गुरुवार, जून 06, 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.२ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने महर्षि वशिष्ठ के विषय में पढ़ा। महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र की प्रतिद्वंदिता बहुत प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में एक महान राजा हुए गाधि। उनके पुत्र थे कौशिक जो आगे चलकर विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक बार विश्वामित्र अपने १०० पुत्रों और एक अक्षौहिणी सेना लेकर वन से गुजर रहे थे। वहीँ उन्हें पता चला कि पास में ही महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है। तो उनका आशीर्वाद लेने के लिए विश्वामित्र उनके आश्रम पहुँचे। राज्य के राजा को अपने आश्रम में आया हुआ देख कर महर्षि वशिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वे कुछ दिन अपनी सेना के साथ उनका आथित्य ग्रहण करें।

ये सुनकर विश्वामित्र ने कहा - 'हे महर्षि! मैं तो यहाँ केवल आपके दर्शनों के लिए आया था। किन्तु मेरे साथ मेरी एक अक्षौहिणी सेना है। आप किस प्रकार उनके खान-पान की व्यवस्था करेंगे? इसी कारण मैं आपको कष्ट नहीं देना चाहता।' तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा - 'राजन! आप उसकी चिंता ना करें। मेरे पास गौमाता कामधेनु की पुत्री नंदिनी है जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है। इसके रहते आपको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा।' ये सुनकर विश्वामित्र कौतूहलवश महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में रुक गए। 

उन्हें ये देख कर आश्चर्य हुआ कि गउओं में श्रेष्ठ नंदिनी उनकी सेना द्वारा इच्छित हर सामग्री क्षणों में उपस्थित कर देती थी। तब उन्होंने सोचा कि ऐसी गाय की अधिक आवश्यकता तो उन्हें है। इस आश्रम में उसका क्या काम? यही सोच कर विश्वामित्र ने लौटते समय उनसे नंदिनी गाय को माँगा किन्तु महर्षि वशिष्ठ ने ये कहकर उन्हें मना कर दिया कि ये गाय उन्हें उनके प्राणों से भी अधिक प्रिय है। ये देख कर विश्वामित्र ने नंदिनी को जबरन अपने साथ ले जाने की ठानी। उनकी आज्ञा से उसकी सेना बलात नंदिनी को ले जाने लगी। 

तब नंदिनी ने महर्षि वशिष्ठ से कहा - 'हे महर्षि! आप क्यों मुझे जाने से नहीं रोकते?' तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा - 'पुत्री! विश्वामित्र मेरे अथिति हैं और फिर उनके साथ इतनी सेना है। उनका विरोध कर मुझे तुम्हे रोकना उचित नहीं लग रहा।' तब नंदिनी ने कहा - 'कृपया आप मुझे आत्मरक्षा की आज्ञा दें।' ये सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने उसे अपनी रक्षा करने की आज्ञा दे दी। उनकी गया पाते ही नंदिनी ने अपने खुरों से विशाल सेना उत्पन्न की जो भांति-भांति के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी। उन्होंने बात ही बात में विश्वामित्र की पूरी सेना का नाश कर दिया।

ये देख कर विश्वामित्र के १०० पुत्र महर्षि वशिष्ठ का वध करने को उनकी ओर दौड़े किन्तु महर्षि वशिष्ठ ने केवल अपने एक दृष्टिपात से उनके एक पुत्र को छोड़ कर शेष ९९ पुत्रों को भस्म कर दिया। अपनी पूरी सेना और पुत्रों को खो कर विश्वामित्र घोर शोक में घिर गए और तब उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से प्रतिशोध लेने की ठानी। उनका मन राज-काज और मोह माया से उठ गया और फिर उन्होंने अपने उस एक पुत्र को राज-पाठ सौंपा और वही से तपस्या करने सीधे हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए। 

उन्होंने हिमालय में घोर तपस्या की और महादेव को प्रसन्न किया। वरदान स्वरुप उन्होंने महादेव से सम्पूर्ण धर्नुविद्या का ज्ञान और सभी प्रकार के दिव्यास्त्र कर उससे भी ऊपर ब्रह्मास्त्र प्राप्त कर लिया। वो दिव्यास्त्र किस लिए प्राप्त कर रहे थे ये तो महादेव को पता ही था इसीलिए उन्होंने विश्वामित्र को कहा कि इन दिव्यास्त्रों का दुरुपयोग ना करें अन्यथा इतनी विद्या होने के बाद भी उन्हें पराजय ही प्राप्त होगी।' उस समय तो विश्वामित्र ने हामी भर दी किन्तु भीतर से वो प्रतिशोध की आग में जल रहे थे। 

धनुर्विद्या और दिव्यास्त्रों का पूर्ण ज्ञान होने पर विश्वामित्र प्रतिशोध लेने महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और उन्होंने महर्षि वशिष्ठ को युद्ध के लिए ललकारा। उन्होंने एक-एक कर महर्षि वशिष्ठ पर अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर लिया किन्तु उन्हें परास्त नहीं कर पाए। एक-एक कर उन्होंने व्यवयास्त्र, आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पर्वतास्त्र, पर्जन्यास्त्र, गंधर्वास्त्र, मोहनास्त्र इत्यादि सभी अस्त्र-शस्त्र उनपर चला दिए किन्तु महर्षि वशिष्ठ ने उन सभी दिव्यास्त्रों को बीच में ही रोक लिया। अंत में कोई और उपाय ना देखकर विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।

जब महर्षि वशिष्ठ ने ब्रह्मास्त्र को अपनी ओर आता देखा तो उन्होंने महाविनाशकारी 'ब्रह्माण्ड अस्त्र' (ब्रह्माण्ड अस्त्र ब्रह्मास्त्र से ५ गुणा अधिक शक्तिशाली माना जाता है) को प्रकट किया जो विश्वामित्र के ब्रह्मास्त्र को पी गया। इतने पर भी महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र का वध नहीं किया और उन्हें सम्मानपूर्वक वापस लौटा दिया। इससे और भी अपमानित होकर विश्वामित्र पुनः घोर तपस्या करने चले गए। 

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