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जैन धर्म के अनुसार श्री ऋषभनाथ का बल

सामान्यतः तो हम धर्मसंसार में हिन्दू धर्म से सम्बंधित जानकारियाँ ही प्रकाशित करते हैं किन्तु ऐसे कई धर्म हैं जो हिन्दू धर्म से बड़ी निकटता के साथ जुड़े हुए हैं। उनमें से तीन धर्म प्रमुख हैं - जैन, बौद्ध और सिख। वैसे तो विश्व के लगभग सारे धर्म सनातन हिन्दू धर्म से ही निकले हैं या उससे प्रभावित माने जाते हैं किन्तु भारत में इन तीन धर्मों की हिन्दू धर्म के साथ बड़ी महत्ता है। इनमे से भी जैन धर्म भी अत्यंत प्राचीन माना जाता है। कदाचित हिन्दू धर्म के बाद दूसरा सबसे प्राचीन धर्म जिसके प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभनाथ थे।

कुछ समय पहले हमने धर्म संसार में योद्धाओं की श्रेणियों के बारे में एक लेख प्रकाशित किया था जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इसमें आपने अर्धरथी, रथी, अतिरथी, महारथी, अतिमहारथी एवं महामहारथी, इन ६ श्रेणियों के योद्धाओं और उनके बल के बारे में पढ़ा था। ठीक इसी प्रकार जैन धर्म में भी श्री ऋषभदेव के बल के बारे में बताया गया है।

जैन धर्म में कुल ६३ श्लाकापुरुष कहे गए हैं - २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव एवं ९ प्रतिवासुदेव। इनमें से तीर्थंकरों को सर्वोच्च माना गया है। इनकी श्रेणी के अनुसार ही इनके बल के बारे में भी बताया गया है। इस लेख को धर्मसंसार में प्रकाशित करने का कारण ये भी है कि यहाँ आपको अधिकांश नाम ऐसे मिलेंगे जो हिन्दू धर्म से ही लिए गए हैं। हालाँकि उनकी श्रेणियां हिन्दू धर्म से कुछ अलग हैं। जैन धर्म के अनुसार इनके १४ स्तर हैं:
  1. योद्धा: ये जैन धर्म में सभी आरम्भिक श्रेणी है जिनमे ऐसे पुरुष आते हैं जो पूर्ण रूप से युद्ध कुशल हों।
  2. ऋषभ: १२ योद्धाओं की शक्ति के बराबर एक ऋषभ होता है। 
  3. अश्व: १० ऋषभों की शक्ति एक अश्व में होती है। 
  4. महिष: १२ अश्वों की शक्ति के बराबर एक महिष होता है। 
  5. गज: १५ महिष की सम्मलित शक्ति एक गज के बराबर होती है। 
  6. सिंह: एक सिंह ५०० गजों के बराबर होता है। 
  7. अष्टपद: २००० सिंहों की सम्मलित शक्ति एक अष्टपद के समान होती है। 
  8. बलदेव: १०००००० (दस लाख) अष्टपदों की शक्ति एक बलदेव में होती है। ये कुल ९ हैं - अचल, विजय, भद्रा, सुप्रभ, सुदर्शन, नंदीसेन, नंदीमित्र, राम एवं बलराम।
  9. प्रतिवासुदेव: १५००००० (पंद्रह लाख) अष्टपदों या १.५ बलदेव की शक्ति एक प्रतिवासुदेव में होती है। ये वसुदेवों के मुख्य प्रतिद्वंदी होते हैं जिनका वध वासुदेव उनके के चक्र से करते हैं। ये ९ होते हैं - अश्वग्रीव, तारक, नरक, निशुम्भ, मधुकैटभ, प्रह्लाद, बलि, रावण एवं जरासंध।
  10. वासुदेव: बलदेवों की शक्ति एक वासुदेव में होती है। ये भी ९ हैं - त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, नरसिंह, पुण्डरीक, दत्तदेव, लक्ष्मण एवं कृष्ण।
  11. चक्रवर्ती: वसुदेवों की शक्ति एक चक्रवर्ती में होती है। ये कुल १२ हैं - भरत (जैन मान्यता के अनुसार इनसे ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा), सगर, मघवा, सनत्कुमार, शांतिनाथ (ये तीर्थंकर भी हैं), कुंथुनाथ (ये तीर्थंकर भी हैं), अरहनाथ (ये तीर्थंकर भी हैं), सुभौम, पद्मनाभ, हरिसेन, जयसेन एवं ब्रह्मदत्त।
  12. नागराज: १००००० (एक लाख) चक्रवर्तियों की सम्मलित शक्ति नागराज की होती है। 
  13. इंद्र: १०००००० (दस लाख) नागराजों की सम्मलित शक्ति के बराबर इंद्र की शक्ति होती है। 
  14. ऋषभनाथ: जैन धर्म के पहले तीर्थंकर जिनका दूसरा नाम आदिनाथ या ऋषभदेव भी है। ऐसा वर्णन है कि १००००००० (एक करोड़) इन्द्रों की सम्मलित शक्ति केवल इनकी कनिष्ठा अंगुली के बराबर होती है। कहने का अर्थ ये है कि श्री ऋषभनाथ की शक्ति असीमित है। कुछ जगहों पर ये बात सभी तीर्थंकरों के लिए भी कही गयी है। इनकी ऊंचाई १२०० फ़ीट और आयु ८४००००० पूर्व वर्ष बताई गयी है। एक पूर्व वर्ष  ८४००००० x ८४००००० = ७०५६०००००००००० मानव वर्षों का होता है। ये जैन धर्म के सर्वोच्च ईश्वर है जो स्वयं भगवान शंकर के अवतार माने गए हैं। जैन मान्यता के अनुसार ये १०^१६३१ (एक के आगे १६३२ शून्य) वर्ष पूर्व अवतरित हुए थे।

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