रविवार, जनवरी 26, 2020

परीक्षित - ४: तक्षक का दंश और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कलियुग के प्रभाव के कारण महाराज परीक्षित से महर्षि शमीक का अपमान हो जाता है। इससे क्रोधित होकर उनके पुत्र श्रृंगी परीक्षित को श्राप देते हैं कि ठीक सातवें दिन तक्षक के दंश से परीक्षित की मृत्यु हो जाएगी। जब शमीक ऋषि को इसका पता चलता है तो वे बड़े दुखी होते हैं और परीक्षित को सन्देश भिजवाते हैं कि केवल ७ दिनों के लिए अपनी सुरक्षा का प्रबंध कर लें। 

जब परीक्षित को ये समाचार मिला तो उन्होंने अपने पुत्र जन्मेजय को राजा बना दिया और अपनी रक्षा के लिए ७ मंजिला एक ऐसा लौह भवन बनवाया जिसमे वायु को छोड़ कर कुछ और प्रवेश ही नहीं कर सकता था। राजा की रक्षा के लिए प्रत्येक मंजिल पर चारो ओर सर्पमँत्र के ज्ञाताओं को रक्षा के लिए बिठा दिया। उस भवन के सबसे ऊपरी ७वीं मंजिल पर स्वयं महाराज परीक्षित बैठे। 

इस पर भी महाराज परीक्षित संतुष्ट नहीं हुए। तब उनके महामंत्री ने बताया कि वहाँ से ७ योजन दूर कश्यपवंशी एक ऋषि रहते हैं। आज विश्व में कोई भी सर्प दोष के निवारण में उनसे अधिक ज्ञान नहीं रखता। अगर वे यहाँ आ जाएँ तब अगर तक्षक आपको डस भी ले, तब भी वे आपको बचा लेंगे। उनकी बात सुनकर महाराज परीक्षित ने अपने द्रुतगामी दूत उस ऋषि के पास भेजा और उन्हें कहलवाया कि अगर उन्होंने राजा परीक्षित की रक्षा कर दी तो आपके भर के बराबर आपको स्वर्ण दिया जाएगा और आपको १०० गावों का राजा बना दिया जाएगा। महर्षि कश्यप के वंश के वे ऋषि बड़े निर्धन थे। जब उन्होंने इतने बड़े पुरस्कार की बात सुनी तो उसके लिए तत्काल हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान किया।

उधर तक्षक भी सातवें दिन परीक्षित को दंश देने हस्तिनापुर की ओर निकले। तक्षक और पांडवों का मतभेद जग जाहिर था। परीक्षित के दादा अर्जुन और श्रीकृष्ण ने जब खाण्डवप्रस्थ का दाह किया तब तक्षक भी उसमें भस्म होने वाला था। वो तो देवराज इंद्र की कृपा से तक्षक बच गया। तब से आज तक वो पांडवों से प्रतिशोध लेना चाहता था। महाभारत युद्ध में भी वो सूर्यपुत्र कर्ण के बाण पर बैठकर अर्जुन का विनाश करना चाहता था किन्तु श्रीकृष्ण ने उसकी रक्षा की। जब तक्षक को इस श्राप के बारे में पता चला तो वो बड़ा प्रसन्न हुआ कि पांडव नहीं, उसके वंशज का ही नाश मेरे द्वारा होगा।

जब वो हस्तिनापुर में प्रवेश करने वाला था तभी वो कश्यप वंशी ब्राह्मण भी वहाँ पहुँचे। उनका तेज देख कर तक्षक एक ब्राह्मण का रूप लेकर उनके पास पहुँचा और उनसे हस्तिनापुर जाने का कारण पूछा। तब उस ऋषि ने कहा कि वो महाराज परीक्षित की रक्षा करने जा रहे हैं। तब तक्षक अपने असली रूप में आया और वहाँ खड़े एक हरे-भरे वृक्ष पर दंश किया। उसके भयंकर विष से वो वृक्ष एक क्षण में ही जल कर सूख गया। तब उसने उस ऋषि से अपनी विद्या का चमत्कार दिखने को कहा। इस पर उस ऋषि ने अपने मन्त्र बल पर उस वृक्ष को पुनः हरा-भरा कर दिया। 

उनकी विद्या देख कर तक्षक ने उन्हें समझाया कि वे एक श्राप के कारण परीक्षित को डसने जा रहे हैं। अगर उन्होंने उनकी रक्षा की तो ऋषि का श्राप विफल हो जाएगा। तब उस ऋषि ने कहा कि वे बड़े निर्धन है और उन्हें धन की आवश्यकता है। तब तक्षक ने उन्हें अकूत धन से संपन्न कर दिया। धन पाकर वे ऋषि प्रसन्न हो गए और उसे लेकर वापस अपने प्रदेश लौट गए। उन्हें जाता देख कर तक्षक को बड़ा संतोष हुआ और वो अदृश्य रूप में राजा परीक्षित के भवन पर पहुँच गया।

वहाँ जब उसने इतनी कड़ी सुरक्षा देखी बड़ा निराश हुआ। उसे समझ नहीं आया कि किस प्रकार इतनी कड़ी सुरक्षा में वो परीक्षित को डस सकता है? वो बड़ी देर तक सोचता रहा कि किस प्रकार राजा परीक्षित तक पहुँचा जाये। तब उसे एक युक्ति सूझी। उसने अपने एक सजातीय सर्प को कहा कि वो एक तपस्वी का रूप लेकर राजा परीक्षित के पास फल लेकर जाये। तक्षक स्वयं अत्यंत सूक्ष्म रूप लेकर उस फल के भीतर बैठ गया। 

जब वो ब्राह्मणरूपी सर्प फल लेकर महाराज परीक्षित के पास पहुँचा तो द्वार पर उसे रक्षकों ने रोक दिया। उससे कहा गया कि आज के दिन महाराज परीक्षित से कोई नहीं मिल सकता। जब महाराज को ये पता चला कि एक ब्राह्मण उनके द्वार पर भगवान का प्रसाद लेकर आये हैं किन्तु रक्षक उन्हें वापस लौटा रहे हैं तो उन्होंने सोचा कि इससे ब्राह्मण और भगवान के प्रसाद का अपमान होगा। तब उन्होंने उस ब्राह्मण को अपने पास बुलाया और फल अपने पास रखवा लिए। इस प्रकार तक्षक राजा के समक्ष पहुँच गया। 

उस समय रात्रि का अंतिम प्रहर था। परीक्षित ने सोचा कि अब तो सातवां दिन बिलकुल समाप्त होने को आया है। अब भला तक्षक यहाँ क्या आएगा? ये सोच कर परीक्षित ने ब्राह्मण के दिए फल को खाने के लिए काटा। फल को काटते ही उससे एक अतिसूक्ष्म कीड़ा निकला जिसका रंग काला था। देखते ही देखते वो कीड़ा एक महाभयंकर सर्प में बदल गया। वो तक्षक ही था। उसने तत्काल ही महाराज परीक्षित को डस लिया। उसके दंश से महाराज परीक्षित तत्काल भस्म हो गए। इस प्रकार अंततः ऋषि का श्राप फलीभूत हुआ।

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