शनिवार, अप्रैल 04, 2020

ययाति पुत्री माधवी - ३: शोषण

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार गरुड़ और ऋषि गालव श्यामकर्ण अश्व को ढूंढते हुए एक योगिनी शाण्डिली के पास पहुँचे। शाण्डिली ने उनकी सहायता की और उन्हें चक्रवर्ती सम्राट ययाति के पास जाने का सुझाव दिया। दोनों ययाति के पास पहुँचे और उनसे सहायता की मांग की। तब ययाति ने अपनी अद्वितीय सुंदरी कन्या माधवी उन दोनों को प्रदान की ताकि वे उसका विवाह करवा कर श्यामकर्ण अश्व प्राप्त कर सकें। 

माधवी को लेकर गालव और गरुड़ सर्वप्रथम अयोध्या के राजा हर्यश्व के पास पहुँचे। उन्होंने उनसे कहा कि "हे राजन! किसी कार्यवश हमें ८०० श्यामकर्ण अश्व की आवश्यकता है। इसके बदले महाराज ययाति की ये सुन्दर कन्या आपका वरण करेगी। आज संसार में इससे सुन्दर और शीलवती कन्या नहीं है। अतः आप इस श्रेष्ठ कन्या को पत्नी के रूप में वरण करें और हमें ८०० श्यामकर्ण अश्व प्रदान करें।"

राजा हर्यश्व माधवी को देखते ही मुग्ध हो गए। किन्तु उनके पास केवल २०० श्यामकर्ण अश्व थे। ये बात जब उन्होंने ऋषि गालव को बताई तो वे बड़े निराश हुए। तब हर्यश्व ने उन्हें बताया कि काशी के राजा दिवोदास और भोजनगर के राजा उनीशर के पास भी २००-२०० श्यामकर्ण अश्व हैं। किन्तु समस्या ये थी कि अगर माधवी का विवाह हर्यश्व से कर दें फिर अन्य राजाओं को देने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचेगा। तब गालव को एक उपाय सूझा। उन्होंने हर्यश्व से कहा कि वे माधवी को १ वर्ष तक अपनी पत्नी बना कर रखें और पुत्र की प्राप्ति करें। एक वर्ष पश्चात वे वापस उसे लेकर चले जाएंगे। हर्यश्व तुरंत इस बात के लिए तैयार हो गए। 

माधवी ने जब ये सुना तो सन्न रह गयी। उसे इस बात की अपेक्षा नहीं थी किन्तु उसे अपने पिता को वचन दिया था कि गालव जो कुछ भी कहें वो अवश्य करेगी। तब गरुड़ ने भी गालव को ऐसा करने से मना किया और कहा कि कुछ कारण है कि वे उन्हें ऐसा करने से मना कर रहे हैं। किन्तु गालव ने कहा कि इसके बिना वे अपने गुरु को गुरुदक्षिणा नहीं दे पाएंगे। तब गरुड़ उन्हें वहीँ छोड़ कर चले गए। इसके पश्चात गालव ने माधवी को हर्यश्व से विवाह करने को कहा। अपने पिता को दिए वचन के कारण माधवी ने अपना जीवन व्यर्थ कर हर्यश्व से विवाह कर लिया। हर्यश्व को माधवी से वसुमना नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जो महान दानवीर बना। वरदान के कारण प्रसव के बाद माधवी पुनः कन्या हो गयी। 

एक वर्ष पश्चात गालव उन २०० अश्वों को कुछ समय के लिए अयोध्या में ही छोड़ कर माधवी को लेकर काशी पहुंचे। वहाँ २०० अश्वों के बदले उन्होंने राजा दिवोदास के सामने भी वही शर्त रखी। उनकी सहमति के बाद वे माधवी को १ वर्ष के लिए उनके पास छोड़ गए। माधवी से दिवोदास को प्रतर्दन नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जो अद्वितीय शूरवीर योद्धा बना।

इसके बाद गालव माधवी को लेकर भोजराज उनीशर के पास पहुँचे और उनके २०० अश्वों के बदले भी उनके सामने वही प्रस्ताव रखा। उनीशर माधवी जैसी सुंदरी को अपनी पत्नी बनाने का मोह छोड़ नहीं पाए और १ वर्ष के लिए उससे विवाह कर लिया। उनीशर को माधवी से शिबि नामक महान सत्यपरायण पुत्र की प्राप्ति हुई। ये वही शिबि थे जिन्होंने कबूतर के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं का माँस पड़ले पर रख दिया था। 

१ वर्ष पश्चात गालव पुनः माधवी को लेकर शेष २०० श्यामकर्ण अश्व की खोज में निकले। तब उनकी मुलाकात पुनः अपने मित्र गरुड़ से हुई। गालव ने उन्हें बताया कि वे बड़े दिनों से शेष अश्वों की खोज में भटक रहे हैं किन्तु उन्हें वैसे अश्व नहीं मिल रहे। तब गरुड़ ने हँसते हुए कहा "अब ऐसे अश्व पृथ्वी पर किसी के पास नहीं हैं। पूर्वकाल में ऋषिक मुनि महाराज गाधि की पुत्री सत्यवती से विवाह के बदले उन्हें १००० श्यामकर्ण अश्व दिए। महाराज गाधि ने सभी अश्व यज्ञ कर ब्राह्मणों को दान दे दिए। वापस लौटते समय हर्यश्व, दिवोदास और उनीशर के पूर्वजों ने उनसे २००-२०० अश्व खरीद लिए। बांकी ४०० अश्वों को लेकर ब्राह्मण जब वितस्ता नदी पार कर रहे थे तो सभी ४०० घोड़े बह गए। मैं ये बात जनता था इसीलिए आपको ऐसा अधर्म करने से रोक रहा था। अब देखिये, माधवी के साथ इतना अधर्म करने के बाद भी आप अपने गुरु को पूरी गुरुदक्षिणा नहीं दे सकते।"

तब गालव ने गरुड़ से ही उपाय पूछा। गरुड़ ने कहा कि वे अपने गुरु से ही प्रार्थना करें। ये सुनकर गालव माधवी और अश्वों को लेकर विश्वामित्र के पास पहुंचे और उनसे कहा - "हे गुरुवर! ययाति की इस सुदर्शन कन्या के कारण मैंने ६०० अश्व तो प्राप्त कर लिए किन्तु इनके अतिरिक्त अब ऐसे अश्व कही है ही नहीं। अतः आप शेष २०० अश्वों के बदले १ वर्ष के लिए इस कन्या को स्वीकार करें।"

विश्वामित्र महाज्ञानी थे किन्तु जिस प्रकार मेनका के सौंदर्य ने उनकी तपस्या भंग की थी, उसी प्रकार माधवी के सौंदर्य ने उनका संयम भंग कर दिया और वे गालव की बात मान ली। माधवी से विश्वामित्र को अष्टक नामक महान तपस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई जो आगे चल कर विश्वामित्र के राज्य और अपनी माता के शुल्क में प्राप्त उन ६०० दुर्लभ अश्वों का भी स्वामी हुआ। 

गालव की प्रार्थना का अनुमोदन गरुड़ ने भी किया। विश्वामित्र ने अपने प्रिय शिष्य की प्रार्थना स्वीकार कर ली और माधवी के संयोग से अन्य राजाओं की भाँति उन्होंने भी एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति की, जो कालान्तर में अष्टक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बड़ा होने पर विश्वामित्र की अनुमति से अष्टक ने उनकी राजधानी का सारा कार्य-भार ग्रहण किया और माधवी के शुल्क के रूप में प्राप्त उन छह सौ दुर्लभ श्यामकर्ण अश्वों का भी वही स्वामी हुआ।

१ वर्ष के पश्चात गालव शर्त के अनुसार माधवी को लेकर पुनः ययाति के पास पहुँचे। जब ययाति ने सारी कथा सुनी तो बड़े क्षुब्द हुए। किन्तु वरदान के कारण माधवी पुनः कन्या हो चुकी थी और उसके सौंदर्य में लेश मात्र भी अंतर नहीं आया था। यही सोच कर ययाति ने माधवी का स्वयंवर करने का निश्चय किया। किन्तु तब तक माधवी इतनी विरक्त और दुखी हो चुकी थी कि उसने विवाह करने से मना कर दिया और पिता से वनगमन की आज्ञा मांगी। फिर माधवी ने अपना सारा जीवन वन में ही बिताया और वहीँ तप करते हुए अपने जीवन का अंत कर लिया। वास्तव में जैसी पीड़ा माधवी ने भोगी ऐसा कोई और उदाहरण नहीं मिलता।

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