बुधवार, जनवरी 08, 2020

रावण का मानमर्दन ३: कर्त्यवीर्य अर्जुन - १

पिछले लेखों में आपने इस श्रृंखला में दैत्यराज बलि और असुरराज शंभर के हाथों रावण की पराजय के विषय में पढ़ा है। कर्त्यवीर्य अर्जुन के विषय में भी आपने पिछले लेख में पढ़ा। इस लेख में रावण और हैहयवंशी महान राजा कर्त्यवीर्य अर्जुन के बीच की प्रतिद्वंदिता के बारे में आप जानेंगे। कर्त्यवीर्य जिसे सहस्तार्जुन के नाम से भी जाना जाता है, के बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं।

अपने दिग्विजय के समय रावण सभी देशों और प्रदेशों को जीतता हुआ नर्मदा तट पर स्थित महिष्मति नगर पहुँचा। वहाँ उस समय हैहयवंशी राजा कर्त्यवीर्य अर्जुन का राज था। वरदान स्वरुप मिले गए अपने १००० भुजाओं के कारण वो सहस्तार्जुन के नाम से भी जाना जाता था। उसने अपनी शक्ति से अपना साम्राज्य हिमालय तक फैला रखा था और संसार में कोई भी ऐसा नहीं था जो उससे युद्ध करने का साहस करता हो। 

उसके राज्य तक पहुँचने के बाद रावण के मन में भगवान रूद्र की पूजा करने का विचार आया और वो वही नर्मदा के तट पर पूजा करने को बैठ गया। उसने वहीँ रेत का एक शिवलिंग स्थापित किया और अपने सेवकों को फल-फूल इत्यादि लाने का आदेश देकर पूजा की तयारी करने लगा। 

वही से कुछ दूर सहस्त्रार्जुन अपने पत्नियों के साथ जल विहार कर रहा था। उसकी पत्नियों ने उससे अनुरोध किया कि वो अपनी शक्ति का प्रदर्शन एक बार उनके समक्ष करे। उनकी इच्छा जानकर सहस्त्रार्जुन ने अपनी १००० भुजाओं से नर्मदा के जल को रोक लिया। उसके ऐसा करने के कारण उसकी भुजाओं की दूसरी ओर नर्मदा का जल तेजी से ऊपर आने लगा और उस बढ़ते जल ने अकस्मात् ही रावण द्वारा बनाये गए शिवलिंग को नष्ट कर दिया।

जब रावण ने ये देखा तो उसके क्रोध की कोई सीमा ना रही। उसने अपने मंत्री को आदेश दिया कि वो जाकर ये पता लगाए कि किसके कारण उसके शिवलिंग का नाश हुआ है। रावण की आज्ञा पर मंत्री आगे गया और उसने एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा जहाँ कर्त्यवीर्य अर्जुन अपनी १००० भुजाओं से नर्मदा के जल को रोके हुए था। तब वो वापस आया और रावण को उस विषय में सूचित किया। 

जब रावण ने ऐसा सुना तो वो भी आश्चर्य में पड़ गया। उसने सोचा कि अगर उसने इतने शक्तिशाली राजा को परास्त कर दिया तो विश्व में उसकी प्रसिद्धि और फैलेगी। ये सोच कर उसने अपने सेनापति प्रहस्त को सहस्त्रार्जुन के पास दूत बना कर भेजा। प्रहस्त की प्रसिद्धि भी बहुत थी इसीलिए जब सहस्त्रार्जुन ने प्रहस्त को दूत बना आया देखा तो उसका स्वागत किया और उससे वहाँ आने का कारण पूछा।

तब प्रहस्त ने कहा - "हे महाराज! मैं प्रहस्त अपने स्वामी लंकापति रावण का दूत बनकर आया हूँ। वे आपसे द्वन्द करना चाहते है। उनका आदेश है कि या तो आप उनसे द्वन्द करें या फिर महिष्मति का राज्य उन्हें सौंप कर स्वयं वन में चले जाएँ। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो अपने पूरे कुटुंब का विनाश देखने को तत्पर रहें। लंकापति रावण ने अपने पराक्रम से स्वयं देवताओं को भी पराजित किया है। अतः मेरा आपको यही सुझाव है कि उनसे युद्ध ना करें और स्वयं ही अपना राज्य उन्हें सौंप दें।"

प्रहस्त की बातें सुनकर कर्त्यवीर्य अर्जुन अट्टहास करते हुए बोला - "हे वीर! तो तुम उस रावण के दूत हो जिसने स्वयं अपने ही बड़े भाई से उसकी नगरी और पुष्पक विमान छीन लिया? सुनने में तो ये भी आया है कि वो वीर निर्बल कन्याओं का हरण करता फिरता है। ज्ञात होता है कि परमपिता ब्रह्मा से वरदान पाकर वो अपने आपको सर्वशक्तिशाली समझने लगा है? सुना है वो दशानन है किन्तु क्या उसकी बीस भुजाओं में इतना बल है कि वो मेरी सहस्त्र भुजाओं का सामना कर सके? अतः उससे जाकर कहो कि ये बालकों का हठ छोड़े और वापस अपने राज्य को लौट जाये।"

तब प्रहस्त ने कहा - "महाराज! कदाचित आपको लंकेश की शक्ति का भान नहीं है। मैं स्वयं उनकी शक्ति का बखान कर उनकी प्रसिद्धि को कम नहीं करना चाहता इसीलिए आपसे पुनः अनुरोध करता हूँ कि अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें। क्यों नाहक अपनी निर्दोष जनता को युद्ध की आग में झोंकना चाहते हैं? राक्षसराज भी ये नरसंहार नहीं चाहते इसी कारण उन्होंने केवल आपसे द्वन्द का प्रस्ताव भेजा है। अब निर्णय आपके हाथ में है।"

तब सहस्त्रार्जुन ने क्रोध में कहा - "हे राक्षस! अगर तुम दूत बनकर ना आये होते तो ऐसा कहने पर मैं तुम्हारा वध कर देता। किन्तु ठीक है, लगता है कि तुम्हारे स्वामी के बल के घमंड को तोड़ना आवश्यक है। तुम जाओ और उसे मेरी ओर से महिष्मती में आमंत्रित करो। मैं एक बार और उसे समझने का प्रयास करूँगा। अगर वो ना माना तो मैं अवश्य ही उससे युद्ध कर उसे काल के पास भेज दूंगा।" ये सुनकर प्रहस्त रावण के पास लौट गया।

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