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रानी चोला देवी - १

महर्षि अंगिरस के लेख में रानी चोला देवी का वर्णन आया था। महाभारत में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि "हे माधव! जिसे सुनने से मन प्रसन्न हो और पापों का अंत हो जाये ऐसी कोई कथा मुझे सुनाइए।" ये सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा - "भ्राताश्री! सतयुग में जब दैत्य वृत्रासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया तब देवराज इंद्र ने यही इच्छा देवर्षि नारद के सामने जताई थी। देवर्षि ने जो कथा देवराज को सुनाई वही मैं आपको सुनाता हूँ। इस कथा को सुनने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।"

पुरन्दरपुर नामक एक वैभवशाली राज्य था जहाँ राजा मंगलसेन राज्य करते थे। कहा जाता है कि उनके नगर को स्वयं विश्वकर्मा ने बनाया था और उसके समान और कोई दूसरा नगर विश्व में नहीं था। राजा मंगलसेन की दो रूपवती पत्नियाँ थी - चिल्ल देवी और चोला देवी। जहाँ चिल्ल देवी को धर्म-कर्म में पूर्ण विश्वास था वही चोला देवी नास्तिक तो नहीं थी किन्तु उन्हें धर्म-कर्म, पूजा-पाठ पर कुछ खास श्रद्धा नहीं थी।

एक बार मंगलसेन अपनी पत्नी चोला देवी के साथ अपने भवन के शिखर पर विचरण कर रहे थे कि सहसा चोला देवी की नजर समुद्र के जल से घिरे एक छोटे से द्वीप पर पड़ी। उस रमणीक द्वीप को देख कर चोला देवी ने अपने पति से कहा कि उसकी इच्छा है कि उस द्वीप पर आप मेरे लिए एक अत्यंत सुंदर उद्यान बनवाएं। तब मंगलसेन ने अपनी पत्नी से कहा - "प्रिये! स्वर्ग के नंदनवन को भी लज्जित कर दे, ऐसा ही रमणीक उद्यान मैं तुम्हारे लिए उस द्वीप पर बनवाऊंगा।"

अपने वचन के अनुसार मंगलसेन ने रानी चोला देवी के लिए एक अत्यंत मनोहारी उद्यान का निर्माण करवाया। चोला देवी अब अपना अधिकांश समय उसी उद्यान में बिताने लगी। एक दिन राजा और रानी अपने भवन में बैठे थे कि चोला देवी के उद्यान के सैनिकों ने बताया कि उद्यान में एक विकराल शूकर घुस आया है और पूरे उद्यान का नाश कर रहा है। यही नहीं उसने वहाँ के कई रक्षकों को भी मार गिराया है। ये सुनकर रानी चोला देवी दुःख से विलाप करने लगी।

ये देख कर मंगलसेन अत्यंत क्रोधित हुए और उस शूकर को मरने अपनी सेना उस उद्यान में भेजी। यही नहीं वो स्वयं अपने गज पर बैठ कर उद्यान पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उसने उस शूकर को उत्पात मचाते देखा तो उसने अपनी सेना से कहा - "इस शूकर को तत्काल मार डालो। अगर ये शूकर किसी भी सैनिक के बगल से निकल जायेगा तो मैं उसका वध कर दूंगा।" तभी वो शूकर सभी सैनिकों को घायल करता हुआ राजा के ही बगल से निकल कर भाग गया।

ये देख कर राजा बड़ा लज्जित हुआ। उसने अकेले अपने अश्व पर उस शूकर का पीछा किया और घने वन में अंततः उस शूकर को अपने बाणों से भेद दिया। जैसे ही शूकर ने अपने प्राण त्यागे, वो एक दिव्य पुरुष में बदल गया। उसी समय स्वर्ग से एक दिव्य यान आया और वो देवपुरुष उस यान पर विराजमान हो गए। ये देख कर राजा मंगलसेन ने आश्चर्य से इसका रहस्य उनसे पूछा। 

तब उस देव ने कहा - "राजन! मैं चित्ररथ नामक गन्धर्व हूँ। एक बार मैं परमपिता ब्रह्मा के समक्ष गायन कर रहा था किन्तु मेरा मन एकाग्र नहीं था और इसी कारण मेरा स्वर बिगड़ गया। इससे रुष्ट होकर ब्रह्मदेव ने मुझे शूकर योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। आज आपने मुझे इस योनि से मुक्ति दिलवाई है इसीलिए आपका धन्यवाद। मैं आपको आशीर्वाद देता हूँ कि भविष्य में आप महालक्ष्मी व्रत को पूर्ण करेंगे और तीनों लोकों में आपका यश गूंजेगा।" ये कहकर वो दिव्यपुरुष अपने दिव्य विमान में स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गए।

...शेष

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