गुरुवार, मार्च 26, 2020

ययाति पुत्री माधवी - १: ऋषि गालव का हठ

हमारे धर्मग्रंथों में ऐसी कई स्त्रियाँ हैं जिन्हे अपने जीवन में बड़े कष्ट झेलने पड़े किन्तु कुछ स्त्रियाँ ऐसी हैं जिन्हे इतना कुछ झेलना पड़ा जिसे सुनकर हम विश्वास भी नहीं कर सकते कि ऐसा कुछ हो सकता है। ऐसी ही एक कथा चक्रवर्ती सम्राट ययाति की पुत्री माधवी की है। कई जगह उसका नाम वृषदवती बताया गया है। उसके साथ जो हुआ वो कदाचित हम सोच भी नहीं सकते किन्तु अपने पिता के मान के लिए उसने सब सहा।

ऋषि गालव महर्षि विश्वामित्र के प्रिय शिष्य थे। एक बार विश्वामित्र तपस्या कर रहे थे तब उन्होंने अपने शिष्य गालव से कहा कि जब तक वे तपस्या पूरी ना कर लें, वे उनकी सेवा में रहें। उसी समय उनकी परीक्षा लेने धर्मराज उनके समक्ष पहुँचे और उनसे भोजन माँगा। जब महर्षि विश्वामित्र भोजन तैयार कर उनके पास पहुँचे तो धर्मराज ने कहा कि तुम्हे आने में विलम्ब हो गया है इसीलिए अभी मुझे जाना होगा। जब तक मैं लौट कर ना आऊं, तुम इसी प्रकार भोजन पकडे खड़े रहो। 

तब महर्षि विश्वामित्र उस भोजन को पकडे उसी प्रकार खड़े हुए उनकी प्रतीक्षा करते रहे। इस प्रकार १०० वर्ष बीत गए। तत्पश्चात धर्मराज वहाँ आये और कहा कि मैं ठंडा भोजन किस प्रकार खाऊं? तब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से उस भोजन को गर्म और ताजा कर दिया और धर्मराज से प्रार्थना की कि अब उसे ग्रहण करें। उनकी इस निष्ठा से धर्मराज अति प्रसन्न हुए और उन्हें ब्रह्मर्षि पद पाने का वरदान देकर वे अपने लोक चले गए। विश्वामित्र के साथ ऋषि गालव ने भी खड़े रहकर १०० वर्षों तक उनकी सेवा की थी इसी कारण विश्वामित्र ने उन्हें अनेकानेक आशीर्वाद दिए और कहा कि उनकी शिक्षा पूर्ण हो चुकी है अतः वे अब गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर सकते हैं।

तब गालव ऋषि ने कहा कि वे बिना गुरुदक्षिणा दिए किस प्रकार जा सकते हैं? गालव बहुत ही निर्धन थे। भोजन तक की व्यवस्था यदा-कदा ही हो पाती थी। विश्वामित्र उनकी दशा से अवगत थे इसी कारण उन्होंने कहा कि गुरुदक्षिणा की आवश्यकता नहीं है। किन्तु गालव ऋषि बार-बार उनसे गुरुदक्षिणा माँगने का अनुरोध करने लगे। जब विश्वामित्र के बार-बार मना करने पर भी गालव ऋषि अड़े रहे तब विश्वामित्र ने खीज कर कहा - "रे मूढ़! तू मेरे बार-बार मना करने पर भी हठ कर रहा है तो जा मुझे ८०० ऐसे अश्व लाकर दे जिनका शरीर तो हिम की भांति श्वेत हो किन्तु कर्ण काले हों।"

अपने गुरु की ऐसी अद्भुत गुरुदक्षिणा सुनकर गालव आश्चर्यचकित रह गए किन्तु वे तनिक भी विचलित नहीं हुए और गुरुदक्षिणा देने के लिए विश्वामित्र से थोड़ा समय माँगा, जो उन्होंने दे दिया। आज्ञा पाकर गालव उन्हें प्रणाम कर वहाँ से चले गए। अब विश्वामित्र पछताए कि उनका शिष्य जो १ साधारण अश्व भी नहीं दे सकता वो ८०० श्यामकर्ण अश्व कहाँ से देगा? किन्तु अब तो उनके मुख से वाणी निकल चुकी थी अतः उसे प्रारब्ध मान कर वे प्रतीक्षा करने लगे।

गालव ने समय तो माँग लिया किन्तु ऐसे अद्भुत अश्व वे लाएं कहाँ से? उन्हें तो ये भी नहीं पता था कि ऐसे विचित्र अश्व पृथ्वी पर होते भी हैं या नहीं? भला ऐसा कैसे संभव था कि किसी अश्व का पूरा शरीर तो श्वेत हो किन्तु कान काले हों? उस प्रकार के अश्व को ढूंढते हुए गालव बहुत काल तक पृथ्वी पर भटकते रहे किन्तु वैसे अश्व उन्हें कही नहीं मिले। अब वे भी निराश हो गए कि ऐसा एक भी अश्व अभी तक उन्हें नहीं मिला तो वे ८०० अश्व कहाँ से लाएंगे? अंत में उन्होंने सोचा कि ऐसी विपत्ति से श्रीहरि ही उनकी सहायता कर सकते हैं इसीलिए वे नारायण की तपस्या करने लगे।

किन्तु बहुत काल तक तपस्या करने पर भी श्रीहरि ने उन्हें दर्शन नहीं दिए। अब गालव बड़े निराश हो गए। उन्होंने सोचा कि बिना श्रीहरि की कृपा के ऐसे अश्व पाना संभव नहीं है और बिना अश्वों के वे किस मुख से अपने गुरु के पास जाएँ? इसी लिए वे आत्महत्या के लिए तत्पर हो गए। अपने भक्त को आत्महत्या करते देख श्रीहरि ने तत्काल गरुड़ को उनकी सहायता के लिए भेजा। नारायण के आदेश पर गरुड़ तत्काल वहाँ पहुँचे और गालव को प्राण त्यागने से रोका। गरुड़ और गालव पुराने मित्र भी थे इसीलिए गरुड़ ने उनकी हर संभव सहायता का वचन दिया। उनके ऐसा कहने पर गालव ऋषि के प्राण लौटे।

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