13 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - २: यवक्रीत का हठ

पिछले लेख में आपने रैभ्य और भारद्वाज ऋषि के बीच की मित्रता के बारे में पढ़ा। जहाँ रैभ्य के पुत्र परावसु एवं अर्वावसु विद्वान थे वहीँ भारद्वाज का पुत्र यवक्रीत को शिक्षा प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं थी। परावसु को वहाँ के राजा ७ वर्षो के यज्ञ को करवाने हेतु अपने साथ ले गए। उधर दूसरों द्वारा सम्मान ना प्राप्त होने के कारण यवक्रीत भी तपस्या करने वन को चले गए।

यवक्रीत ने देवराज इंद्र की घोर तपस्या की। उसके तप से प्रसन्न होकर देवराज ने उसे दर्शन दिए और वर माँगने को कहा। तब यवक्रीत ने उनसे वर माँगा कि उसे संसार की सभी विद्या और सिद्धि प्राप्त हो जाये। इसपर देवराज इंद्र ने उससे हँसकर पूछा - "हे वत्स! जब तुम्हे स्वयं अपने पिता से ज्ञान और सिद्धि सहज ही प्राप्त हो सकती है फिर क्यों तुम इस प्रकार कठोर तप कर रहे हो?"

इसपर यवक्रीत ने कहा - "भगवन! शिक्षा में मेरी कोई रूचि नहीं है। अगर मुझे परिश्रम करना ही है तो मैं तप में करना उचित समझता हूँ। मैंने आपको अपने तप से प्रसन्न किया है अतः आप मुझे यही वरदान दीजिये कि मुझे बिना अध्ययन किये ही संसार की सभी विद्या प्राप्त हो जाये।" तब इंद्र ने कहा - "पुत्र! मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न अवश्य हूँ किन्तु बिना उद्योग किये इस संसार में कुछ प्राप्त नहीं होता। अतः जो परिश्रम तुम तप करने में कर रहे हो उसी परिश्रम से विद्या अध्ययन करो, तो तुम स्वयं ही संसार के सबसे विद्वान व्यक्ति बन जाओगे।"

ये कहकर इंद्र उसे वरदान दिए बिना वापस चले गए। अब यवक्रीत निराश हो गया और सोचने लगा कि क्या उसे वास्तव में देवराज के कहे अनुसार विद्या प्राप्त करनी चाहिए? ये सोच कर उसने अध्ययन करने का प्रयास किया किन्तु केवल एक ही दिन में उसने अध्यन छोड़ पुनः देवराज इंद्र की आराधना आरम्भ कर दी। यवक्रीत उन मनुष्यों में से था जो थोड़ा मानसिक श्रम करने से उचित कठोर शारीरिक कष्ट सहन करना उचित समझते हैं।

उसने लगातार ७ वर्षों तक पुनः घोर तपस्या की जिससे देवराज इंद्र को पुनः उसे दर्शन देना पड़ा। जब उन्होंने यवक्रीत से वर माँगने को कहा तो उसने पुनः वही वर माँगा कि उसे बिना पढ़े ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाये। तब इंद्र ने पुनः उसे समझने का प्रयत्न किया कि ज्ञान प्राप्त करने का जो मार्ग तुमने अपनाया है वो सही नहीं है। इस प्रकार प्राप्त की हुई विद्या कभी काम में नहीं आती है। किन्तु यवक्रीत अपनी बात पर अड़ा रहा। ये देख कर इंद्र ने उससे कहा कि ठीक है किन्तु पहले तुम नदी तट से स्नान करके आओ। 

इंद्र की बात सुनकर यवक्रीत प्रसन्नता पूर्वक नदी के तट पर पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि एक वृद्ध व्यक्ति नदी के किनारे पड़ी रेत को नदी में डाल रहा है। ये देखकर यवक्रीत ने उससे पूछा कि "हे वृद्धवर! आप ये क्या कर रहे हैं?" तब उस वृद्ध ने कहा - "पुत्र! मैं इस नदी पर पुल बनाने का प्रयास कर रहा हूँ।" ये सुनकर यवक्रीत को हँसी आ गयी। उसने हँसते हुए कहा - "महाराज! आपके मुट्ठी भर रेत डालने से गंगा पर पुल नहीं बन सकता अतः ये व्यर्थ प्रयास छोड़ दें।"

तब उस वृद्ध ने कहा - "पुल कैसे नहीं बन सकता? अगर भारद्वाज पुत्र यवक्रीत बिना अध्ययन किये ही विद्वान बन सकता है तब मैं भी इस नदी पर पुल बना सकता हूँ।" ये सुनकर यवक्रीत चौंका और उसने वृद्ध के रूप में देवराज इंद्र को पहचान लिया। उसने कहा - "हे देवराज! आपकी शिक्षा मेरी समझ में तो आ गयी किन्तु मैं क्या करूँ? मेरे लिए अध्ययन संभव ही नहीं है। अगर आप मुझे अब वर नहीं देते तो मैं निश्चय ही अपने हाँथ-पैर काट डालूंगा और स्वयं को अग्नि में झोंक दूंगा।"

यवक्रीत का ऐसा हठ देख कर अंततः इंद्र को उसे वरदान देना ही पड़ा। उन्होंने कहा - "हे ब्राह्मणपुत्र! तुम वापस अपने पिता के पास जाओ। शुभ समय में वेद स्वयं तुम्हारे और तुम्हारे पिता के समक्ष प्रकट होंगे और उस समय मेरे वरदान से तुम अपने पिता द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त कर सकोगे और विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त करोगे।" ये सुनकर यवक्रीत प्रसन्नता पूर्वक अपने पिता के पास लौटा और इंद्र के वरदान के कारण उसने अंततः ज्ञान प्राप्त कर ही लिया।"

...शेष

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