मंगलवार, मार्च 31, 2020

ययाति पुत्री माधवी - २: ययाति का दान और शर्त

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि महर्षि विश्वामित्र के शिष्य गालव उन्हें गुरु दक्षिणा देने की जिद की जिससे तंग आकर विश्वामित्र ने उनसे ८०० श्यामकर्ण अश्व मांग लिए। गालव बहुत काल तक ऐसे अश्व ढूंढते रहे किन्तु ना मिलने पर उन्होंने भगवान विष्णु की तपस्या की। अंततः तंग आकर वे आत्महत्या करना ही चाहते थे कि नारायण की प्रेरणा पर गरुड़, जो कि गालव के मित्र थे, उनके पास पहुँचे। अपने मित्र गरुड़ को अपने समक्ष पाकर गालव को बड़ा संतोष हुआ। गरुड़ ने उनसे कहा कि वो अकेले इतने श्यामकर्ण अश्व नहीं खोज सकते। उनकी गति अत्यंत तीव्र है और वे उन अश्वों को खोजने में उनकी सहायता करेंगे। तब गरुड़ गालव को अपनी पीठ पर बिठाकर पूर्व दिशा की ओर बढे। उड़ते-उड़ते वे दोनों ऋषभ पर्वत पहुँचे जहाँ उनकी भेंट शाण्डिली नामक योगिनी से हुई। वहीं पर दोनों को शाण्डिली ने भोजन करवाया और तत्पश्चात दोनों गहरी नींद में सो गए।

जब दोनों उठे तो गरुड़ ने देखा कि उनके दोनों पंख गायब हैं। ये देखकर दोनों बड़े घबराये कि अब यहाँ से कैसे जाएंगे। जब उन्होंने शाण्डिली से इस विषय में पूछा तो उसने कहा कि अवश्य ही गरूड ने मेरे अहित सोचा होगा तभी उसके पंख झड़ गए। तब गरुड़ ने क्षमा-याचना करते हुए कहा - "हे माता! मैंने तो केवल इतना सोचा था कि आप जैसी तपस्विनी को ब्रह्मदेव या महादेव के पास छोड़ आऊं। अगर अनजाने में मुझसे कोई अपराध हुआ हो तो मुझे क्षमा करें और मेरे पंख वापस कर दें।"

तब शाण्डिली ने गरुड़ के पंख लौटा दिए। उसकी चमत्कारिक शक्ति देख कर गालव को लगा कि उसी से सहायता मांगनी चाहिए। उन्होंने उनसे अपनी विपदा कही और पूछा कि अब उन्हें क्या करना चाहिए? तब शाण्डिली ने उन दोनों को उन नरेशों के बारे में बताया जिनके पास श्यामकर्ण अश्व हैं। किन्तु समस्या ये थी कि उसे खरीदने के लिए अथाह धन की आवश्यकता थी। तब शाण्डिली ने उन्हें धन का दान माँगने आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट ययाति के पास जाने को कहा। शाण्डिली को प्रणाम कर दोनों तत्काल नहुष पुत्र ययाति के पास पहुंचे और उनसे अपनी समस्या कही।

ययाति चक्रवर्ती सम्राट थे और अपार धन सम्पदा के स्वामी थे।  गरुड़ ने उनसे कहा कि अगर वे उनकी सहायता कर दें तो वे ८०० क्या संसार के समस्त श्यामकर्ण अश्व खरीद सकते हैं। तब ययाति ने उन्हें कहा - "हे महर्षि! आप आये तो सही स्थान पर हैं किन्तु ये समय अनुकूल नहीं है। मैं अभी-अभी १०० अश्वमेघ यज्ञ कर उठा हूँ और मेरी समस्त सम्पदा मैंने दान कर दी है। किन्तु मैं किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटता अतः आपकी भी सहायता अवश्य करूँगा।"

ये कहकर ययाति ने अपनी पुत्री माधवी को बुलाया। जब गालव और गरुड़ ने उसे देखा तो उनकी ऑंखें चौंधिया गयी। ऐसा अद्वितीय सौंदर्य उन्होंने कहीं और नहीं देखा था। तब ययाति ने कहा - "हे ऋषिवर! ये मेरी प्रिय पुत्री माधवी है। उसे वरदान प्राप्त है कि इसके चार तेजस्वी पुत्र होंगे और प्रत्येक प्रसव के पश्चात ये पुनः कन्या हो जाएगी। मैं भी इसके लिए सुयोग्य वर ढूंढ रहा था। आप इसे ले जाइये और इसका कन्यादान कर जितने चाहे श्यामकर्ण अश्व ले आइये। इसका सौंदर्य ऐसा है कि पृथ्वी का कोई राजा क्या, स्वयं देवराज इंद्र इसके लिए स्वर्गलोक छोड़ सकते हैं। किन्तु जैसे ही आपका कार्य हो जाये, आप इसे पुनः मेरे पास छोड़ जाएँ।"

गरुड़ और गालव ने ययाति का हार्दिक आभार माना और माधवी को लेकर अपने साथ चले। जाते हुए ययाति ने माधवी से कहा - "हे पुत्री! मैं जानता हूँ कि तुम चार तेजस्वी पुत्रों की माता बनोगी। ऋषि का वरदान कभी झूठा नहीं होता। मैं तुम्हे ऋषि गालव के सुपुर्द कर रहा हूँ। आज से वही तुम्हारे पालक हैं इसीलिए वे जो भी आज्ञा दें, उसे निःसंकोच पूर्ण करना क्यूंकि ऐसा ना करने पर तुम्हारे पिता का अपमान होगा।" तब माधवी ने उन्हें वचन दिया कि वे वही करेगी जो गालव उसे कहेंगे। गालव ने भी उन्हें वचन दिया कि कार्य की समाप्ति पर वे माधवी को उनके पास छोड़ देंगे। फिर तीनों ने ययाति से विदा ली। माधवी का अपने पिता को दिया ये वचन उनके पूरे भविष्य को बदलने वाला था क्यूंकि उसके साथ कुछ ऐसा होने वाला था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था।

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