चिमी देश के मार्ग पर चल पड़े हैं। इस बात का दुःख हैं
    जय श्री कृष्ण

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    1. आपका कहना सत्य है, दुखद है पर क्या किया जा सकता है।

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