शनिवार, अक्तूबर 24, 2009

श्रीकृष्ण और भगवान शिव का युद्ध

दानवीर दैत्यराज बलि के सौ प्रतापी पुत्र थे, उनमें सबसे बड़ा बाणासुर था। बाणासुर ने भगवान शंकर की बड़ी कठिन तपस्या की। शंकर जी ने उसके तप से प्रसन्न होकर उसे सहस्त्र भुजाएं तथा अपार बल दे दिया। उसके सहस्त्र बाहु और अपार बल के भय से कोई भी उससे युद्ध नहीं करता था। इसी कारण से बाणासुर अति अहंकारी हो गया। बहुत काल व्यतीत हो जाने के पश्चात् भी जब उससे किसी ने युद्ध नहीं किया।

तब एक दिन बाणासुर भगवान शंकर के पास जाकर बोला, "हे चराचर जगत के ईश्वर! मुझे युद्ध करने की प्रबल इच्छा हो रही है किन्तु कोई भी मुझसे युद्ध नहीं करता। अतः कृपा करके आप ही मुझसे युद्ध करिये।" उसकी अहंकारपूर्ण बात को सुन कर भगवान शंकर को क्रोध तो बहुत आया किन्तु बाणासुर उनका परमभक्त था इसलिये अपने क्रोध का शमन कर उन्होंने कहा, "रे मूर्ख! तुझसे युद्ध करके तेरे अहंकार को चूर-चूर करने वाला उत्पन्न हो चुका है। जब तेरे महल की ध्वजा गिर जाये तभी समझ लेना कि तेरा शत्रु आ चुका है।" ये सुनकर बाणासुर निराश होकर कैलाश से चला गया।

बाणासुर की उषा नाम की एक परम सुन्दर कन्या थी। एक बार उषा ने स्वप्न में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को देखा और उसपर मोहित हो गई। उसने अपने स्वप्न की बात अपनी सखी चित्रलेखा को बताया। चित्रलेखा ने अपने योगबल से पहले प्रद्युम्न का चित्र बनाया और उषा को दिखा कर पूछा कि क्या उसने इसी को स्वप्न में देखा था? तब उषा बोली कि इनका मुख तो उससे मिलता है किन्तु ये वो नहीं है। फिर चित्रलेखा ने श्रीकृष्ण का चित्र बनाया जो अपने दादा श्रीकृष्ण का प्रतिरूप ही था। श्रीकृष्ण की तस्वीर देख कर उषा ने कहा - "सखी! ये वही है किन्तु पता नहीं क्यों इसे देख कर मेरे मन में पितृ तुल्य भाव आ रहे हैं।"

ये सुनकर चित्रलेखा समझ गयी कि उषा ने स्वप्न में अनिरुद्ध को देखा है। तब उसने अनिरुद्ध का चित्र बनाया और उषा को दिखाया। उसे देखते ही उषाने ने लज्जा से अपना सर झुका लिया और कहा - "हाँ! इन्ही को मैंने स्वप्न में देखा था और मैं इससे प्रेम करने लगी हूँ। इनके बिना अब मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी।" ये देख केर चित्रलेखा माया से द्वारका पहुँची और सोते हुये अनिरुद्ध उषा के महल में पहुँचा दिया। नींद खुलने पर अनिरुद्ध ने स्वयं को एक नये स्थान पर पाया और देखा कि उसके पास एक अनिंद्य सुन्दरी बैठी हुई है। अनिरुद्ध के पूछने पर उषा ने बताया कि वह बाणासुर की पुत्री है और अनिरुद्ध को पति रूप में पाने की कामना रखती है। अनिरुद्ध भी उषा पर मोहित हो गये और उन्होंने उषा के साथ गन्धर्व विवाह कर लिया। 

जब बाणासुर को ये पता चला तो वो उषा के कक्ष में पहुँचा। वहां अनिरुद्ध को देख कर वो क्रोध से पागल हो गया और उसे युद्ध के लिए ललकारा। उसकी ललकार सुनकर अनिरुद्ध भी युद्ध के लिये प्रस्तुत हो गये और उन्होंने लोहे के एक भयंकर मुद्गर को उठा कर उसी के द्वारा बाणासुर के समस्त अंगरक्षकों को मार डाला। वाणासुर और अनिरुद्ध में घोर युद्ध होने लगा। बाणासुर अपार बल का स्वामी था और शिव का पुत्र माना जाता था इसीलिए उसकी माया से अनिरुद्ध पार नहीं पा सका और अंततः उस युद्ध में पराजित हुआ। तब बाणासुर ने उसे कारागार में डाल दिया।

इधर द्वारिका पुरी में अनिरुद्ध की खोज होने लगी और उनके न मिलने पर वहाँ पर शोक छा गया। तब देवर्षि नारद ने वहाँ पहुँच कर अनिरुद्ध का सारा वृत्तांत कहा। इस पर श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न, सात्यिकी, गद, साम्ब आदि सभी वीर चतुरंगिणी सेना के साथ लेकर बाणासुर के नगर शोणितपुर पहुँचे। उन्होंने आक्रमण करके वहाँ के उद्यान, परकोटे, बुर्ज आदि को नष्ट कर दिया। श्रीकृष्ण ने एक बाण से बाणासुर के महल की ध्वजा गिरा दी। आक्रमण का समाचार सुन बाणासुर भी अपनी सेना को साथ लेकर आ गया जिसका नेतृत्व उसका सेनापति कुम्भाण्ड कर रहा था। जब बाणासुर ने अपनी ध्वजा गिरी देखी तो उसे भगवान शंकर की बात याद आ गयी।

युद्ध आरम्भ हुआ। बलराम कुम्भाण्ड तथा कूपकर्ण आदि दैत्यों से जा भिड़े, प्रद्युम्न एक साथ कई योद्धाओं से युद्ध करने लगा और और श्रीकृष्ण बाणासुर के सामने आ डटे। घनघोर संग्राम होने लगा, बाणों की वर्षा ने पूरे आकाश को घेर लिया। बलराम ने शीघ्र ही कुम्भाण्ड और कूपकर्ण को मार डाला। बाणासुर ने अपनी पूरी शक्ति से श्रीकृष्ण पर प्रहार किया। दोनों महान वीर थे और भिन्न-भिन्न दिव्यास्त्रों से एक दूसरे पर प्रहार कर रहे थे। बाणासुर से तो स्वयं रावण जैसा महारथी भी बच कर रहता था किन्तु फिर भी बाणासुर के बल की एक सीमा थी। किन्तु श्रीकृष्ण के बल की क्या सीमा? जल्द ही बाणासुर के सभी दिव्यास्त्र समाप्त हो गए।

उधर श्रीकृष्ण लगातार बाणासुर के योद्धाओं का अंत कर रहे थे। अब बाणासुर को लगा कि अगर युद्ध ऐसे ही चलता रहा तो उसका विनाश निश्चित है। तब उसे अपने आराध्य भगवान शंकर की याद आयी जिन्होंने उसे वरदान दिया था कि वे उसकी हर आपदा से रक्षा करेंगे। तब बाणासुर ने महादेव का स्मरण किया। बाणासुर की पुकार सुनकर भगवान शिव ने कार्तिकेय के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित अन्य शिवगणों को बाणासुर की सहायता के लिए भेज दिया। कार्तिकेय के नेतृत्व में शिवगणों ने श्रीकृष्ण की सेना पर चारो ओर से आक्रमण कर दिया। ऐसा भीषण आक्रमण देख कर श्रीकृष्ण की सेना भय के मारे पलायन करने लगी।

अपनी सेना का मनोबल टूटता देख कर श्रीकृष्ण ने महादेव द्वारा ही प्राप्त सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। १००० आरों वाला वो महान दिव्यास्त्र भयंकर प्रलयाग्नि निकलता हुआ शिवगणों को तप्त करने लगा। श्रीकृष्ण और बलराम की सम्मलित शक्ति के समक्ष शिवगण तो टिक नहीं पाए किन्तु कार्तिकेय इससे प्रभावित ना होकर युद्ध करते रहे। तब श्रीकृष्ण और बलराम ने सुदर्शन चक्र और दिव्य हल से कार्तिकेय पर आक्रमण किया। उन दिव्यास्त्रों से कार्तिकेय का कोई अहित तो नहीं हुआ किन्तु बाणासुर की सेना का नाश होता रहा। श्रीकृष्ण ने अपने महान धनुष श्राङ्ग प्रलय मचा दिया। ये देख कर कार्तिकेय और शिवगणों ने एक स्वर में महादेव का आह्वान किया।

अब अपने भक्त की रक्षा को स्वयं भगवान महारुद्र रणभूमि में आये। भगवान शंकर को वहाँ आया देख कर श्रीकृष्ण ने बलराम सहित अपने शस्त्रों को त्याग कर उन्हें प्रणाम किया और उनकी अभ्यर्थना की। भगवान शंकर ने श्रीकृष्ण को आशीर्वाद दिया और मधुर स्वर में कहा - "हे वासुदेव! आप जिस बाणासुर का वध करने को उद्यत हैं वो मेरा भक्त है और कार्तिकेय के सामान ही मेरे पुत्र समान है। मैंने उसकी रक्षा का वचन उसे दिया है इसीलिए आप उसके वध का विचार त्याग कर वापस चले जाएँ।"

तब श्रीकृष्ण ने करबद्ध होकर कहा - "हे महेश्वर! जिस प्रकार बाणासुर आपका भक्त है उसी प्रकार मैं भी आपका भक्त हूँ। मेरा बल और शक्ति आपके द्वारा ही प्रदत्त है। ये सुदर्शन, जो शत्रुओं का नाश कर रहा है, स्वयं आपके तीसरे नेत्र से उत्पन्न हुआ है। किन्तु अब जब आप स्वयं युद्ध हेतु पधारे हैं तो युद्ध से पीछे हट कर मैं स्वयं आपका अपमान नहीं कर सकता।" ये सुनकर विवश होकर भगवान शिव ने अपना त्रिशूल उठाया। कार्तिकेय और शिवगणों सहित बाणासुर और श्रीकृष्ण की समस्त सेना युद्ध रोक कर खड़ी हो गयी। सभी देवता, सप्तर्षि एवं स्वयं परमपिता ब्रह्मा इस महान युद्ध को देखने हेतु आकाश में स्थित हो गए।

महारूद्र का रण रूप देख कर सभी ने भय से अपने नेत्र बंद कर लिए। यहाँ तक कि स्वयं बाणासुर भी उनका तेज सहन नहीं कर सका। केवल श्रीकृष्ण ही उनके सामने खड़े रहे। अब तो दोनों में वैसा ही महाभयंकर युद्ध होने लगा जैसा कालांतर में भगवान शिव और भगवान विष्णु के मध्य हुआ था। श्रीकृष्ण ने अपने समस्त दिव्यास्त्रों का प्रयोग महादेव पर कर दिया किन्तु उससे महाकाल का क्या बिगड़ता? अंत में भगवान शिव के त्रिशूल और वासुदेव के सुदर्शन के बीच द्वन्द हुआ किन्तु दोनों सामान शक्ति वाले ही सिद्ध हुए।

श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के परमावतार माने जाते हैं जो उनकी सभी १६ कलाओं के साथ अवतरित हुए थे। इसी कारण उन्हें उन सभी महास्त्रों का स्वतः ही ज्ञान था जो ज्ञान नारायण को था। हरिवंश पुराण में ये वर्णन है कि जब श्रीकृष्ण के सभी दिव्यास्त्र विफल हुए तो उन्होंने नारायण का सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र "विष्णुज्वर" को महादेव पर चला दिया। विष्णुज्वर भयानक नाद करता हुआ भगवान शंकर की ओर बढ़ा। तब महादेव ने भी अपने एक महान अस्त्र "शिवज्वर" को विष्णुज्वर के प्रतिकार करने हेतु छोड़ दिया। ये संसार का प्रथम जैविक युद्ध भी माना जाता है। उन दोनों महास्त्रों से अधिक शक्तिशाली त्रिलोक में कोई और दिव्यास्त्र नहीं था और उनका ताप ऐसा था कि मनुष्य तो मनुष्य, स्वयं देवता भी मूर्छित हो गए।

अब परमपिता ब्रह्मा ने देखा कि उनकी सृष्टि का नाश निश्चित है। अतः वे उस युद्ध को रोकने हेतु स्वयं रणभूमि में आये। उन्होंने कहा - "हे कृष्ण! हे महादेव! आप दोनों क्यों सृष्टि के नाश को तत्पर है? आपको भली भांति ज्ञात है कि अगर ये दोनों महास्त्र आपस में टकराये तो त्रिभुवन का नाश अवश्यम्भावी है। जब सृष्टि ही नहीं रहेगी तो आप रक्षा किसकी करेंगे? हे महादेव! आप ये कैसे भूल गए कि स्वयं आपने ही बाणासुर को उसके अभिमान नष्ट होने का श्राप दिया था। श्रीकृष्ण आपके ही श्राप के अनुमोदन के लिए बाणासुर से युद्ध कर रहे हैं। अतः आप अपना क्रोध शांत करें और इस युद्ध का अंत करें।" तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने भी उनसे युद्ध से विरत हो जाने की प्रार्थना की। उन दोनों की बात सुनकर महादेव अपनी सेना सहित युद्ध क्षेत्र से हट गए।

महादेव के जाने के बाद श्रीकृष्ण पुनः बाणासुर पर टूट पड़े। बाणासुर भी अति क्रोध में आकर उनपर टूट पड़ा और अपनी १००० भुजाओं में विभिन्न प्रकार के अस्त्र लेकर उनपर प्रहार करने लगा। ये देख कर श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र निकला और बाणासुर की भुजाएं कटनी प्रारंभ कर दी। एक-एक करके उन्होंने बाणासुर की ९९८ भुजाएँ काट दी। किन्तु इससे भी उनका क्रोध शांत ना हुआ तो उन्होंने बाणासुर के अंत का निश्चय कर लिया। उनकी आज्ञा का पालन करते हुए सुदर्शन बाणासुर की ओर बढ़ा।

बाणासुर के प्राणों का अंत निश्चित देख कर भगवान शंकर एक बार फिर उसकी रक्षा हेतु रणक्षेत्र में आ गए। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा - "हे माधव! बाणासुर को मेरी ओर से अभय प्राप्त है अतः मैं उसे मरने नहीं दे सकता। मेरे विचार में उसे पर्याप्त दंड मिल चुका है। अब इसके केवल दो भुजाएं ही शेष हैं। अतः या तो उसे प्राणदान दें अथवा पुनः मुझसे युद्ध करें।"

ये सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा - "प्रभु! मैं भी इस महान योद्धा का वध नहीं करना चाहता किन्तु इसने अनिरुद्ध को बंदी बना रखा है जिसे लिए बिना मैं वापस नहीं लौट सकता।" ये जानकर भगवान शंकर ने बाणासुर से अनिरुद्ध को मुक्त करने की आज्ञा दी। उनकी आज्ञा मानते हुए बाणासुर ने ना केवल अनिरुद्ध को मुक्त किया बल्कि अपनी पुत्री उषा का विवाह भी उससे कर दिया। फिर कुछ काल तक वही सुखपूर्वक रहने के पश्चात श्रीकृष्ण और बलराम अनिरुद्ध और उषा के साथ द्वारिका लौट गए।

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