शुक्रवार, जून 05, 2020

आदि शंकराचार्य - ३: मण्डन मिश्र और भारती

पिछले लेख में आपने वास्तविक शंकराचार्य एवं उनके प्रारंभिक जीवन के विषय में पढ़ा। जब वे युवा हुए तो उनके ज्ञान का प्रकाश पूरे आर्यावर्त में फ़ैल गया। ब्रह्मसूत्रों की जैसी गहन और गूढ़ व्याख्या आदि शंकराचार्य ने की वैसी किसी और ने नहीं की। इसके अतिरिक्त इन्होने सभी उपनिषदों पर गहन शोध किया और उनपर अलग-अलग भाष्य लिखे। इसीलिए कहा जाता है कि सतयुग में मनु, त्रेता में दत्तात्रेय, द्वापर में वेदव्यास और कलियुग में आदि शंकराचार्य का ज्ञान के प्रसार में जो योगदान है वैसा किसी और का नहीं है। इनके विषय में कहा गया है -

अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित्। 
षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्।।

अर्थात: आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्यतथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया।

आदि शंकराचार्य ने केवल १२ वर्ष की आयु तक २५० से अधिक ग्रंथों की रचना कर ली थी। इनका एक विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ है "विवेक चूड़ामणि"। इसी ग्रन्थ का एक सुप्रसिद्ध श्लोक है:

वाक्य ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः

अर्थात: ब्रह्म सत्य है, जीवन मिथ्या है, जीव और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है।

मिथ्या जगत की बात करने के बाद भी आदि शंकराचार्य १२ ज्योतिर्लिंगों, १८ शक्तिपीठों और ४ विष्णुधामों की एक ऐसी महान यात्रा पर निकले जो पूरे आर्यावर्त को एक सूत्र में पिरोने वाला था। भारत, जो सदा से विविधताओं से भरा था उसमे भी अपनी यात्रा पर आदि शंकराचार्य ने हर जगह केवल एक संस्कृत भाषा का प्रयोग किया और ये सिद्ध कर दिया कि इतनी विविधताओं के बाद भी सम्पूर्ण देश एक और अखंड है।

अपने गुरु से योग की शिक्षा और ३ वर्ष के गहन अध्ययन के बाद आदि शंकराचार्य ने उनकी आज्ञा लेकर काशी की यात्रा की। यहाँ पर उन्होंने असंख्य विद्वानों को बात ही बात में परास्त कर दिया। किन्तु उनका जो सर्वाधिक प्रसिद्ध शास्त्रार्थ का वर्णन आता है वो बिहार के मण्डन मिश्र और उससे भी कठिन प्रतियोगिता मण्डन मिश्र की विदुषी पत्नी उभय भारती के साथ आता है। जब उत्तर भारत के सभी बड़े विद्वान शंकराचार्य के हाथों परास्त हुए तो उन्होंने उन्हें चुनौती दी कि वे मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में परास्त कर दिखाएँ। 

तब आदि शंकराचार्य बिहार के "महिषी" नामक स्थान पहुँचे जहाँ मण्डन मिश्र अपनी पत्नी भारती के साथ रहते थे। मण्डन देश के प्रख्यात विद्वान थे और आज तक कोई उन्हें शास्त्रार्थ में परास्त नहीं कर पाया था। गांव में पहुंच कर उन्होंने सबसे मण्डन मिश्र के विषय में पूछा तब लोगों ने बताया कि आप बढ़ते रहें, आपको स्वयं उनके घर का पता चल जाएगा। तब शंकराचार्य घूमते हुए एक ऐसे घर पहुँचे जहाँ एक मैना वेदमंत्रों का पाठ कर रही थी। उसे देख कर शंकराचार्य आश्चर्यचकित रह गए और समझ गए कि यही मण्डन मिश्र का घर है।

वहाँ मण्डन मिश्र और भारती ने उनकी बड़ी आव-भगत की। तब शंकराचार्य ने उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी जिसे मण्डन मिश्र ने हँसते हुए स्वीकार कर लिया। किन्तु निर्णयकर्ता कौन हो? तब शंकराचार्य ने कहा कि आप अपनी पत्नी को निर्णय करने दीजिये कि कौन विजयी हुआ। उनकी ये बात सबने मान ली। फिर एक शुभ तिथि को अनेक विद्वानों के बीच भारती ने निर्णायिका का पद ग्रहण किया और दोनों में शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। आज से पहले किसी भी विद्वान को परास्त करने में शंकराचार्य को अधिक समय नहीं लगा था किन्तु मण्डन मिश्र अद्वितीय थे। 

दोनों को शास्त्रार्थ करते हुए तीन महीने और सोलह दिन का समय बीत गया किन्तु कोई निर्णय नहीं हो पाया। फिर अगले दिन शंकराचार्य को परास्त करने के संकल्प के कारण मण्डन मिश्र को अत्यंत क्रोध आ गया। जब आधे दिन का शास्त्रार्थ हो गया तो भारती अचानक उठ गयी और कहा कि उन्हें एक आवश्यक कार्य है इसीलिए वो थोड़ी देर में वापस आएगी। तब लोगों से कहा कि अगर आप ही चली जाएँगी तो निर्णय कौन करेगा? तब भारती के निर्देश पर दोनों को ताजे पुष्पों की माला पहनाई गयी। फिर भारती ने कहा कि आप चिंता ना करें, निर्णय हो जाएगा।

दोनों का शास्त्रार्थ चलता रहा और जब माधवी संध्या को वापस आयी तब विद्वानों ने पूछा कि इनमे से कौन विजय हुआ। तब भारती ने दोनों को देखा और शंकराचार्य को विजय घोषित किया। तब विद्वानों ने आश्चर्य से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि "क्रोध की अधिकता के कारण मेरे पति की माला के पुष्प सूख गए हैं किन्तु शंकराचार्य के पुष्प अभी तक ताजे हैं। जो व्यक्ति अपने क्रोध को जीत चुका हो वही विजयी कहलाता है।" इस प्रकार तीन महीने सत्रह दिनों के पश्चात शंकराचार्य ने अंततः मण्डन को परास्त कर दिया।

चहुँ ओर भारती के निर्णय की प्रशंसा होने लगी। स्वयं मण्डन मिश्र ने अपनी पत्नी की प्रशंसा की और अपनी हार स्वीकार की। किन्तु भारती ने अपनी पति की हार के बाद स्वयं शंकराचार्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी जिसे शंकराचार्य ने स्वीकार किया। अगले दिन प्रतियोगिता प्रारम्भ हुई और शंकराचार्य ने प्रथम भारती को प्रश्न करने को कहा। तब भारती ने काम कला सम्बन्धी प्रश्न पूछना आरम्भ किया। शंकराचार्य ब्रह्मचारी थे, काम कला के विषय में क्या उत्तर देते। इसपर भारती ने कहा कि उनका ज्ञान अधूरा है। इससे व्यथित होकर उन्होंने भारती से अनुरोध किया कि उन्हें थोड़ा समय दिया जाये। तब भारती ने उन्हें एक वर्ष का समय दिया। 

शंकराचार्य भारती को शास्त्रार्थ में परास्त करने का निर्णय ले चुके थे। घूमते हुए वे कश्मीर पहुंचे जहाँ वहाँ के सम्राट आमरू की मृत्यु हो गयी थी। तब शंकराचार्य परकाया प्रवेश विद्या का प्रयोग किया और मृत आमरू के शरीर में प्रवेश कर गए। राजा जीवित हो उठा और उसके शरीर में रहते हुए शंकराचार्य ने लम्बे समय तक सभी प्रकार की काम क्रीड़ाओं का अनुभव प्राप्त किया। उन्होंने एक कामुक ग्रन्थ "आमरू-शतक" की रचना की जिसमे उन्होंने अपने काम अनुभवों का वर्णन किया। आमरू के शरीर में शंकराचार्य छः मास और बीस दिनों तक रहे।

तब वे भारती के पास आये और शास्त्रार्थ पुनः आरम्भ हुआ। इस बार उन्होंने भारती के काम संबंधी प्रश्नों का ऐसे रस में उत्तर देना आरम्भ किया कि स्वयं भारती को रोमांच हो आया। भारती पतिव्रता थी और इस भय से कि कहीं वो शंकराचार्य के प्रति आकर्षित ना हो जाये, उन्होंने स्वयं अपनी पराजय स्वीकार कर ली। इस प्रकार शंकराचार्य ने भारती को भी शास्त्रार्थ में परास्त कर दिया और पूरे विश्व में अपनी विद्वता का डंका बजा दिया।

शंकराचार्य से परास्त होने के बाद मण्डन मिश्र उनके शिष्य बन गए और "सुरेश्वराचार्य" के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्हे आदि शंकराचार्य ने श्रृंगेरी मठ का प्रथम शंकराचार्य बनाया। वैसे तो आदि शंकराचार्य ने अनेक महान कार्य किये किन्तु उनमे से जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है वो उन चार मठों की स्थापना करना है जिसने वास्तव में पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया। अगले लेख में हम उन्ही चार महान मठों के विषय में जानेंगे। 

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