रविवार, जनवरी 19, 2020

परीक्षित - २: कलियुग से सात्क्षात्कार

पिछले लेख में आपने परीक्षित के जन्म के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि महाभारत के ३६ वर्षों के बाद जब श्रीकृष्ण ने निर्वाण लिया, तब युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का राज्य परीक्षित को सौंपा और अपने भाइयों और पत्नी के साथ शरीर का त्याग कर दिया। तब परीक्षित ने युधिष्ठिर के उत्तराधिकार को कुशलतापूर्वक संभाला और हस्तिनापुर का राज्य उचित ढंग से चलाने लगे। अब आगे...

परीक्षित अपनी पत्नी मद्रावती के साथ सुख पूर्वक रहने लगे। मद्रावती से उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति हुई - जन्मेजय, भीमसेन, श्रुतसेन एवं उग्रसेन। इसके अतिरिक्त भी उनके चित्रसेन, इन्द्रसेन इत्यादि कुछ पुत्रों का वर्णन मिलता है किन्तु अधिकतर पुस्तकों में उनके यही चार पुत्र बताये जाते हैं। जैसा कि आपको पहले लेख में पता चला कि श्रीकृष्ण के निर्वाण के साथ ही द्वापरयुग का अंत हो गया और कलियुग अपने युग में प्रवेश करने का प्रयास करने लगा। 

एक दिन वो वन विहार को निकले तभी उन्होंने देखा कि एक बैल असहाय रूप से भूमि पर पड़ा हुआ है। उसके तीन पैर कट चुके थे और केवल एक पैर ही शेष था। वही खड़ा एक शूद्र जो रूप से राजा के समान लग रहा था, उस बैल के चौथे पैर को काटने का प्रयास कर रहा था। बैल की ऐसी दशा देख कर वहाँ खड़ी एक गाय रो रही थी। ये देख कर परीक्षित को बड़ा क्रोध आया और वे तत्काल अपना खड्ग लेकर उस व्यक्ति के पास पहुँचे और उसका वध करने को उद्धत हुए। 

ये देख कर उस व्यक्ति ने उनके पाँव पकड़ लिए और उनसे अभयदान माँगने लगा। तब परीक्षित ने उससे पूछा कि वो कौन है और क्यों इस बैल को इस प्रकार पीड़ा दे रहा है? तब उस व्यक्ति ने कहा - "हे महाराज! मैं स्वयं परमपिता ब्रह्मा द्वारा रचित कलियुग हूँ। आपको कदाचित ज्ञात नहीं है कि द्वापरयुग का अंत हो चुका है और अब नियमतः मुझे अपना अधिकार ग्रहण करना है। किन्तु मैंने सुना है कि आज पृथ्वी पर आपके अतिरिक्त कोई अन्य सम्राट नहीं है, इसी कारण मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था ताकि आपकी आज्ञा लेकर मैं अपने युग में प्रवेश कर सकूँ।" तब परीक्षित ने पूछा - "हे कलियुग! मेरी प्रतीक्षा करना तो ठीक है किन्तु ये बैल कौन है और तुम क्यों इसपर इतना अत्याचार कर रहे हो?"

इसपर कलियुग ने कहा - "राजन! ये तो विधि का विधान है। ये गाय जो यहाँ खड़ी है वो स्वयं पृथ्वी है। ये जो बैल आप भूमि पर पड़ा देख रहे हैं वो साक्षात् धर्म है। इसके चारो पैर धर्म के चार स्तंभ हैं। सतयुग में धर्म के चारों स्तंभ - सत्य, तप, दया और दान स्वस्थ रहते हैं। त्रेता में सत्य रूपी स्तंभ ध्वस्त हो जाता है। द्वापर में सत्य के साथ-साथ तप का भी नाश हो जाता है। चूँकि अब ये मेरा काल है, इसी कारण मैंने इसके दया रुपी पैर काट दिए हैं। अब मेरे युग में धर्म केवल दान के सहारे ही जीवित रहेगा। जब मेरा अंतिम चरण आएगा तब दान का नाश हो जाएगा और फिर महारुद्र प्रलय लेकर इस सृष्टि का अंत करेंगे और परमपिता पुनः सृष्टि की रचना करेंगे।"

अब परीक्षित बड़ी सोच में पड़ गए कि कलियुग को अपने राज्य में आने की आज्ञा दें या ना दें। उन्हें सोचते हुए देख कर कलियुग ने कहा - "महाराज! आप ही आज एकछत्र राजा हैं इसी कारण मैं आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। किन्तु अगर आप मुझे प्रवेश की आज्ञा नहीं देंगे तो ये स्वयं परमपिता ब्रह्मा का अपमान होगा। उनके बनाये गए नियम के अनुसार मुझे तो आना ही है।"

तब परीक्षित ने सोचा कि कलियुग को रोका तो नहीं जा सकता किन्तु मैं इसके रहने का स्थान नियत कर सकता हूँ ताकि ये सबपर प्रभाव ना डाले। ये सोच कर उन्होंने कहा - "हे कलि! मैं परमपिता की विधि का विरोध तो नहीं कर सकता किन्तु तुम्हे सर्वत्र रहने की आज्ञा भी नहीं दे सकता।" तब कलियुग ने सहर्षपूर्वक कहा - "आपका विचार सही है महाराज। स्वयं श्रीकृष्ण ने आपके पितामह महाराज युधिष्ठिर के लिए कौरवों से केवल पाँच गाँव माँगा था। उसी प्रकार मैं भी आपसे रहने के लिए केवल पाँच स्थान माँगता हूँ। अगर आप भी कौरवों की भांति मुझे पाँच स्थान देने से मना करेंगे तो उनकी तरह आपका अहित ही होगा।"

इसपर परीक्षित ने थोड़ा विचार किया और कहा - "ठीक है, मैं तुम्हे रहने के लिए पाँच स्थान देता हूँ। आज से तुम द्यूत, स्त्री, मद्य, हिंसा एवं स्वर्ण, इन पाँच स्थानों पर निवास कर सकते हो किन्तु इसके अतिरिक्त अन्य स्थानों पर तुम्हारा रहना वर्जित होगा।" परीक्षित की ऐसी बातें सुनकर कलियुग बड़ा प्रसन्न हुआ और उन्हें प्रणाम कर वहाँ से चला गया। परीक्षित भी बड़े दुखी भाव से वापस अपने महल लौट आये।

...शेष

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