गुरुवार, जनवरी 30, 2020

जब देवताओं ने देवी सरस्वती को गिरवी रखा

आप सभी को वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें। वैसे तो वसंत पंचमी पर हमने पहले ही लेख डाल रखा है और माता सरस्वती, लक्ष्मी एवं गंगा विवाद पर भी एक लेख पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इस लेख में हम आपको एक ऐसी कथा के बारे में बताने वाले हैं जिसके बारे में बहुत कम लोगों को मालूम है। एक ऐसी घटना जब देवताओं ने माता सरस्वती का विनिमय किया।

ये कथा आरम्भ होती है सोमरस की खोज से। ऐसा वर्णन है कि सोमरस की खोज सर्वप्रथम गंधर्वों ने किया था। गन्धर्व केवल नृत्य और गायन में ही श्रेष्ठ नहीं थे अपितु वे औषधिशास्त्र में भी निपुण होते थे। उन्होंने ने ही सोमरस के विज्ञानं की खोज की और उसका निर्माण किया। आम तौर पर लोग मदिरा को ही सोमरस मान लेते हैं किन्तु दोनों बिलकुल अलग-अलग चीजें हैं। सोमरस के पान से अतुल बल की प्राप्ति होती है। ब्रह्मदेव ने अश्वनीकुमारों को सोमरस की प्राप्ति का वरदान भी दिया था। 

जब देवताओं को इस विषय में पता चला तो उन्होंने सोचा कि सोमरस के जैसी दुर्लभ वस्तु तो देवताओं के पास होनी चाहिए। हालाँकि गंधर्वों के राजा गंधर्वराज चित्रसेन थे किन्तु  गन्धर्व उपदेवता की श्रेणी में आते थे और देवताओं के समान देवराज इंद्र का उनपर शासन था। सोमरस की प्राप्ति के लिए देवराज इंद्र ने चित्रसेन और गंधर्वों के पास सूचना भिजवाई की वे सोम को देवताओं को सौंप दे। किन्तु सोम पूर्ण रूप से गंधर्वों की संपत्ति थी इसीलिए उन्होंने इंद्र को सोमरस देने से मना कर दिया। 

गन्धर्व भी देवता ही थे इसी कारण देवता उनसे युद्ध तो नहीं कर सकते थे। किन्तु उन्हें सोमरस चाहिए ही था। इसीलिए वे सभी परमपिता ब्रह्मा के पास गए और उनसे इस विषय में हस्तक्षेप करने को कहा। किन्तु ब्रह्मदेव ने ये कहते हुए देवताओं की सहायता करने से मना कर दिया कि सोम गंधर्वों की संपत्ति है और उन्हें पूर्ण अधिकार है कि उसे किसे दें अथवा ना दें।

अब देवता निराश हुए। उन्होंने सोचा कि बल से इसका कोई हल नहीं निकल सकता अतः युक्ति से ही उसका कोई हल निकलना पड़ेगा। तब सभी देवता माता सरस्वती के शरण में पहुँचे। उन्होंने माता की स्तुति करते हुए कहा - "हे देवी! आप तो वाग्देवी हैं। संसार में जितना भी ज्ञान और बुद्धि है वो आपसे ही जन्मा है। अब आप ही हमें इसका उपाय बताएं कि सोमरस को किस प्रकार गंधर्वों से प्राप्त किया जा सकता है। 

तब उनकी प्रार्थना पर माता सरस्वती ने कहा - "आप सब स्वयं मेरे पास आये हैं इसीलिए मैं आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करुँगी। गन्धर्व स्त्री लोलुप हैं अतः आप लोग मेरे विनमय में सोमरस प्राप्त कर लें।" तब इंद्र ने कहा - "हे माता! ये तो बड़ा महँगा सौदा है। हम सोमरस के लिए आपका त्याग नहीं कर सकते।" इस पर माँ सरस्वती ने कहा - "आप लोग चिंता ना करें। मैं स्वयं गंधर्वों से मुक्त होकर पुनः अपने स्थान पर आ जाउंगी।"

ये सुनकर इन्द्रादि देवता माता सरस्वती को लेकर गंधर्वों के पास गए और उन्होंने कहा कि अगर वे उन्हें सोमरस दे दें तो माँ सरस्वती उनके पास ही रहेंगी।" इसपर चित्रसेन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने सोचा कि जब स्वयं ज्ञान की अधिष्ठात्री हमारे पास आ रही हैं तो संसार में कुछ प्राप्त करना असंभव नहीं है। उनके ज्ञान के प्रभाव से तो वे सोमरस का पुनः निर्माण कर लेंगे। ये सोचकर गंधर्वों ने देवी सरस्वती के बदले सोमरस देवताओं को दे दिया।

अब माता सरस्वती गंधर्वों के पास निवास करने लगी। गन्धर्व उनका बड़ा आदर एवं सत्कार करने लगे। किन्तु जब से वे वहाँ आयी थी उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा था। इस प्रकार १ वर्ष व्यतीत हो गया। उसके बाद अचानक एक दिन माता ने चित्रसेन और सभी गंधर्वों को अपने पास बुलाया। जब वे आ गए तब उन्होंने कहा कि अब वे पुनः अपने स्थान पर जा रही हैं। इसपर गन्धर्व बड़े चिंतित हुए। उन्होंने कहा कि उन्होंने सोमरस के बदले उन्हें प्राप्त किया है फिर वे किस प्रकार वापस जा सकती हैं?

तब माता ने कहा - "प्रिय चित्रसेन! जब मुझे यहाँ लाया गया तो क्या तुमने यहाँ रहने के लिए मेरी अनुमति ली थी?" तब चित्रसेन ने कहा - "माता! आप तो उस समय मौन थी अतः आपकी सहमति कैसे लेते?" इस पर देवी सरस्वती ने कहा - "यहाँ रहने और सोमरस के विनिमय के लिए मैंने अपनी सहमति नहीं दी थी फिर भी तुमलोगों के अनुरोध के कारण मैं इतने दिन यहाँ रही। किन्तु अब मेरा वापस जाने का समय आप गया है।"

अब तो गंधर्वों के दुःख का कोई पार ना रहा। वे रोते हुए बोले - "हे माता! हमारे साथ तो बड़ा छल हो गया। अब ना सोमरस हमारे पास रहा और ना ही आप हमारे पास रही। ऐसा अन्याय आपके रहते कैसे हो सकता है।" ये सुनकर माता ने कहा - "तुम लोगों का कहना सत्य है। किन्तु मैं यहाँ सदा के लिए नहीं रह सकती, अतः मुझे तो जाना ही होगा। किन्तु मैं तुमलोगों को वरदान देती हूँ कि जब भी किसी यज्ञ में सोमरस की आहुति दी जाएगी तब देवताओं के साथ तुम्हे भी उसका बल प्राप्त होगा।"

ये सुनकर गन्धर्व बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने माता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। तब से सोमरस का पान जब भी देवता करते हैं तो उसका बल गंधर्वों को भी प्राप्त होता है। साथ ही यज्ञ में प्रदान करने वाले हविष्य का फल भी माता सरस्वती की कृपा से देवताओं के साथ-साथ गंधर्वों को भी प्राप्त होता है। जय माता सरस्वती।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सोमरस को ऊपलबध पदाथृ मानना ही गलत है।
    तो ये काहानी तो कलपना ही है।

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    1. तो क्या आप पौराणिक कथाओं के प्रमाण चाहते हैं? ये तो संभव नहीं है ना श्रीमान।

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