शुक्रवार, दिसंबर 20, 2019

कीचक: २ - प्रभाव

पिछले लेख में आपने कीचक के वंश और परिवार के विषय में पढ़ा। आपने ये भी जाना कि किस प्रकार कीचक ने विराटराज को अपनी सहायता देने के लिए उन्हें अपनी बहन सुदेष्णा से विवाह करने को कहा। विवाह के पश्चात विराटराज ने कीचक को प्रधान सेनापति बनाया और एक बड़ा प्रदेश भी प्रदान किया जहाँ की राजधानी कीचक ने एकचक्रा नगरी को बनाया। अब आगे... 

प्रधान सेनापति का पद सँभालते ही कीचक ने सर्वप्रथम विराटदेश की सीमा पर आ पहुँची विभिन्न राज्य की सेनाओं से युद्ध किया। कीचक और उसके भाइयों की वीरता के आगे वो सेनाएं टिक नहीं पायी और पीछे हटने को विवश हो गयी। कीचक ने अप्रतिम वीरता दिखाते हुए मेखल, त्रिगर्त, दशार्ण, कशेरुक, मालव, यवन, पुलिन्द, काशी, कोसल, अंग, वंग, कलिंग, तंगण, परतंग, मलद, निषध, तुण्डिकेर, कोंकण, करद, निषिद्ध, शिव, दुश्छिल्लिक तथा अन्य छोटे-बड़े राज्यों की सेनाओं को खदेड़ दिया। 

कीचक के कारण विराट नरेश दसों दिशाओं से सुरक्षित हो निर्विघ्न राज्य करने लगे। उस सैन्य अभियान के कारण चारों दिशाओं में कीचक और उसके भाइयों की वीरता की चर्चा होने लगी। कीचक को अब विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं में स्थान प्राप्त होने लगा। उसी के कारण किसी अन्य राज्य में इतना साहस नहीं रहा कि वो पुनः विराटदेश पर आक्रमण करने का साहस कर सके।

कीचक मल्ल्युद्ध में अप्रतिम था। विश्व में केवल जरासंध, बलराम, भीम एवं दुर्योधन ही ऐसे थे जो मल्ल्युद्ध में कीचक को परास्त करने का सामर्थ्य रखते थे। मल्ल्युद्ध के अतिरिक्त कीचक गदायुद्ध एवं धनुर्विद्या में भी प्रवीण था। वो इतना शक्तिशाली था कि भीष्म, द्रोण, बलराम, जरासंध, कर्ण, भीम एवं दुर्योधन के अतिरिक्त उसका वध कोई और नहीं कर सकता था। बाहुबल में भी वो भीम और दुर्योधन के समान ही था। भीम के समान ही उसमें भी १०००० हाथियों का बल था।

अपनी इसी अतुल शक्ति के कारण शीघ्र ही कीचक निरंकुश हो गया। ये सभी को पता था कि विराट में कीचक का विरोध कोई कर नहीं सकता। पूरी विराटदेश की सेना भी उसी के नियंत्रण में थी। सेना पर उसका ऐसा प्रभाव था कि उसकी आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता था। जनता पर भी उसका ऐसा भय था कि कोई उससे दृष्टि मिलाने का साहस भी नहीं करता था। और तो और स्वयं विराटराज भी उससे भयभीत ही रहते थे। अपने इस प्रभाव के कारण वो विराटदेश में एक सामानांतर सत्ता चलाने लगा।

वर्षों बीत गए और कीचक का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। उसने प्रजा पर अत्याचार करना आरम्भ कर दिया। राज्य के अतिरिक्त उसने अपना व्यक्तिगत कर भी उनपर थोप दिया। वो बिना राजाज्ञा के केवल अपनी इच्छा पर आस पास के राज्यों पर यदा-कदा आक्रमण करने लगा। इससे विराटदेश के सम्बन्ध अपने पडोसी राज्यों से बिगड़ने लगे और उसकी अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। किन्तु विराटदेश में कीचक अब इतना शक्तिशाली था कि उसे रोकने का साहस कोई नहीं कर सकता था।

वहाँ के राजा अवश्य ही विराटराज थे किन्तु वास्तविक सत्ता कीचक के हाथों में ही थी और स्वयं विराटनरेश भी इस बात को जानते थे। पूरा मंत्रिमंडल उससे भयभीत रहता था और कोई उसके विरुद्ध नहीं जा सकता था। अगर वो चाहता तो कब का विराट नरेश को उनके पद से च्युत कर स्वयं विराटदेश का राजा बन सकता था किन्तु केवल अपनी बहन सुदेष्णा का ध्यान कर उसने ऐसा नहीं किया।

कीचक बड़ा कामुक था। विराटनगर में रहते हुए ही कीचक ने कई विवाह किये और अनेक कन्याओं का बलात हरण कर उसने अपने अंतःपुर में उन्हें कैद कर लिया। उसके १०५ अन्य भाई जो उपकीचक कहलाते थे, वे सब अपने भाई के संरक्षण में उसी की भांति निरंकुश हो गए। जिस कीचक और उनके भाइयों ने कभी विराटदेश की रक्षा की थी अब पूरा देश उन्ही के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रहा था।

धीरे-धीरे बात इतनी बढ़ गयी कि विराटनरेश कीचक से मुक्ति पाने का उपाय सोचने लगे। स्वयं उसकी बहन सुदेष्णा भी उसके इस व्यहवार से दुखी रहती थी और उसने कई बार विराटराज के कहने पर अपने बड़े भाई को समझाने का प्रयत्न भी किया था किन्तु कीचक उसकी बात हंसी में उड़ा देता था। विराटराज उस विषहीन सर्प की भांति हो गए जो अपनी रक्षा के लिए प्रहार नहीं कर सकता। किन्तु कदाचित ईश्वर भी कीचक को उसके पापों का दंड देना चाहते थे। पांडव अपने अज्ञातवास का समय पूरा करने हेतु उसी नगर में आ रहे थे।

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