शनिवार, दिसंबर 28, 2019

माता अरुंधति - २

पिछले लेख में आपने महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति के प्रारंभिक जीवन के बारे में पढ़ा। आप जाना कि किस प्रकार अरुंधति पूर्वजन्म में भगवान ब्रह्मा की पुत्री संध्या थी जिसने महर्षि वशिष्ठ के उपदेश से भगवान विष्णु की तपस्या  की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें तीन वरदान दिए कि जन्म लेते ही किसी भी जीव में काम भावना ना हो, उनका पतिव्रत अखंड रहे और कोई भी काम दृष्टि से उन्हें देखे तो वो नपुंसक हो जाये। अब आगे...

भगवान विष्णु की कृपा से अदृश्य होकर संध्या महर्षि मेघतिथि के यज्ञ में गयी और वहाँ महर्षि वशिष्ठ को पति रूप में पाने की कामना लेकर उन्होंने यञकुंड में अपना शरीर समर्पित कर दिया। उस अग्नि में भस्म होने के बाद उत्पन्न उनकी पवित्र ऊर्जा को स्वयं सूर्यदेव ने दो भाग कर सृष्टि के कल्याण हेतु अपने रथ पर स्थापित किया। यही दो भाग प्रातः काल और संध्या काल कहलाये।

अगले जन्म में वही संध्या महर्षि कर्दम की पुत्री के रूप में जन्मी और उनका नाम रखा गया अरुंधति। जब वो पांच वर्ष की हुई तब स्वयं ब्रह्मदेव ने महर्षि कर्दम को ये आदेश दिया कि इस कन्या को उचित शिक्षा के लिए उसे माता सावित्री और माता बहुला के पास भेज दें। उनकी आज्ञा अनुसार महर्षि कर्दम सावित्री और बहुला से मिले और उन्हें अपनी कन्या सौंप दी। उन दोनों के देख रेख में अरुंधति ने १६ वर्ष में प्रवेश किया और उन्ही के समान सर्वगुणसम्पन्न बन गयी।

एक दिन वो मानस पर्वत पर भ्रमण कर रही थी जहाँ उन्होंने महर्षि वशिष्ठ को देखा। उन्हें देख कर उन्हें अपने पूर्वजन्म की बात स्मरण में आयी और उन्होंने वशिष्ठ को मन ही मन अपना पति मान लिया। जब माता सावित्री को इस बात का पता चला तो उन्होंने अरुंधति को पुनः महर्षि कर्दम को सौंपा और उनका विवाह महर्षि वशिष्ठ से करने का सुझाव दिया। बाद में उनका विवाह महर्षि वशिष्ठ से हुआ और दोनों सुख पूर्वक अपने आश्रम में रहने लगे। इन दोनों का स्थान सप्तर्षि तारामंडल में बताया गया है।

एक बार महर्षि वशिष्ठ अन्य सप्तर्षियों के साथ १२ वर्ष की घोर तपस्या के लिए चले गए। उस काल में अरुंधति अकेली अपने आश्रम पर ही रही। दैवयोग से सप्तर्षियों के जाते ही भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। ७ दिनों तक देवी अरुंधति के मुख में अन्न का एक दाना तक नहीं गया। तब उन्होंने केवल वायु पीकर भगवान शिव की आराधना आरम्भ की ताकि उनका अंत हो जाये। तब उनकी परीक्षा लेने के लिए २१वें दिन स्वयं महादेव उनके आश्रम में एक वृद्ध के रूप में पधारे।

उन्होंने अरुंधति से खाने को कुछ माँगा। तब अरुंधति ने क्षमा याचना करते हुए महादेव से कहा कि उनके पास तो खाने को कुछ नहीं है। तब महादेव ने उन्हें कुछ बदरी के बीज दिए और उन्हें पकाने को कहा। अरुंधति उसे पकाने बैठी। समय काटने के लिए उन्होंने वृद्धरूपी भगवान शंकर से धर्म-कर्म की बातें आरम्भ कर दी। तब शंकर जी उन्हें धर्म का वास्तविक रूप समझाने लगे। 

भगवान शंकर की माया के कारण जब तक अरुंधति ने उन बदरी के बीजों को पकाया, तब तक १२ वर्ष बीत गए और उनकी कृपा से अकाल भी समाप्त हो गया किन्तु अरुंधति को लगा जैसे कुछ समय ही बीता हो। उसी समय सप्तर्षि अपनी घोर तपस्या समाप्त कर वहाँ पधारे। तब उन्हें देख कर अरुंधति आश्चर्य से बोली कि आप सब तो १२ वर्षों के लिए गए थे फिर इतनी जल्दी कैसे आ गए? तब महर्षि वशिष्ठ ने आश्चर्यचकित होकर उन्हें बताया कि वे सब तो १२ वर्ष के पश्चात ही वापस आ रहे हैं।

उसके पश्चात सातों महान ऋषि इस बात पर बहस करने लगे कि उन सातों में किसकी तपस्या सबसे उत्तम थी। जब कोई निर्णय नहीं हुआ तो अरुंधति ने वृद्धरूपी महादेव से इसका निर्णय करने को कहा। महादेव ने अरुंधति की भक्ति से प्रसन्न होकर उन सभी को दर्शन दिए और कहा कि आप सातों ऋषियों की सम्मलित तपस्या से भी अधिक कठोर व्रत अरुंधति का है। मैंने जो ज्ञान अरुंधति को दिया है आप सभी ऋषि उस ज्ञान को इनसे प्राप्त करें और जगत में उसका प्रचार करें। ये कहकर महादेव अंतर्ध्यान हो गए।

तब सप्तर्षि अरुंधति के तेज के समक्ष नतमस्तक हुए और उनसे वो ज्ञान प्राप्त किया जो अरुंधति ने १२ वर्षों में महादेव से प्राप्त किया था। वही ज्ञान आगे चलकर वेद और पुराण की कथाओं के रूप में प्रसिद्ध हुआ जिसका विस्तार जगत में सप्तर्षियों ने किया। माता अरुंधति से ही वार्तालाप करते हुए महर्षि वशिष्ठ ने 'राजर्षि' विश्वामित्र को 'ब्रह्मर्षि' विश्वामित्र कहकर पुकारा था। इसके बारे में पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। 

सप्तर्षि तारामंडल के बारे में हमारे वेद-पुराणों में सहस्त्रों वर्षों पहले लिखा जा चुका था और आज आधुनिक वैज्ञानिक भी मानते हैं कि हमारे तारामंडल में दो युगल तारे हैं जो एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं। वे महर्षि वसिष्ठ और माता अरुंधति ही है और आज भी वैज्ञानिक उन युगल तारों को "अरुंधति-वशिष्ठ" के नाम से ही जानते हैं। धन्य है ऐसी महान सती जिनकी महिमा से हमारा भारतीय समाज ओत-प्रोत है।

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