2 दिसंबर 2019

गयासुर - २

पिछले लेख में आपने धर्म परायण और श्रीहरि के भक्त गयासुर के बारे में पढ़ा। आपने ये जाना कि किस प्रकार जीवमात्र की भलाई के लिए उसने भगवान विष्णु से ये वर मांग लिया कि उसे देखते ही कोई भी प्राणी मोक्ष को प्राप्त कर ले। किन्तु उसके इस वरदान के कारण सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया क्यूंकि हर प्राणी उसे देख कर बैकुंठ जाने लगा और यमपुरी खाली हो गयी। अब आगे...

अब जगत में बड़ी अवव्यस्था फ़ैल गयी। ये देख कर सभी देवता श्रीहरि की शरण में पहुँचे और उनसे कहा कि उन्ही के वरदान के कारण गयासुर समस्त संसार को मोक्ष प्राप्त करवा रहा है। मोक्ष की प्राप्ति तो स्वयं देवताओं के लिए भी कठिन है किन्तु आपके वरदान के कारण दुष्ट और पापी भी केवल गयासुर के दर्शन कर मोक्ष प्राप्त कर रहे हैं। अब आप कृपया हमें इस अव्यवस्थ से बचाएं। 

देवताओं की विनती सुनकर श्रीहरि विष्णु ब्रह्मदेव के पास गए और उनसे कहा कि आप जगत कल्याण के लिए एक महान यज्ञ कीजिये और उस यज्ञ की भूमि के लिए गयासुर से उसका शरीर मांग लीजिये। इस प्रकार सृष्टि के भले के लिए गयासुर ने जो वरदान माँगा है, जो वास्तव में सृष्टि में असंतुलन पैदा कर रहा है, जगत को उससे मुक्ति मिल जाएगी। 

ये सुनकर ब्रह्मदेव गयासुर के पास पहुँचे। जब गयासुर ने परमपिता को स्वयं अपने समक्ष पाया तो उन्हें दंडवत प्रणाम कर कहा - "हे परमेश्वर! मेरे अहोभाग्य जो आपने मुझे दर्शन दिए। आपके दर्शनों के लिए तो स्वयं देवताओं को भी घोर तप करना पड़ता है फिर क्या कारण है कि आप स्वयं मेरे समक्ष उपस्थित हुए हैं?"

ये सुनकर ब्रह्मदेव उससे बोले - "हे भक्तश्रेष्ठ! श्रीहरि की इच्छा है कि पृथ्वी पर एक ऐसा यज्ञ हो जैसा ना आज से पहले कभी हुआ हो और ना ही आज के बाद कभी वैसा यज्ञ हो सके। उनकी ये भी इच्छा है कि उस यज्ञ को स्वयं मैं संपन्न करवाऊं। किन्तु उस यज्ञ में एक अड़चन है जिसे केवल तुम ही दूर कर सकते हो। यही कारण है कि आज मैं तुम्हारे पास आया हूँ।"

तब गयासुर ने प्रसन्न होते हुए कहा - "मेरे अहोभाग्य जो स्वयं परमपिता मुझसे किसी सहायता की आशा करते हैं। मैं तो स्वयं जगत के कल्याण हेतु तत्पर रहता हूँ। आपने जिस यज्ञ की कामना की है वो तो निश्चय ही समस्त संसार को सुख प्रदान करने वाला होगा। ऐसे यज्ञ का आयोजन तो अवश्य होना चाहिए। किन्तु उसमें अड़चन क्या है? आप मुझे बताएं, मैं उस समस्या के निवारण का पूरा प्रयास करूँगा।"

तब ब्रह्मदेव ने कहा - "गयासुर! अड़चन ये है कि श्रीहरि के अनुसार वो यज्ञ किसी ऐसी भूमि पर होना चाहिए जो विश्व में सबसे अधिक पवित्र हो। उससे प्रवित्र ना को मानव, ना देव, ना गन्धर्व और ना ही कोई सिद्ध महर्षि ही हो। मुझे यज्ञ के लिए एक ऐसी भूमि चाहिए जिसे केवल देखने मात्र से मनुष्य जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाये। उस भूमि का पुण्य ऐसा हो जिसे देखने से समस्त जीव सीधे वैकुण्ठ जा सकें।"

ये सुनकर गयासुर आश्चर्य में पड़ गया और बहुत सोचने के बाद उसने कहा - "हे परमपिता! आपने जिस प्रकार की भूमि की आकांक्षा की है वैसी भूमि तो मिलना असंभव है। फिर जिस भूमि को स्वयं आप नहीं खोज पा रहे हैं जिसने समस्त सृष्टि की रचना की है तो मैं उसे किस प्रकार ढूंढ सकता हूँ। किन्तु एक स्थान ऐसा है जो आपकी सभी शर्तों को पूर्ण कर सकता है और वो मेरा शरीर है। स्वयं श्रीहरि के आशीर्वाद से जो कोई भी मेरे शरीर के दर्शन मात्र करता है वो मुक्त हो जाता है। अतः उस यज्ञ की भूमि हेतु मैं स्वयं अपना शरीर समर्पित करता हूँ। आप निश्चिंत हो मेरे शरीर पर वो यज्ञ संपन्न करें।

तब ब्रह्मदेव ने कहा - "हे गयासुर! तुम वास्तव में भक्तों में श्रेष्ठ हो। अपने शरीर का इस प्रकार दान देना हर किसी के लिए संभव नहीं है। तुम्हारे इस त्याग के कारण तुम्हारा नाम महर्षि दधीचि के सामान आदर से लिया जाएगा। तुम्हारे शरीर पर किया जाने वाला ये यज्ञ तीनों लोकों में अद्वितीय होगा।" ये कहकर ब्रह्मदेव यज्ञ की तैयारियों के लिए वापस अपने लोक चले गए।

...शेष

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें