शनिवार, जनवरी 11, 2020

रावण का मानमर्दन ३: कर्त्यवीर्य अर्जुन - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि रावण अपने दिग्विजय की यात्रा में कर्त्यवीर्य अर्जुन की माहिष्मति नगरी पहुँचता है। वहाँ रावण नर्मदा के तट पर शिवलिंग बना कर पूजा करने लगा। उसी समय सहस्त्रार्जुन ने अपने १००० हाथों से नर्मदा का प्रवाह रोक लिया जिससे रावण का बनाया शिवलिंग खंडित हो गया। इससे क्रुद्ध होकर रावण ने सहस्त्रार्जुन को युद्ध की चुनौती दी। तब उसने रावण को अपने नगर आने का आमंत्रण दिया।

कर्त्यवीर्य अर्जुन के आमंत्रण पर रावण ने माहिष्मति नगर में प्रवेश किया। उसका तेज देखते ही बनता था। सहस्त्रार्जुन ने रावण का स्वागत किया और उसे अपने साथ अपने सिंहासन पर बिठाया। आथित्य सत्कार के बाद सहस्त्रार्जुन ने रावण को एक बार फिर समझाया कि बिना किसी कारण युद्ध करने का कोई औचित्य नहीं है किन्तु रावण उस समय वीररस में डूबा हुआ था। उसने सहस्त्रार्जुन का शांति प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और उसे पुनः युद्ध की चुनौती दी।

कर्त्यवीर्य अर्जुन भी क्षत्रिय था। युद्ध का आह्वान अस्वीकार नहीं कर सकता था। उसने भी रावण के द्वन्द का आमंत्रण स्वीकार कर लिया। अगले दिन दोनों वीर राजकीय समरांगण में मिले। दोनों महान योद्धा जब पूर्ण वीर रूप में एक दूसरे के समक्ष आये तो ऐसा लगा जैसे अगर दोनों साथ-साथ लड़ें तो त्रिलोक को जीत ले। जब युद्ध का समय आया तो दोनों ने एक दूसरे को अंतिम चेतावनी दी। 

कर्त्यवीर्य ने कहा - "हे वीर! तुम्हारी वीरता पर मुझे कोई संदेह नहीं है किन्तु फिर भी मैं तुम्हे एक अंतिम अवसर दे रहा हूँ। यहाँ से मेरा आथित्य ग्रहण कर वापस लंका लौट जाओ और शांति से शासन करो। क्यों व्यर्थ अपने प्राणों के शत्रु बन रहे हो।" इसपर रावण ने कहा - "महावीर! संदेह तो मुझे तुम्हारी शक्ति पर भी नहीं है किन्तु हर किसी की अपनी सीमा होती है। किन्तु मैं लंकेश हूँ और मेरी कोई सीमा ही नहीं है। तुम्हे कदाचित ये ज्ञात नहीं कि मैंने स्वयं देवराज इंद्र को स्वर्ग से पलायन करने को विवश किया है। अतः अगर तुम चाहो तो मेरी सत्ता स्वीकार करो और माहिष्मति पर शासन करो।"

अब संधि की कोई आशा नहीं थी अतः दोनों में भयानक युद्ध आरम्भ हुआ। पहले तो दोनों ने अपने-अपने बाहुबल को तौलते रहे और शीघ्र ही दोनों को ये समझ आ गया कि उनका प्रतिद्वंदी कोई साधारण योद्धा नहीं है। अतः अब दोनों ने अपनी पूर्ण शक्ति का प्रयोग करने का निश्चय किया। सहस्त्रार्जुन ने अपने १००० हाथों को प्रकट किया। ये देख कर माहिष्मति की जनता कोलाहल करने लगी।

ये देख कर रावण भी अपने दशानन रूप में आया। उसका ऐसा रूद्र रूप देख कर राक्षस वीर प्रसन्नतापूर्वक कोलाहल करने लगे। अब दोनों अपनी अपनी पूर्ण शक्ति के साथ भिड़े। दोनों का युद्ध अनवरत रूप से ७ दिनों तक चलता रहा किन्तु हार-जीत का निर्णय नहीं हो पाया। इतने दिनों तक युद्ध करने के पश्चात भी दोनों श्रमित नहीं थे। दोनों के अस्त्र-शस्त्र चुक गए और दोनों बाहुबद्ध होकर युद्ध करने लगे। एक दूसरे पर घात-प्रतिघात करते-करते बहुत समय बीत गया। 

अतंतः सहस्त्रार्जुन ने अपने १००० भुजाओं से रावण को इस प्रकार जकड लिया कि वो हिलने-डुलने में असमर्थ हो गया। रावण ने अपना सारा बल लगा दिया किन्तु वो सहस्त्रार्जुन की पकड़ से छूट नहीं सका। सहस्त्रार्जुन ने रावण को इतने बल से जकड़ा कि रावण स्वास लेने में असमर्थ हो गया और मूर्छित हो गया। तब कार्तवीर्य ने रावण को जंजीरों में डाल कर कारागार में डाल दिया। रावण की सेना को नगर से बाहर निकाल दिया गया किन्तु वे अपने राजा की रक्षा को नगर के बाहर ही रुक गए।

प्रहस्त अविलम्ब रावण के पितामह महर्षि पुलत्स्य के पास पहुँचा और उन्हें सभी चीजें बताई। तब अपने पौत्र को छुड़ाने के लिए माहिष्मति पहुँचे। जब सहस्त्रार्जुन को ये पता चला कि सप्तर्षि महर्षि पुलत्स्य, जो उनके आराध्य भगवान दत्तात्रेय के तात हैं, वो उनके राज्य में पधारे हैं तो वे स्वयं उनके स्वागत को नगर के द्वार पर आये। उन्होंने महर्षि की विधिवत पूजा की और उनसे कई ज्ञान के प्रश्न किये। तब महर्षि पुलत्स्य ने उसकी हर शंका का समाधान किया और उसे आशीर्वाद दिया।

तब सहस्त्रार्जुन ने उनसे वहाँ आने का कारण पूछा। तब महर्षि पुलत्स्य ने कहा - "वत्स! मैंने सुना है कि मेरा पौत्र रावण तुम्हारे कारागार में बंदी है। उसे परास्त कर तुमने अपनी वीरता का परिचय दे दिया है और रावण को भी अपनी करनी का पछतावा होगा। किन्तु अब मेरी इच्छा है कि तुम उसे स्वतंत्र कर दो।" तब सहस्त्रार्जुन ने कहा - "महर्षि! आपकी इच्छा भी मेरे लिए आज्ञा के ही समान है। मुझे बड़ा दुःख है कि इतनी छोटी से बात के लिए आपको यहाँ तक आना पड़ा। अगर आप सन्देश भिजवा देते तो मैं रावण को स्वतंत्र कर देता।"

ये कहकर सहस्त्रार्जुन ने सम्मान सहित रावण को बुलाया। जब रावण ने वहाँ अपने पितामह को देखा तो उन्हें प्रणाम किया किन्तु मारे लज्जा के रावण का शीश भी नहीं उठ सका। जब महर्षि पुलत्स्य ने रावण को ऐसी हीन भावना में देखा तो उसे कई प्रकार के उदेश देकर उन्होंने रावण का आत्मविश्वास वापस लौटाया। तब उनकी आज्ञा से रावण ने सहस्त्रार्जुन से मित्रता की और अपनी सेना को लेकर वापस लंका लौट गया। 

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