शनिवार, जुलाई 20, 2019

राघवयादवीयम् - विश्व की सबसे अद्भुत रचना

क्या आप किसी ऐसे ग्रन्थ के विषय में सोच सकते हैं जिसे आप सीधे पढ़े तो कुछ और अर्थ निकले और अगर उल्टा पढ़ें तो कोई और अर्थ? ग्रन्थ को तो छोड़िये, ऐसा केवल एक श्लोक भी बनाना अत्यंत कठिन है। लेकिन क्या आपको पता है कि एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें एक नहीं बल्कि ३० श्लोक इस प्रकार लिखे गए हैं जिसे अगर आप सीधा पढ़ें तो रामकथा बनती है और उसी को अगर आप उल्टा पढ़ें तो कृष्णकथा। जी हाँ, ऐसा अद्भुत ग्रन्थ हमारे भारत में ही है। उस ग्रन्थ का नाम है राघवयादवीयम्, जो स्वयं राघव (श्रीराम) और यादव (श्रीकृष्ण) के योग से बना है। इसे "अनुलोम-विलोम काव्य" भी कहा जाता है।

इस ग्रन्थ को श्री वेंकटाध्वरि ने १७वीं सदी में रचा था। इनका जन्म कांचीपुरम के एक गाँव अरसनीपलै में हुआ था। इन्होने कुल १४ रचनाएँ लिखी हैं जिनमे से "राघवयादवीयम्" और "लक्ष्मीसहस्त्रम्" सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। ऐसी किवदंती है कि वेंकटाध्वरि नेत्रहीन थे किन्तु जैसे ही इन्होने लक्ष्मीसहस्त्रम् रचना समाप्त की, माँ लक्ष्मी की कृपा से इन्हे इनकी नेत्रों की ज्योति पुनः प्राप्त हो गयी। वैसे तो इस ग्रन्थ में केवल ३० श्लोक हैं किन्तु अगर हम श्रीराम और श्रीकृष्ण की कथाओं का अलग अलग वर्णन करें तो श्लोकों की कुल संख्या ६० हो जाती है। ये ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखा गया है। शब्दों का ऐसा अद्भुत ताना बाना केवल संस्कृत में ही बुना जा सकता है। आइये इस ग्रन्थ के सभी श्लोकों को समझते हैं:

अनुलोम (रामकथा)
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः। 
रामः रामाधीः आप्यागः लीलाम् आर अयोध्ये वासे ॥ १॥
अर्थात: मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के संधान में मलय और सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा अयोध्या वापस लौट दीर्घ काल तक सीता संग वैभव विलास संग वास किया।
विलोम (कृष्णकथा)
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी मारामोराः।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥
अर्थात: मैं भगवान श्रीकृष्ण, जो तपस्वी व त्यागी हैं, रूक्मिणी तथा गोपियों संग क्रीड़ारत रहते हैं, गोपियों के पूज्य हैं, के चरणों में प्रणाम करता हूं। जिनके ह्रदय में मां लक्ष्मी विराजमान हैं तथा जो शुभ्र आभूषणों से मंडित हैं।

अनुलोम (रामकथा)
साकेताख्या ज्यायामासीत् या विप्रादीप्ता आर्याधारा।
पूः आजीत अदेवाद्याविश्वासा अग्र्या सावाशारावा ॥ २॥
अर्थात: पृथ्वी पर साकेत अर्थात अयोध्या नामक एक नगर था जो वेदों में निपुण ब्राह्मणों तथा वणिको के लिए प्रसिद्द था। ये अज के पुत्र दशरथ का धाम था एवं यहाँ होने वाले यज्ञों में अर्पण को स्वीकार करने के लिए देवता भी सदा आतुर रहते थे। यह विश्व के सर्वोत्तम नगरों में श्रेष्ठ था।
विलोम (कृष्णकथा)
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरा पूः।
राधार्यप्ता दीप्रा विद्यासीमा या ज्याख्याता के सा ॥ २॥
अर्थात: समुद्र के मध्य में अवस्थित, विश्व के स्मरणीय नगरों में से एक द्वारका नगर था जहाँ अनगिनत हाथी-घोड़े थे। ये अनेकों विद्वानों के वाद-विवाद की प्रतियोगिता स्थली थी, ये आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसिद्द केंद्र था एवं जहाँ राधास्वामी श्रीकृष्ण का निवास था।

अनुलोम (रामकथा)
कामभारस्स्थलसारश्रीसौधा असौ घन्वापिका।
सारसारवपीना सरागाकारसुभूररिभूः ॥ ३॥
अर्थात: सर्वकामनापूरक, भवन-बहुल, वैभवशाली धनिकों का निवास, सारस पक्षियों के कूँ-कूँ से गुंजायमान एवं गहरे कूपों (कुओं) से भरा यह स्वर्णिम अयोध्या नगर था।
विलोम (कृष्णकथा)
भूरिभूसुरकागारासना पीवरसारसा।
का अपि व अनघसौध असौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥
अर्थात: मकानों में निर्मित पूजा वेदी के चंहुओर ब्राह्मणों का जमावड़ा इस बड़े कमलों वाले नगर द्वारका में है। निर्मल भवनों वाले इस नगर में ऊंचे आम्रवृक्षों के ऊपर सूर्य की छटा निखर रही है।

अनुलोम (रामकथा)
रामधाम समानेनम् आगोरोधनम् आस ताम्।
नामहाम् अक्षररसं ताराभाः तु न वेद या ॥ ४॥
अर्थात: श्रीराम की अलौकिक आभा जो सूर्यतुल्य है एवं जिससे समस्त पापों का नाश होता है, उससे पूरा नगर प्रकाशित था। उत्सवों में कमी ना रखने वाला यह नगर अनन्त सुखों का स्रोत तथा ऊंचे भवन एवं वृक्षों के कारण नक्षत्रों की आभा से अनभिज्ञ था।
विलोम (कृष्णकथा)
यादवेनः तु भाराता संररक्ष महामनाः।
तां सः मानधरः गोमान् अनेमासमधामराः ॥ ४॥
अर्थात: यादवों के सूर्य, सबों को प्रकाश देने वाले, विनम्र, दयालु, गऊओं के स्वामी, अतुल शक्तिशाली श्रीकृष्ण के द्वारा की रक्षा भली-भांति की जाती थी।

अनुलोम (रामकथा)
यन् गाधेयः योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्ये असौ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमान् आम अश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥
अर्थात: गाधीपुत्र गाधेय (ऋषि विश्वामित्र) एक निर्विघ्न, सुखी एवं आनददायक यज्ञ करने को इक्षुक थे पर आसुरी शक्तियों से आक्रान्त थे। उन्होंने शांत, शीतल, गरिमामय त्राता श्रीराम का संरक्षण प्राप्त किया था।
विलोम (कृष्णकथा)
तं त्राता हा श्रीमान् आम अभीतं स्फीतं शीतं ख्यातं।
सौख्ये सौम्ये असौ नेता वै गीरागी यः योधे गायन ॥ ५॥
अर्थात: नारद मुनि, जो दैदीप्यमान, अपनी संगीत से योद्धाओं में शक्ति संचारक, त्राता, सद्गुणों से पूर्ण एवं ब्राह्मणों के नेतृत्वकर्ता के रूप में विख्यात थे, उन्होंने विश्व के कल्याण के लिए गायन करते हुए श्रीकृष्ण से याचना की जिनकी ख्याति में दयावान, शांत, एवं परोपकार को इक्षुक होने के कारण दिनोदिन वृद्धि हो रही थी।

अनुलोम (रामकथा)
मारमं सुकुमाराभं रसाज आप नृताश्रितं। 
काविरामदलाप गोसम अवामतरा नते ॥ ६॥
अर्थात: लक्ष्मीपति नारायण के सुन्दर, सलोने एवं तेजस्वी मानव अवतार श्रीराम का वरण रसाजा (भूमिपुत्री), धरातुल्य धैर्यशील, निज वाणी से असीम आनन्द प्रदाता एवं सुधि सत्यवादी सीता ने किया था।
विलोम (कृष्णकथा)
तेन रातम् अवाम अस गोपालात् अमराविक।
तं श्रित नृपजा सारभं रामा कुसुमं रमा ॥ ६॥
अर्थात: नारद द्वारा लाए गए, देवताओं के रक्षक, सत्यवादी, सत्य द्वारा प्रेषित, तत्वतः (वास्तव में) उज्जवल पारिजात पुष्प के सामान श्रीकृष्ण को नृपजा (नरेश-पुत्री) रमा (रुक्मिणी) ने निज पति के रूप में प्राप्त किया।

अनुलोम (रामकथा)
रामनामा सदा खेदभावे दयावान् अतापीनतेजाः रिपौ आनते।
कादिमोदासहाता स्वभासा रसामे सुगः रेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥
अर्थात: श्री राम दुःखियों के प्रति सदैव दयालु, सूर्य की तरह तेजस्वी मगर सहज प्राप्य, देवताओं के सुख में विघ्न डालने वाले राक्षसों के विनाशक, अपने बैरी एवं समस्त भूमि के विजेता, भ्रमणशील रेणुका-पुत्र परशुराम को पराजित कर जिन्होंने अपने तेज-प्रताप से शीतल शांत किया था।
विलोम (श्रीकृष्ण कथा)
मेरुभूजेत्रगा काणुरे गोसुमे सा अरसा भास्वता हा सदा मोदिका।
तेन वा पारिजातेन पीता नवा यादवे अभात् अखेदा समानामर ॥ ७॥
अर्थात: अपराजेय मेरु (सुमेरु) पर्वत से भी सुन्दर रैवतक पर्वत पर निवास करते समय रुक्मिणी को स्वर्णिम चमकीले पारिजात पुष्पों की प्राप्ति उपरांत धरती के अन्य पुष्प कम सुगन्धित एवं अप्रिय लगने लगे। उन्हें कृष्ण की संगत में ओजस्वी, नवकलेवर एवं दैवीय रूप प्राप्त करने की अनुभूति होने लगी।

अनुलोम (रामकथा)
सारसासमधात अक्षिभूम्ना धामसु सीतया।
साधु असौ इह रेमे क्षेमे अरम् आसुरसारहा ॥ ८॥
अर्थात: समस्त आसुरी सेना के विनाशक, सौम्यता के प्रतीक एवं प्रभावशाली नेत्रधारी रक्षक राम अपने अयोध्या निवास में सीता संग सानंद रह रहे है थे।
विलोम (कृष्णकथा)
हारसारसुमा रम्यक्षेमेर इह विसाध्वसा।
य अतसीसुमधाम्ना भूक्षिता धाम ससार सा ॥ ८॥
अर्थात: अपने गले में मोतियों के हार जैसे पारिजात पुष्पों को धारण किए हुए, प्रसन्नता व परोपकार की अधिष्ठात्री, निर्भीक रुक्मिणी आतशी पुष्पधारी कृष्ण संग निज गृह को प्रस्थान कर गयी।

अनुलोम (रामकथा)
सागसा भरताय इभमाभाता मन्युमत्तया।
स अत्र मध्यमय तापे पोताय अधिगता रसा ॥ ९॥
अर्थात: पाप से परिपूर्ण कैकेयी अपने पुत्र भरत के लिए क्रोधाग्नि से विक्षिप्त हो तप रही थी। लक्ष्मी की कान्ति से उज्जवलित धरती (अयोध्या) को उस मध्यमा (मझली पत्नी) ने पापी विधि से अपने पुत्र भरत के लिए ले लिया।
विलोम (कृष्णकथा)
सारतागधिया तापोपेता या मध्यमत्रसा।
यात्तमन्युमता भामा भयेता रभसागसा ॥ ९॥
अर्थात: सूक्ष्मकटि (पतले कमर वाली), अति विदुषी सत्यभामा, श्रीकृष्ण द्वारा उतावलेपन में पारिजात पुष्प रुक्मिणी को देने से उसे भेदभावपूर्वक जानकर आहत होकर क्रोध और घृणा से भर गई।

अनुलोम (रामकथा)
तानवात् अपका उमाभा रामे काननद आस सा।
या लता अवृद्धसेवाका कैकेयी महद अहह ॥ १०॥
अर्थात: क्षीणता के कारण लता जैसी पीतवर्णी और समस्त आनन्दों से परे कैकेयी, श्रीराम के वनगमन का कारण बन उनके अभिषेक को अस्वीकारते हुए वृद्ध राजा की सेवा से विमुख हो गयी।
विलोम (कृष्णकथा)
हह दाहमयी केकैकावासेद्धवृतालया।
सा सदाननका आमेरा भामा कोपदवानता ॥ १०॥
अर्थात: सुमुखी (सुन्दर चहरे वाली) सत्यभामा ने अत्यंत विचलित और अशांत होकर दावाग्नि (जंगल की आग) की तरह क्रोध से लाल हो अपने भवन, जो मयूरों का वास और क्रीडास्थल था, उनके कपाटों को बंद कर दिया ताकि सेविकाओं का प्रवेश अवरुद्ध हो जाए।

अनुलोम (रामकथा)
वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरात् अहो।
भास्वरः स्थिरधीरः अपहारोराः वनगामी असौ ॥ ११॥
अर्थात: विनम्र, आदरणीय, सत्य के त्याग से और वचन पालन ना करने से लज्जित होने वाले, अद्भुत, तेजोमय, मुक्ताहारधारी, वीर एवं साहसी श्रीराम वन को प्रस्थान किए।
विलोम (कृष्णकथा)
सौम्यगानवरारोहापरः धीरः स्स्थिरस्वभाः।
हो दरात् अत्र आपितह्री सत्यासदनम् आर वा ॥ ११॥
अर्थात: संगीत की धनी सत्यभामा के प्रति समर्पित वीर, दृढ़चित्त श्रीकृष्ण कदाचित भय व लज्जा से आक्रांत हो सत्यभामा के निवास पंहुचे।

अनुलोम (रामकथा)
या नयानघधीतादा रसायाः तनया दवे।
सा गता हि वियाता ह्रीसतापा न किल ऊनाभा ॥ १२॥
अर्थात: अपने शरणागतों को शास्त्रोचित सद्बुद्धि देने वाली, धरती की पुत्री सीता, इस लज्जाजनक कार्य से आहत हो किन्तु अपनी कान्ति को बिना गँवाए वन गमन करने का साहस कर गईं।
विलोम (कृष्णकथा)
भान् अलोकि न पाता सः ह्रीता या विहितागसा।
वेदयानः तया सारदात धीघनया अनया ॥ १२॥
अर्थात: गूढ़ ज्ञान से परिपूर्ण सत्यभामा ने स्वयं को नीचा दिखाने से अपमानित होकर (देवी रुक्मिणी को पुष्प देने के कारण) तेजस्वी रक्षक कृष्ण, जो वैभवदाता हैं और जिनका वाहन गरुड़ है, उनकी ओर देखा ही नहीं।

अनुलोम (रामकथा)
रागिराधुतिगर्वादारदाहः महसा हह।
यान् अगात भरद्वाजम् आयासी दमगाहिनः ॥ १३॥
अर्थात: तामसी, उपद्रवी, दम्भी एवं अनियंत्रित शत्रुदल को अपने तेज से दहन करने वाले शूरवीर राम के निकट भारद्वाज आदि संयमी ऋषिगण थकान एवं क्लांत रूप में पँहुच कर याचना की।
विलोम (कृष्णकथा)
नो हि गाम् अदसीयामाजत् व आरभत गा; न या।
हह सा आह महोदारदार्वागतिधुरा गिरा ॥ १३॥
अर्थात: सत्यभामा ने पुष्पधारी श्रीकृष्ण के शब्दों पर ना तो ध्यान दिया और ना ही कुछ बोली जब तक कि श्रीकृष्ण ने पारिजात वृक्ष को लाने का संकल्प नहीं कर लिया।

अनुलोम (रामकथा)
यातुराजिदभाभारं द्यां व मारुतगन्धगम्।
सः अगम् आर पदं यक्षतुंगाभः अनघयात्रया ॥ १४॥
अर्थात: अपने तेज एवं प्रताप से असंख्य राक्षसों का नाश करने वाले श्रीराम स्वर्गतुल्य सुगन्धित पवन संचारित स्थल (चित्रकूट) पर यक्षराज कुबेर तुल्य वैभव व आभा संग लिए पंहुचे।
विलोम (कृष्णकथा)
यात्रया घनभः गातुं क्षयदं परमागसः।
गन्धगं तरुम् आव द्यां रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥
अर्थात: मेघवर्ण के श्रीकृष्ण सत्यभामा को उनके द्वारा किये गए अन्याय द्वारा जन्में घोर उपेक्षा को शांत करने हेतु अप्सराओं द्वारा शोभायमान एवं रम्भा जैसी सुंदरियों से जगमगाते स्वर्ग को गए ताकि वे सुगन्धित पारिजात वृक्ष तक पहुँच सकें।

अनुलोम रामकथा)
दण्डकां प्रदमो राजाल्या हतामयकारिहा।
सः समानवतानेनोभोग्याभः न तदा आस न ॥ १५॥
अर्थात: दंडकवन में संयमी, स्वस्थ नरेशों के शत्रु भगवान परशुराम को पराजित करने वाले, मनुष्यों को अपने निष्कलंक कीर्ति से आनन्दित करनेवाले श्रीराम ने प्रवेश किया।
विलोम (कृष्णकथा)
न सदातनभोग्याभः नो नेता वनम् आस सः।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥
अर्थात: सदा आनंददायी जननायक श्रीकृष्ण उस नन्दनवन को जा पहुंचे जो देवराज इंद्र के अतिआनंद का श्रोत था। ये वही इंद्र था जो आकर्षक काया वाली अहिल्या का प्रेमी था एवं जिसने छलपूर्वक अहिल्या की सहमति पा ली थी।

अनुलोम (रामकथा)
सः अरम् आरत् अनज्ञाननः वेदेराकण्ठकुंभजम्।
तं द्रुसारपटः अनागाः नानादोषविराधहा ॥ १६॥
अर्थात: श्रीराम जो महाज्ञानी हैं, जिनकी वाणी वेद है, जिन्हें वेद कंठस्थ है, वो कुम्भज (महर्षि अगस्त्य, जिन्हे ये नाम मटके में जन्म लेने के कारण मिला) के निकट जा पंहुचे। वे निर्मल वृक्ष वल्कल (छाल) परिधानधारी हैं जो अनेक पाप करने वाले विराध के संहारक हैं।
विलोम (कृष्णकथा)
हा धराविषदह नानागानाटोपरसात् द्रुतम्।
जम्भकुण्ठकराः देवेनः अज्ञानदरम् आर सः ॥ १६॥
अर्थात: हाय! उस इंद्र ने जो पृथ्वी को जलप्रदान करने वाले, किन्नरों-गन्धर्वों के सुरीले संगीत रस का आनंद लेने वाले और देवाधिपति हैं, उन्होंने जैसे ही जम्बासुर संहारक श्रीकृष्ण का आगमन सुना, वे अनजाने भय से ग्रसित हो गए।

अनुलोम (रामकथा)
सागमाकरपाता हाकंकेनावनतः हि सः।
न समानर्द मा अरामा लंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७॥
अर्थात: वेदों में निपुण एवं सन्तों के रक्षक श्रीराम को गरुड़ (जटायु) ने झुक कर नमन किया। वो श्रीराम जिनके प्रति स्वयं लंकेश की बहन (शूर्पणखा) ने भी काम याचना की थी।
विलोम (कृष्णकथा)
तं रसासु अजराकालं म आरामार्दनम् आस न।
स हितः अनवनाकेकं हाता अपारकम् आगसा ॥ १७॥
अर्थात: वे (श्रीकृष्ण), जो वृद्धावस्था व मृत्यु से परे थे, पारिजात वृक्ष की प्राप्ति की इच्छा से स्वर्ग गए। तब इंद्र जो कृष्ण के हितैषी थे, उन्हें स्वर्ग में रहते हुए भी अपार दुःख प्राप्त हुआ।

अनुलोम (रामकथा)
तां सः गोरमदोश्रीदः विग्राम् असदरः अतत।
वैरम् आस पलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥
अर्थात: पृथ्वी को प्रिय श्रीराम की दाहिनी भुजा एवं उन्हें गौरव प्रदान करने वाले उनके भाई निडर लक्ष्मण द्वारा नाक काटे जाने पर उस मांसभक्षी (शूर्पणखा) ने सूर्यवंशी (श्रीराम) के प्रति बैर पाल लिया।
विलोम (कृष्णकथा)
केशवं विरसानाविः आह आलापसमारवैः।
ततरोदसम् अग्राविदः अश्रीदः अमरगः असताम् ॥ १८॥
अर्थात: उल्लास, जीवनीशक्ति और तेज के ह्रास का भान होने पर केशव (श्रीकृष्ण) से मित्रवत वाणी में इंद्र, जिसने उन्नत पर्वतों को (अपने वज्र से) परास्त कर महत्वहीन किया था, तथा जिसने अमर देवों के नायक के रूप में दुष्ट असुरों को श्रीविहीन किया, उन्होंने धरा व नभ के रचयिता (कृष्ण) से कहा।

अनुलोम (रामकथा)
गोद्युगोमः स्वमायः अभूत् अश्रीगखरसेनया।
सह साहवधारः अविकलः अराजत् अरातिहा ॥ १९॥
अर्थात: पृथ्वी व स्वर्ग के सुदूर कोने तक व्याप्त कीर्ति के स्वामी श्रीराम द्वारा खर की सेना को परास्त करने से उनकी छवि एक गौरवशाली, निडर, शत्रु संहारक एवं शालीन योद्धा के रूप में चमक उठी।
विलोम (कृष्णकथा)
हा अतिरादजरालोक विरोधावहसाहस।
यानसेरखग श्रीद भूयः म स्वम् अगः द्युगः ॥ १९॥
अर्थात: हे कृष्ण! सर्वकामनापूर्ति करने वाले देवों के गर्व का शमन करने वाले, जिनका वाहन वेदात्मा गरुड़ है, जो वैभव प्रदाता श्रीपति हैं तथा जिन्हें स्वयं कुछ ना चाहिए, आप इस दिव्य वृक्ष को धरती पर ना ले जाएँ।

अनुलोम (रामकथा)
हतपापचये हेयः लंकेशः अयम् असारधीः।
रजिराविरतेरापः हा हा अहम् ग्रहम् आर घः ॥ २०॥
अर्थात: पापी राक्षसों का संहार करनेवाले श्रीराम पर निम्न विचार नीच एवं विकृत लंकेश (रावण) जिनके साथ सदैव मदिरापान करनेवाले क्रूर राक्षसगण विद्यमान रहते थे हैं, उसने आक्रमण करने का विचार किया।
विलोम (कृष्णकथा)
घोरम् आह ग्रहं हाहापः अरातेः रविराजिराः।
धीरसामयशोके अलं यः हेये च पपात हः ॥ २०॥
अर्थात: व्यथाग्रसित हो एवं शत्रु के शक्ति को भूल कर सूर्य की तरह शुभ्र स्वर्णाभूषण द्वारा अलंकृत किन्तु कुत्सित बुद्धि वाले देवराज इंद्र ने उन्हें (श्रीकृष्ण को) बंदी बनाने का आदेश दे दिया।

अनुलोम (रामकथा)
ताटकेयलवादत् एनोहारी हारिगिर आस सः।
हा असहायजना सीता अनाप्तेना अदमनाः भुवि ॥ २१॥
अर्थात: ताड़कापुत्र मारीच के वध से प्रसिद्द, अपनी वाणी से पाप का नाश करने वाले तथा जो अत्यंत मनभावन है, उनकी हाय सुनकर (मृगरूपी मारीच द्वारा श्रीराम के स्वर में सीता को पुकारने पर) असहाय सीता अपने उस स्वामी श्रीराम के बिना व्याकुल हो गईं।
विलोम (कृष्णकथा)
विभुना मदनाप्तेन आत आसीनाजयहासहा।
सः सराः गिरिहारी ह नो देवालयके अटता ॥ २१॥
अर्थात: प्रद्युम्न संग देवलोक में विचरण कर रहे कृष्ण को रोकने में जयंत के पिता, अथाह संपत्ति के स्वामी एवं पर्वतों को अपनी शक्ति से झुका देने वाले इंद्र असमर्थ हो गए।

अनुलोम (रामकथा)
भारमा कुदशाकेन आशराधीकुहकेन हा।
चारुधीवनपालोक्या वैदेही महिता हृता ॥ २२ ॥
अर्थात: लक्ष्मी जैसी तेजस्विता उस सर्वपूजिता सीता का अंत समय आसन्न होने के कारण नीच दुष्ट छली नीच राक्षस (रावण) द्वारा उच्च विचारों वाले वनदेवताओं के सामने ही अपहरण कर लिया गया।
विलोम (कृष्णकथा)
ताः हृताः हि महीदेव ऐक्य अलोपन धीरुचा।
हानकेह कुधीराशा नाकेशा अदकुमारभाः ॥ २२॥
अर्थात: तब एक ब्राह्मण की मैत्री से उस लुप्त अविनाशी, चिरस्थायी ज्ञान व तेज को पुनर्प्राप्त कर नाकेश (इंद्र), जिनकी इच्छा पलायन करने वाले देवताओं की रक्षा करने की थी, उन्होंने आकुल कुमार प्रद्युम्न का प्रताप हर लिया।

अनुलोम (रामकथा)
हारितोयदभः रामावियोगे अनघवायुजः।
तं रुमामहितः अपेतामोदाः असारज्ञः आम यः ॥ २३॥
अर्थात: मनोहारी एवं मेघवर्णीय श्रीराम को सीता से वियोग के पश्चात निर्विकार हनुमान और सुग्रीव का सहयोग मिला जो अपनी पत्नी रुमा के श्रद्धेय थे और अपने भाई बाली द्वारा सताए जाने के कारण अपना सुख गवां कर, विचारहीन एवं शक्तिहीन हो श्रीराम के शरणागत हो गए।
विलोम (कृष्णकथा)
यः अमराज्ञः असादोमः अतापेतः हिममारुतम्।
जः युवा घनगेयः विम् आर आभोदयतः अरिहा ॥ २३॥
अर्थात: तब देवताओं से युद्ध का परित्याग कर चुके अतुल्य साहसी प्रद्युम्न, आकाश में संचारित शीतल पवन से पुनर्जीवित हो अपने गुरुजनों का गुणगान किया और तब उनके द्वारा शत्रुओं को पराजित कर उनपर विजय प्राप्त किया गया।

अनुलोम (रामकथा)
भानुभानुतभाः वामा सदामोदपरः हतं।
तं ह तामरसाभक्क्षः अतिराता अकृत वासविम् ॥ २४॥
अर्थात: सूर्य से भी अधिक तेजस्वी, रमणीक पत्नी (सीता) को निरंतर अतुल आनंद प्रदान करने वाले तथा नयन कमल की भांति उज्जवल हैं, उन श्रीराम ने इंद्र के पुत्र बाली का संहार किया।
विलोम (कृष्णकथा)
विं सः वातकृतारातिक्षोभासारमताहतं।
तं हरोपदमः दासम् आव आभातनुभानुभाः ॥ २४॥
अर्थात: उस कृष्ण ने, जिनके तेज के समक्ष सूर्य भी गौण है, जिसने अपने उत्तेजित सेवक उस गरुड़ की रक्षा की जिसने अपने पंखों की फड़फड़ाहट मात्र से शत्रुओं की शक्ति और गर्व को क्षीण किया था और उन्होंने कभी भगवान शंकर से भी युद्ध किया था। 

अनुलोम (रामकथा)
हंसजारुद्धबलजा परोदारसुभा अजनि।
राजि रावण रक्षोरविघाताय रमा आर यम् ॥ २५॥
अर्थात: हंसज (सूर्यपुत्र सुग्रीव) के अपराजेय सैन्यबल की महती भूमिका ने श्रीराम के गौरव में वृद्धि कर उनके द्वारा रावण वध करवा कर उन्हें विजयश्री दिलाई।
विलोम (कृष्णकथा)
यं रमा आर यताघ विरक्षोरणवराजिर।
निजभा सुरद रोपजालबद्ध रुजासहम् ॥ २५॥
अर्थात: उस श्रीकृष्ण के हिस्से में निर्मल विजयश्री की ख्याति आई जो बाणों की वर्षा सहने में समर्थ हैं, जिनका तेज युद्धभूमि को असुर-विहीन करने से चमकता है एवं जिनका स्वाभाविक तेज देवताओं पर विजय से दमक उठा।

अनुलोम (रामकथा)
सागरातिगम् आभातिनाकेशः असुरमासहः।
तं सः मारुतजं गोप्ता अभात् आसाद्य गतः अगजम् ॥ २६॥
अर्थात: समुद्र लांघ कर सहयाद्री पर्वत तक जा समुद्र तट तक पहुंचने वाले हनुमान जैसे दूत होने के कारण इंद्र से भी अधिक प्रतापी, असुरों की समृद्धि के लिए असहनशील उन रक्षक श्रीराम की कीर्ति में वृद्धि हो गई।
विलोम (कृष्णकथा)
जं गतः गदी असादाभाप्ता गोजं तरुम् आस तं।
हः समारसुशोकेन अतिभामागतिः आगस ॥ २६॥
अर्थात: जो गदाधारी हैं एवं अपरिमित तेज के स्वामी हैं वो श्रीकृष्ण अपने पुत्र प्रद्युम्न को दिए कष्ट से अत्यधिक कुपित हो स्वर्ग में उत्पन्न उस वृक्ष (पारिजात) को अधिकार में ले कर विजयी हुए।

अनुलोम (रामकथा)
वीरवानरसेनस्य त्रात अभात् अवता हि सः।
तोयधो अरिगोयादसि अयतः नवसेतुना ॥ २७॥
अर्थात: वीर वानर सेना के त्राता के रूप में विख्यात श्रीराम उस महान सेतुसमुन्द्र पर चलने लगे जो अथाह विस्तृत सागर के जीव-जंतुओं से भी उनकी रक्षा कर रहा था।
विलोम (कृष्णकथा)
ना तु सेवनतः यस्य दयागः अरिवधायतः।
स हि तावत् अभत त्रासी अनसेः अनवारवी ॥ २७॥
अर्थात: जो व्यक्ति प्रभु हरि की सेवा में रत रहते हुए उनका यशगान करता है वह प्रभु की दया प्राप्त कर शत्रुओं पर विजय पाता है। जो ऐसा नहीं करता है वह निहत्थे शत्रु से भी भयभीत होकर कान्तिविहीन हो जाता है।

अनुलोम (रामकथा)
हारिसाहसलंकेनासुभेदी महितः हि सः।
चारुभूतनुजः रामः अरम् आराधयदार्तिहा ॥ २८॥
अर्थात: चमत्कारिक रूप से साहसी उन श्रीराम द्वारा रावण के प्राण हरने पर देवताओं ने उनकी स्तुति की। वे रूपवती भूमिजा सीता के संगी हैं तथा शरणागतों का कष्ट निवारण करते हैं।
विलोम (कृष्णकथा)
हा आर्तिदाय धराम् आर मोराः जः नुतभूः रुचा।
सः हितः हि मदीभे सुनाके अलं सहसा अरिहा ॥ २८॥
अर्थात: वे (श्रीकृष्ण) जो लक्ष्मी को निज वक्षस्थली में रखते हैं, जो कीर्तियों के शरणस्थल हैं और जो प्रद्युम्न के हितैषी हैं अपने पुत्र (प्रद्युम्न) को युद्ध के कष्टों से उबारने के पश्चात ऐरावत वाले स्वर्गलोक को जीत कर पृथ्वी को वापस लौट आए।

अनुलोम (रामकथा)
नालिकेर सुभाकारागारा असौ सुरसापिका।
रावणारिक्षमेरा पूः आभेजे हि न न अमुना ॥ २९॥
अर्थात: नारियल के वृक्षों से आच्छादित एवं रंग-बिरंगे भवनों से निर्मित अयोध्या नगर अब रावण को पराजित करने वाले श्रीराम का समुचित निवास स्थल बन गया।
विलोम (कृष्णकथा)
ना अमुना नहि जेभेर पूः आमे अक्षरिणा वरा।
का अपि सारसुसौरागा राकाभासुरकेलिना ॥ २९॥
अर्थात: अनेकों विजयी गजराजों वाली भूमि द्वारका नगर में धर्म के वाहक सताप्रिय कृष्ण का प्रवेश क्रीडारत गोपियों के संग दिव्य वृक्ष पारिजात के साथ हुआ।

अनुलोम (रामकथा)
सा अग्र्यतामरसागाराम् अक्षामा घनभा आर गौः।
निजदे अपरजिति आस श्रीः रामे सुगराजभा ॥ ३०॥
अर्थात: अयोध्या का समृद्ध स्थल तामरस (कमल) पर विराजमान राज्यलक्ष्मी का सर्वोत्तम निवास बना। सर्वस्व न्योछावर करानेवाले अजेय श्रीराम के प्रतापी शासन का उदय हुआ।
विलोम (कृष्णकथा)
भा अजराग सुमेरा श्रीसत्याजिरपदे अजनि।
गौरभा अनघमा क्षामरागा स अरमत अग्र्यसा ॥ ३०॥
अर्थात: सत्यभामा के आँगन में अवस्थित पारिजात में पुष्प प्रस्फुटित हुए। सत्यभामा इस निर्मल संपत्ति को पाकर श्रीकृष्ण की प्रथम भार्या रुक्मिणी के प्रति इर्ष्याभाव का त्याग श्रीकृष्ण संग सुखपूर्वक रहने लगी।

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