रविवार, मार्च 01, 2020

वैद्यराज चरक - २: चरक संहिता

पिछले लेख में आपने वैद्यराज चरक का जीवन परिचय पढ़ा। कुछ विद्वान संसार को कुछ ऐसा दे कर जाते हैं जिससे वे सदा के लिए इतिहास में अमर हो जाते हैं। जैसे महर्षि वाल्मीकि रामायण, वेदव्यास महाभारत और तुलसीदास रामचरितमानस के लिए जाने जाते हैं। उसी प्रकार वैद्यराज चरक ने एक ऐसे महान ग्रन्थ की रचना की जिससे वे इतिहास में अमर हो गए। वो ग्रन्थ है "चरक संहिता"

आयुर्वेद में तीन सबसे प्रमुख नाम हैं - "चरक", "सुश्रुत" एवं "वाग्भट्ट" जिन्होंने क्रमशः "चरक संहिता", "सुश्रुत संहिता" और "अष्टांग संग्रह" नामक महान ग्रंथों की रचना की है। ये तीन ग्रन्थ आज भी आयुर्वेद के आधार माने जाते हैं। इन तीनों ग्रंथों में चरक संहिता और सुश्रुत संहिता समकालीन मानी जाती है पर अधिकतर स्थान पर चरक संहिता को सुश्रत संहिता से अधिक प्राचीन बताया गया है। अष्टांग संग्रह अपेक्षाकृत आधुनिक है। जो सूत्र चरक ने बताये थे वे सहस्त्रों वर्षों के पश्चात आज भी आयुर्वेद का आधार बने हुए हैं। 

हालाँकि चरक संहिता भी मूल ग्रन्थ नहीं है। सबसे पहले महर्षि अत्रि के पुत्र पुनर्वसु ने चिकित्साशास्त्र के ज्ञान अपनी वाणी से उच्चरित किया। पनर्वसुः के कई शिष्य थे किन्तु उनके सबसे प्रतिभावान शिष्य का नाम था ऋषि अग्निवेश। उन्होंने ही पुनर्वसु द्वारा दिए गए ज्ञान को लिपिबद्ध किया जिसे आज "अग्निवेशतन्त्र संहिता" के नाम से जाना जाता है। जैसे-जैसे समय बीता, कई विद्वानों को इस ग्रन्थ में समय के अनुकूल संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई। तब चरक ने इसमें आवश्यक संशोधन किया और इसे ही चरक संहिता के नाम से जाना गया। 

इसमें चरक ने जो एक सूत्र की रचना की वो आज भी आयुर्वेद का आधार है। चरक ने बताया कि मनुष्य के शरीर में जितने भी रोग उत्पन्न होते हैं वो केवल शरीर के तीन पदार्थों के कारण होती है। ये हैं - वात, पित्त एवं कफ। यह दोष तब उत्पन्न होते है जब रक्त, मांस और मज्जा खाए हुए भोजन पर प्रतिक्रिया करती है। ये औषधिशास्त्र में एक क्रन्तिकारी अन्वेषण था जिसने आयुर्वेद की दिशा और दशा बदल दी। इन तीनों दोषों को संतुलित करने के लिए इन्होने कई औषधियां बनाई। आज आधुनिक काल में भी आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ को ही सभी रोगों का मूल माना जाता है और औषधियां भी उसी प्रकार से बनाई जाती है।

चरक का ये भी मानना था कि रोगों को समझने से पहले वैद्य को मानव शरीर को समझना पड़ेगा। जो वैद्य ये नहीं जनता कि मानव का शरीर वास्तव में कार्य कैसे करता है, वो कभी भी रोगों का समूल निदान नहीं कर सकता। इसीलिए उन्होंने अपने जीवन का बड़ा भाग मानव शरीर को समझने में लगाया। इसके अतिरिक्त उन्होंने "हित-भुक", "मित-भुक" एवं "ऋत-भुक" की अवधारणा रखी। अर्थात जो व्यक्ति शरीर को पोषित करने वाला भोजन करे, भूख से कम भोजन करे और ऋतु के अनुसार फल और भोजन का सेवन करे तो वो कभी रोगी नहीं हो सकता। उनके इस विचार ने औषधि विज्ञान में क्रांति ला दी।

ऐसी असंख्य चीजों का समावेश उन्होंने चरक संहिता में किया है। चरक संहिता को ८ भागों, जिन्हे "स्थान" कहा गया है, में विभाजित किया और इसमें कुल १२० अध्याय और १२००० श्लोक हैं। ये स्थान हैं:
  1. सूत्रस्थानम् (३० अध्याय): इसे आज चिकित्सा विज्ञान में सामान्य नियम (General Principles) कहा जाता है। इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों का वर्णन है। 
  2. निदानस्थानम् (८ अध्याय): इसे आज हम विकृति विज्ञान (Pathology) के नाम से जानते हैं। इसमें रोगों का निदान कैसे किया जाये उसका विस्तृत वर्णन है। इसमें रोगों के लिए "निदान पंचक" अर्थात पांच विषयों का विस्तृत वर्णन है। 
  3. विमानस्थानम् (८ अध्याय): इसे चिकित्साशास्त्र में निश्चित निर्धारण (Specific determination) के नाम से जाना जाता है। इसमें शरीर के विभिन्न रसों और रोगों के स्रोत के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है।
  4. शारीरस्थानम् (८ अध्याय): इसे आज हम शरीर रचना (Anatomy) के रूप में जानते हैं। जैसा कि चरक का मानना था कि बिना शरीर को समझे रोग का निदान नहीं हो सकता है, इसीलिए उन्होंने विशेषरूप से इस भाग की रचना की। इसमें शरीर के हर भाग और मानव शरीर कैसे काम करता है, इसकी जानकारी दी गयी है। 
  5. इन्द्रियस्थानम् (१२ अध्याय): इसे आज हम इंद्री संवेदन रोग निदान (Sensory organ based prognosis) के रूप में जाना जाता है। इसमें विस्तार पूर्वक शरीर की इन्द्रियों और अंगों के बारे में बताया गया है।
  6. चिकित्सास्थानम् (३० अध्याय): आधुनिक काल में इसे हम मूल चिकित्सा शास्त्र (Therapeutics) कहते हैं। इसमें रसायन, गुप्तरोग एवं ज्वर चिकित्सा के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है। 
  7. कल्पस्थानम् (१२ अध्याय): इसे हम औषधि बनाने की विद्या (Pharmaceutics and toxicology) के नाम से जानते हैं। इसमें औषधि बनाने की विद्या और शल्य चिकित्सा के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है।
  8. सिद्धिस्थानम् (१२ अध्याय): इसे उपचार सफलता (Success in treatment) के नाम से जाना जाता है जिसमें सभी विषयों का निचोड़ है।
इस प्रकार आप देख सकते हैं कि सहस्त्रों वर्षों पूर्व जो सूत्र चरक ने प्रदान किये थे वो आज आधुनिक काल में भी चिकित्सा शास्त्र के स्तम्भ हैं। कदाचित इसी कारण चरक और चरक संहिता का महत्त्व इतना अधिक है। इसके अतिरिक्त चरक संहिता में स्वप्न फल का भी विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। 

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