मंगलवार, दिसंबर 24, 2019

कीचक: ४ - अंत

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार कीचक की कुदृष्टि सैरन्ध्री बनी दौपदी पर पड़ती है और वो उसपर आसक्त हो जाता है। वो द्रौपदी को बलात प्राप्त करने का प्रयास करता है और दो बार द्रौपदी कीचक से अपने प्राण बचा कर भागती है किन्तु कीचक भरे सभा में ये चुनौती देकर जाता है कि वो सैरन्ध्री को प्राप्त कर के रहेगा। अब आगे... 

सभा से अपमानित होकर द्रौपदी अपने पांचों पतियों से मिलती है। वहाँ युधिष्ठिर सभी को समझाते हुए कहते हैं - "तुम सभी का आक्रोश मैं समझ सकता हूँ किन्तु अब अज्ञातवास को केवल १२ दिन शेष हैं और यदि हमने कोई भूल की तो शर्त के अनुसार हमें पुनः १२ वर्षों के वनवास और १ वर्ष के अज्ञातवास को जाना होगा। कीचक को उसके किये का दंड अवश्य मिलेगा किन्तु हमें पहले सावधानी पूर्वक अपना अज्ञातवास पूरा करना चाहिए।"

सभी पांडव ये सुनकर लौट जाते हैं किन्तु द्रौपदी के ह्रदय में प्रतिशोध की भावना शांत नहीं होती। वो जानती थी कि युधिष्ठिर की आज्ञा का कोई भी भाई उलंघन नहीं करेगा। सारे भाइयों में केवल भीमसेन ही ऐसे हैं जो किसी प्रकार के अंकुश को नहीं मानते। अतः वो रात्रि के समय भीम के पास गयी और भूमि पर गिर कर विलाप करने करने लगी। 

अपनी प्रिय पत्नी को इस दशा में देख कर भीमसेन को बड़ा कष्ट हुआ। उसने द्रौपदी को उठाया और उसके अश्रु पोछे। क्रोध के कारण उनका चेहरा रक्तिम हो गया था। उन्होंने कहा - "हे पांचाली! भ्राता युधिष्ठिर के भाले, मेरी गदा, अर्जुन के गांडीव और नकुल-सहदेव के खड्ग को धिक्कार है। वो पापी कीचक तुम्हारा स्पर्श कर अभी तक जीवित है ये मुझसे सहन नहीं होता। किन्तु क्या करूँ, बड़े भाई की आज्ञा ने बांध रखा है अन्यथा कीचक का तो मैं वही राजसभा में वध कर देता।"

तब द्रौपदी विलाप करते हुए कहती है - "मध्यम! मुझे क्या पता था कि साथ-साथ जो पूरी पृथ्वी को जीत सकते हैं वैसे महावीरों की पत्नी होते हुए भी मुझे ये दुःख देखना होगा। अब मुझे हित-अहित नहीं सूझ रहा। युधिष्ठिर की आज्ञा को भी मैं मूल्य नहीं देती। अगर वो दुष्ट कीचक एक क्षण भी और जीवित रह गया तो मैं सौगंध खाती हूँ कि तुम्हारे समक्ष ही मैं अपने प्राण त्याग दूंगी।"

ये देख कर भीम ने उसे समझते हुए कहा - "कल्याणी! अब अज्ञातवास समाप्त होने में थोड़ा ही समय शेष है तब भी मैं उस दुष्ट कीचक को जीवित नहीं छोडूंगा। किन्तु इस प्रकार प्रत्यक्ष में उससे युद्ध करना उचित नहीं होगा। अतः तुम कल उसे किसी भी प्रकार रात्रि को व्यायामशाला में बुला लो। मैं वचन देता हूँ कि तुम्हारे समक्ष ही मैं उस पापी का वध कर दूंगा।"

भीम के इस प्रकार समझाने पर द्रौपदी जान-बुझ कर कीचक के पास गयी और उससे कहा - "हे वीर! वास्तव में विराट नगर में तुम्हारा विरोध करने का दुस्साहस कोई नहीं कर सकता। मैं तो स्वयं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ किन्तु मेरे ५ गन्धर्व पति बाधा हैं। अतः तुम आज रात्रि के अंतिम प्रहर मुझसे व्यायामशाला में आकर मिलो। वही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।"

कीचक ने जब ये सुना तो उसकी प्रसन्नता की सीमा ना रही। वो प्रसन्नतापूर्वक मदिरापान कर रात्रि के अंतिम प्रहर में व्यायामशाला पहुँचा जो नगर से बाहर था। वहाँ भीम द्रौपदी का उत्तरीय ओढ़ कर पहले ही बैठे थे और द्रोपदी दीवार की ओट से सब देख रही थी। नशे में धुत्त कीचक ने जैसे ही भीम को छुआ, उन्होंने उसपर भीषण मुष्टि प्रहार किया जिससे कीचक दूर जा गिरा और उसका सारा नशा समाप्त हो गया।

जब कीचक ने भीम को अपने समक्ष देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। अब दोनों में भीषण मल्ल्युद्ध छिड़ गया। दोनों समान रूप से बलशाली थे और उनके प्रहारों से व्यायामशाला टूटने-फूटने लगी। भयानक कोलाहल मच गया किन्तु वहाँ सुनने वाला कौन था? उन दोनों के बीच वो युद्ध पूरे १ प्रहर चलता रहा किन्तु अंततः कीचक भीम के बल से पार ना पा सका और उनके हाथों मारा गया। भीम के कहने पर द्रौपदी ने सबसे कह दिया कि उससे कुचेष्टा करने के कारण ही उनके गन्धर्व पतियों ने कीचक का वध किया है।

अपने भाई के मरने के कारण उसके १०५ भाई अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए। जब वे उसके अंतिम क्रिया को जा रहे थे उन्होंने सोचा कि सैरन्ध्री के कारण ही उनका भाई मरा है इसीलिए उसे भी उसी अग्नि में झोंक देना चाहिए। ये सोचा कर वे सभी ने द्रौपदी को बलात श्मशान ले गए और कीचक की चिता पर ही लिटा कर उसे जीवित जला देने का प्रयास करने लगे। संयोग से उस समय उन १०५ भाइयों के अतिरिक्त वहाँ और कोई नहीं था।

उसी समय भीम वायुवेग से वहाँ पहुँचे और वही खड़े एक विशाल वृक्ष को उखाड़ कर उससे ही सभी उपकीचकों का वध करना आरम्भ कर दिया। उपकीचक वीर अवश्य थे किन्तु भीम तो फिर भीम ही थे। क्रोध आने पर तो स्वयं काल भी उनपर अंकुश नहीं रख सकता था फिर उन १०५ योद्धाओं की क्या बात थी। केवल आधे मुहूर्त में ही भीम ने उन सभी १०५ भाइयों की इहलीला समाप्त कर दी और द्रौपदी को वापस राजभवन भेज कर स्वयं अपनी पाकशाला में चले गए।

इस प्रकार एक दुराचारी और उसके भाइयों से भीम ने प्रजा को मुक्ति दिलवाई। अपने सभी भाइयों के मारे जाने पर रानी सुदेष्णा बड़ा भयभीत हुई और उसने द्रौपदी से कहा कि वो वहाँ से चली जाये। किन्तु द्रौपदी ने उनसे प्रार्थना करते हुए कहा कि वे उसे केवल ७ दिन और उस भवन में रहने दे, उसके बाद वो चली जाएगी। इस डर से कि उसे निकालने से उसके गन्धर्व पति उनका अहित ना कर दें, सुदेष्णा ने उसे वही रहने की आज्ञा दे दी। आगे का इतिहास तो हम सभी जानते ही हैं।

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