शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2019

५१ शक्तिपीठ

हिंदू धर्म में हिंदू धर्म में शक्तिपीठों का बहुत महत्व है। दक्ष के यज्ञ में जब सती ने आत्मदाह किया तब महारुद्र ने वीरभद्र को भेजकर यज्ञ का ध्वंस करवा दिया। फिर वे सती का मृतशरीर उठा कर इधर-उधर घूमने लगे। महादेव को इस प्रकार व्यथित देख कर ब्रह्माजी के सुझाव पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के ५१ खंड कर दिए। वे अंग जहाँ-जहाँ भी गिरे वो स्थान शक्तिपीठ कहलाया। ये पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हुए हैं (सबसे अधिक पश्चिम बंगाल में)। तो आज हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि जब सती के शव को भगवान शिव अपने कंधे पर उठाकर ले जा रहे थे तो उनके अंग कहां - कहां गिरे और वहां पर कौन-कौन सी शक्तिपीठ स्थापित हुए।
  1. हिंगुल (पाकिस्तान): कराची से लगभग १२५ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में हिंगलाज स्‍थित है। यहाँ देवी का ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) गिरा। यहाँ देवी "कोट्टरी" नाम से स्‍थापित हैं।
  2. शर्कररे (पाकिस्तान): कराची के सुक्कर स्टेशन के निकट ये मंदिर मौजूद है। हालाँकि एक अन्य मान्यता के अनुसार इसे नैनादेवी मंदिर, बिलासपुर में भी बताया जाता है। यहां देवी की आंख गिरी थी और वे "महिष मर्दिनी" कहलाती हैं।
  3. सुगंध (बांग्लादेश): बांग्लादेश के शिकारपुर, बरिसल से २० किमी दूर सोंध नदी के किनारे देवी की नासिका गिरी थी और उसका नाम "सुनंदा" है। 
  4. अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर): पहलगांव, काश्मीर के पास देवी का गला गिरा था और वे यहाँ "महामाया" के रूप में स्‍थापित हैं।
  5. ज्वाला जी (हिमाचल प्रदेश): कांगड़ा जिले में स्थित इस मंदिर में देवी की जीभ गिरी थी और उनका नाम पड़ा "सिधिदा (अंबिका)"
  6. जालंधर (पंजाब): जालंधर में छावनी स्टेशन निकट देवी तलाब में उनका बांया वक्ष गिरा और वे "त्रिपुरमालिनी" नाम से स्‍थापित हुईं।
  7. अम्बाजी मंदिर (गुजरात): यहाँ देवी का हृदय गिरा था और वे "अम्बाजी" कहलाईं।
  8. गुजयेश्वरी (नेपाल): विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के साथ ही गुजयेश्वरी देवी का मंदिर है जहाँ माता के दोनों घुटने गिरे बताये जाते हैं। यहाँ देवी का नाम "महाशिरा" है।
  9. मानस (तिब्बत): कैलाश पर्वत, मानसरोवर के निकट एक पाषाण शिला के रूप में मौजूद हैं देवी। यहाँ उनका दायाँ हाथ गिरा और वे "दाक्षायनी" कहलाईं।
  10. बिराज (उड़ीसा): उत्कल में देवी की नाभि गिरी और वे "विमला" बनीं।
  11. पोखरा (नेपाल): गंडकी नदी के तट पर मुक्तिनाथ मंदिर में देवी का मस्तक गिरा और वे "गंडकी चंडी" कहलाईं।
  12. बाहुल (पश्चिम बंगाल): अजेय नदी तट, केतुग्राम, कटुआ वर्धमान जिले के लगभग ८ किलोमीटर दूर "बहुला" देवी हैं जहां देवी का बायाँ हाथ गिरा था।
  13. उज्जनि (पश्चिम बंगाल): वर्धमान जिले के गुस्कुर स्टेशन के पास माता की दाईं कलाई गिरी और "मंगल चंद्रिका" देवी की स्‍थापना हुई।
  14. उदरपुर (त्रिपुरा): माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर राधाकिशोरपुर गाव के निकट माता का दायाँ पैर गिरा और वे देवी "त्रिपुरसुन्दरी" बनीं।
  15. चिट्टागौंग (बांग्लादेश): छत्राल में चंद्रनाथ पर्वत शिखर जो सीताकुण्ड स्टेशन के निकट है वहाँ देवी की दायीं भुजा गिरी और नाम पड़ा "भवानी"
  16. जलपाइगुड़ी (पश्चिम बंगाल): त्रिस्रोत, सालबाढ़ी गांव, बोडा मंडल में माँ का बायाँ पैर गिरा और वे "भ्रामरी देवी" कहलाईं।
  17. गुवाहाटी (असम): कामगिरि, कामाख्या में नीलांचल पर्वत के निकट उनकी योनि गिरी और वे "कामाख्या देवी" के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
  18. खीरग्राम (पश्चिम बंगाल): वर्धमान जिले के पास माता के दायें पैर का अंगूठा गिरा और नाम मिला "जुगाड्या"
  19. कोलकाता (पश्चिम बंगाल): कलकत्ता के प्रसिद्ध कालीघाट में माता के दायें पैर का अंगूठा गिरा और वे माँ "कालिका" बनीं।
  20. प्रयाग (उत्तर प्रदेश): संगम पर माँ के हाथ की अंगुली गिरी और वहाँ वे "ललिता" के नाम से प्रसिद्ध हुई।
  21. कालाजोर (बांग्लादेश): भोरभोग गांव, खासी पर्वत, जयंतिया परगना, सिल्हैट जिला में देवी की बायीं जंघा गिरी। वहाँ वे "जयंती" नाम से स्‍थापित है।
  22. मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल): किरीटकोण ग्राम में देवी का मुकुट गिरा और वे "विमला" कहलाईं।
  23. वाराणसी (उत्तर प्रदेश): मणिकर्णिका घाट, काशी में उनकी मणिकर्णिका गिरी और वे "विशालाक्षी (मणिकर्णी)" रूप में प्रसिद्ध हुईं।
  24. कन्याश्रम (तमिलनाडु): भद्रकाली मंदिर में देवी की पीठ गिरी और वे "श्रावणी" कहलाईं।
  25. कुरुक्षेत्र (हरियाणा): यहाँ माता की एड़ी गिरी और माता "सावित्री" का मंदिर स्‍थापित हुआ। 
  26. पुष्कर (राजस्थान): मणिबंध, गायत्री पर्वत में देवी की दो पहुंचियां गिरी थीं। यहां देवी का नाम है "गायत्री"
  27. जैनपुर (बांग्लादेश): श्री शैल के पास सिल्हैट टाउन में देवी का गला गिरा। यहाँ उनका नाम "महालक्ष्मी" है।
  28. कांची (पश्चिम बंगाल): कोपई नदी तट पर देवी की अस्थि गिरी और वे "देवगर्भ" रूप में स्‍थापित हुईं।
  29. अमरकंटक (मध्यप्रदेश): अमरकंटक में कमलाधव नाम के स्‍थान पर शोन नदी के किनारे एक गुफा में माँ "काली" स्‍थापित हैं जहां उनका बायां नितंब गिरा।
  30. अमरकंटक (मध्य प्रदेश): यहीं शोन्देश में उनका दायां नितंब गिरा और नर्मदा नदी का उद्गम होने के कारण देवी "नर्मदा" कहलाईं।
  31. चित्रकूट (उत्तर प्रदेश): रामगिरि, चित्रकूट में दायां वक्ष गिरा नाम पड़ा "शिवानी"
  32. वृंदावन (उत्तर प्रदेश): भूतेश्वर महादेव मंदिर के पास उत्तर प्रदेश में दवी के केशों का गुच्छ और चूड़ामणि गिरी। वे यहां "उमा" नाम से प्रसिद्ध हुईं।
  33. कन्याकुमारी (तमिलनाडु): शुचि, शुचितीर्थम शिव मंदिर के पास में ऊपरी दाढ़ गिरी और नाम पड़ा "नारायणी"
  34. कन्याकुमारी (तमिलनाडु): वहीं पंचसागर में उनकी निचली दाढ़ गिरी और नाम पड़ा "वाराही"
  35. भवानीपुर (बांग्लादेश): यहाँ उनकी बायीं पायल गिरी और वे "अर्पण" नाम से जानी गई।
  36. कुर्नूल (आँध्रप्रदेश): श्रीशैलम में उनकी दायीं पायल गिरी और स्‍थापित हुईं देवी "श्री सुंदरी"
  37. मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल): विभाष, तामलुक में देवी की बायीं एड़ी गिरी। यहाँ उन्हें "कपालिनी (भीमरूप)" के नाम से जाना जाता है।
  38. जुनागढ (गुजरात): प्रभास तीर्थ के निकट देवी "चंद्रभागा" का आमाशय गिरा।
  39. उज्जैन (मध्यप्रदेश): भैरव पर्वत पर क्षिप्रा नदी के किनारे देवी के ऊपरी होंठ गिरे यहां वे "अवंति" नाम से जानी जाती हैं।
  40. नासिक (महाराष्ट्र): जनस्थान में माता की ठोड़ी गिरी और देवी "भ्रामरी" रूप में स्‍थापित हुईं।
  41. सर्वशैल (आंध्र प्रदेश): राजमहेंद्री में उनके गाल गिरे और देवी को नाम मिला "राकिनी (विश्वेश्वरी)"
  42. बिरात (राजस्थान): यहाँ उनके बायें पैर की उंगुली गिरी। देवी कहलाईं "अंबिका"
  43. हुगली (पश्चिम बंगाल): रत्नावली में देवी का दायां कंघा गिरा और उनका नाम है "कुमारी"
  44. मिथिला (भारत-नेपाल सीमा): यहाँ देवी का बायां कंधा गिरा था। नाम पड़ा "उमा"
  45. बीरभूम (पश्चिम बंगाल): नलहाटी में पैर की हड्डी गिरी और देवी का नाम पड़ा "कलिका" देवी।
  46. कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश): कर्नाट में देवी के दोनों कान गिरे और नाम पड़ा "जय दुर्गा"
  47. वक्रेश्वर (पश्चिम बंगाल): यहाँ भ्रूमध्य गिरा और वे कहलाईं "महिषमर्दिनी"
  48. यशोर (बांग्लादेश): ईश्वरीपुर, खुलना जिला में हाथ एवं पैर गिरे और माँ कहलायी "यशोरेश्वरी"। 
  49. अट्टहास (पश्चिम बंगाल): यहाँ माता के होठ गिरे और वे "फुल्‍लारा" देवी के नाम से प्रसिद्ध हुई। 
  50. नंदीपुर (पश्चिम बंगाल): यहाँ माता के गले का हार गिरा और वे "नंदनी" के नाम से प्रसिद्ध हुई। 
  51. ट्रिंकोमाली (श्रीलंका): यहाँ एक मंदिर था जो पुर्तगली बमबारी में ध्वस्त हो चुका है और महज एक स्तंभ शेष है। यह प्रसिद्ध त्रिकोणेश्वर मंदिर के निकट है। देवी की पायल यहाँ गिरी यहां वे "इंद्रक्षी" कहलाती हैं।
इन सब के अतिरिक्त एक सबसे बड़ी शक्तिपीठ हम सबके घर में विद्यमान है वह है हमारी "माँ" जिसकी सेवा, जिसका आशीर्वाद इन सब से ऊपर है। यदि हमने वह प्राप्त कर लिया तो हमें और कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है।
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ये लेख हमें डॉक्टर विदुषी शर्मा से प्राप्त हुआ है। ये दिल्ली की निवासी हैं और वर्तमान में इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय में ऐकडेमिक कॉउंसलर के पद पर नियुक्त हैं। साथ ही ये इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गेनाइजेशन, दिल्ली की महासचिव भी हैं। इनके कई लेख और रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे २२ शोध, ५ पुस्तक अध्याय एवं १ ईबुक भी है। इन्होने करीब १७ अंतर्राष्ट्रीय एवं १८ राष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लिया है और १५ से अधिक पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। इसके अतिरिक्त ये कई पत्रिकाओं और संस्थाओं की सदस्य भी हैं और राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू, डॉक्टर किरण बेदी, हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहरलाल खट्टर एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों के समक्ष अपने शोध प्रस्तुत कर चुकी हैं। धर्मसंसार में इनके सहयोग के लिए हम इनके आभारी हैं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. नेपालके पूरवमे धरानके विजयपुर पहाडी पर देवीके दाॅत गिरे जहा उन्हे दन्तकालीके नामसे जाना जाता है ।

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  2. वेद और रामायण तो दूर आज के मात्र पाँच हजार वर्ष पूर्व रचित महाभारत में भी सती द्वारा पार्वती बनकर वनवासी श्रीराम की परीक्षा लेनें, दक्ष यज्ञ में सती का आत्मदाह कर के आत्महत्या करनें, और पार्वती के रूप में दुसरा जन्म लेकर फिर से शंकरजी से विवाह करनें का कोई उल्लेख नही है।
    ये केवल शिव पुराण के रचीयता की गढ़ी हुई कहानी के आधार पर है।
    महाभारत का प्रमाण प्रस्तुत है।
    महाभारत/ शान्तिपर्व/मौक्षधर्म पर्व/अध्याय 283–284 में उल्लेखित दक्षयज्ञ विव्वन्स प्रकरण अवश्य पढ़ें। महाभारत ग्रन्थ शिव पुराण से अधिक प्राचीन रचना है।अतः अधिक प्रामाणिक है।
    महाभारत/शान्ति पर्व / मौक्षधर्म पर्व अ . 283–284 में स्पष्ट उल्लेख है कि,प्रचेताओं के पुत्र दक्ष (द्वितीय) द्वारा गंगाद्वार (हरिद्वार) में आयोजित यज्ञ में देवताओं द्वारा पुर्वकाल से निर्धारित व्यस्था के अनुसार दक्ष द्वितीय ने पशुपति रुद्र को यज्ञभाग का अधिकारी न होने के कारण आमन्त्रित नही किया था। यह देख पशुपति रुद्र के भक्त महर्षि दधीचि ने यज्ञ का बहिष्कार किया।
    कैलाश में रहते हुए भगवती उमादेवी ने देवगणों के समुहों को यज्ञ की ओर जाते देख और पशुपति रुद्र को उस यज्ञ के विषय में निरपेक्ष देख उस आयोजन के बारे में जानकारी ली तब उमा ने उस यज्ञ में पशुपति के सम्मिलित न होने का कारण पुछने पर रुद्र ने बतलाया कि, देवताओं द्वारा पुर्वकाल से निर्धारित व्यस्था के अनुसार दक्ष द्वितीय ने पशुपति रुद्र को यज्ञभाग का अधिकारी न होने के कारण आमन्त्रित नही किया है।
    यह सुन देवी को क्रुद्ध और दुखी हुई देख कर उनके शोक निवारणार्थ वत्रासुर युद्ध के समय ललाट के पसीने से उत्पन्न ज्वर / वीर भद्र का आव्हान किया और वीर भद्र ने पशुपति रुद्रदेव के आदेश पर अपने अनुचर रुद्रगणों और भद्रकाली के साथ मिलकर दक्ष द्वितीय का यज्ञ विध्वन्स कर दिया।और पुछने पर दक्ष को स्वयम् और भद्रकाली का परिचय देकर यज्ञ में रुद्र को यज्ञभाग नही देने के और पशुपति रुद्रदेव को आमन्त्रित नकरने के कारण क्रोधित और दुखी भगवती सती उमा पार्वती का दु:ख निवारणार्थ दक्ष(द्वितीय) द्वारा आयोजित यज्ञ विध्वन्स के आदेश पालनार्थ यज्ञ विध्वन्स की जानकारी दी। तथा समाधान हेतु रुद्र स्तुति का उपदेश दिया।
    दक्ष द्वितीय ने हिरणगर्भ ब्रह्मा के निर्देशानुसार पशुपति रुद्र का आव्हान किया तो भगवती उमा सहित रुद्र पधारे। तब दक्ष द्वितीय ने पशुपति रुद्रदेव की सहस्त्रनाम स्तुति कर और ब्रह्माजी द्वारा निर्धारित यज्ञभाग देकर पुजन कर प्रसन्न किया। तब रुद्रदेव ने यज्ञ पुर्णता का आशिर्वाद दिया। और उमा सहित कैलाश लोट गये।
    महाभारत में इस पुरे प्रकरण में
    1- दक्ष द्वितीय को सतीदेवी भगवती उमा पार्वती का पिता नही कहा है।
    2- तथाकथित दक्ष पुत्री शिवपत्नी सतीदेवी द्वारा अकेले दक्ष यज्ञ में आकर पिता दक्ष से झगड़ने और यज्ञाग्नि या योगाग्नि में आत्मदाह कर मृत्यु का वरण करने का कोई उल्लेख नही है। बल्कि वरदान देने के पश्चात उमा सहित पशुपति दक्ष के सामने से ओझल होगये कहा है।
    3- चुँकि, सती देवी की आत्मदाह का वर्णन नही है अतः सतीदेवी का दग्ध मृत देह कन्धेपर लाद कर उन्मत्त हो शंकरजी का लोक लोकान्ततर में भटकते हुए घुमते समय सतीदेवी के अङ्गो के गिरे टुकड़ो पर 51 शक्तिपीठ स्थापित होने की काल्पनिक कथा होने का प्रश्न ही नही।
    4 चुँकि, सती देवी की आत्मदाह का वर्णन नही है अतः सतीदेवी का हिमाचल के घर मेना के गर्भ से पार्वतीजी के रुप में पुनर्जन्म का उल्लेख भी नही है। इसी कारण हिमाचल पुत्री पार्वती का शिवजी से विवाह का उल्लैख भी नही है। तो पुरोहित का उल्लेख होना भी सम्भव नही है।
    शिवपुराणोक्त कथा को आधार पर दी गई जानकारी विश्वस्नीय नही है।।
    मुझे आत्म सन्तोष करने को कल्पभेद से दोनों कथाएँ सही है ऐसा भ्रम पालना पड़ेगा। अस्तु जो मुझे ही स्वीकार नही ऐसी मिथ्या जानकारी देना मैं अनुचित मानता हूँ।
    शिव पुराण भी वेदिक परम्परा से बिल्कुल भिन्न और अधिकांश पुराणों, महाभारत तथा रामायण से भी एकदम भिन्न है।पर रामचरितमानस शिव पुराण के निकट है।
    जैसे महाभारत के अनुसार सती का दक्षयज्ञ में आत्मदाह और दुसरे जन्म में पार्वती के रुप में जन्म का वर्णन नही होकर महाभारत सती और पार्वती दोनो नाम एक ही के हैं।दो अलग- अलग जन्म के नही।
    सती द्वारा सीता जी का वेश बनाकर श्रीराम की परीक्षा लेने की शिवपुराण और रामचरितमानस की कहानी भी रामायण में नही है।
    रामचरित मानस के राम पत्थर बनी अहिल्या को स्वयम् के पेर छुआते हैं/ लात मारते हैं। जबकि वाल्मीकि के राम तपस्यारत अहल्या के चरण स्पर्ष कर चरण वन्दन करते हैं।

    अतः क्षमाप्रार्थी हूँ।

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    1. प्रदीप जी, कई कथाएं लोक कथाओं के रूप में प्रचलित होती है, ये भी कुछ ऐसी ही है। रही बात मानस की तो हाँ उसमें श्रीराम अपने चरणों के स्पर्श (लात नहीं मारते) अहिल्या का उद्धार करते हैं और रामायण में चरणस्पर्श कर।

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