11 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - १: दो ऋषियों की मित्रता

कथा महाभारत के वन पर्व की है। युधिष्ठिर अपना सारा राज पाठ द्युत में हार कर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ १२ वर्षों के लिए वन चले गए। वहाँ सभी भाई, विशेषकर युधिष्ठिर ऋषियों-महर्षियों के सानिध्य में अपना दिन काट रहे थे। उनसे मिली शिक्षा उनके मनोबल को और दृढ करती थी। उसी समय लोमश ऋषि घुमते हुए उनके आश्रम में आये। सभी भाइयों ने उनकी बड़ी सेवा की। लोमश ऋषि ने उनसे उनका हाल समाचार पूछा।

तब युधिष्ठिर ने कहा - "हे महर्षि! अपने अंदर पल रहे प्रतिशोध की भावना पर कैसे अंकुश लगाया जा सकता है? आपको तो पता है कि हमारे साथ क्या हुआ है यही कारण है कि हमारे, विशेषकर भीमसेन के ह्रदय में सदैव प्रतिशोध की भावना रहती है।" तब लोमश ऋषि ने कहा - "पुत्र! प्रतिशोध की भावना सदैव अहित ही करती है अतः इससे बच कर ही रहना चाहिए। प्रतिशोध का क्या परिणाम हो सकता है ये बताने के लिए मैं तुम्हे एक कथा सुनाता हूँ।"

प्राचीन काल में रैभ्य एवं भारद्वाज नामक दो तपस्वी ऋषि थे जिनमे घनिष्ठ मित्रता थी। ऋषि रैभ्य महर्षि विश्वामित्र के पौत्र थे और भारद्वाज देवगुरु बृहस्पति के वंशज थे। जहाँ रैभ्य वेद-वेदाङ्गों के अध्ययन पर जोर देते थे वहीँ भारद्वाज संन्यास को श्रेष्ठ मानते थे। विपरीत विचारधारा होने के बाद भी दोनों ऋषियों में कभी भी किसी भी प्रकार का वैमनस्य नहीं रहता था। दोनों अपने अपने क्षेत्र के प्रकांड पंडित थे। 

रैभ्य मुनि के दो पुत्र थे - परावसु एवं अर्वावसु। भारद्वाज मुनि का केवल एक ही पुत्र था - यवक्रीत। ऋषि रैभ्य ने परावसु एवं अर्वावसु को भी अपने ही सामान वेदों और शास्त्रों का पारंगत पंडित बनाया। दूसरी और यवक्रीत का मन कभी भी अध्ययन में नहीं लगता था। ज्ञानी होने के कारण परावसु एवं अर्वावसु का सभी सम्मान करते थे किन्तु यवक्रीत को कोई भी ब्राह्मण अपने साथ बिठाना नहीं चाहता था। ये देख कर यवक्रीत को दोनों भाइयों से बड़ी ईर्ष्या होती थी।

उसके पिता भारद्वाज उसे सदा अध्ययन करने को बोलते थे किन्तु शिक्षा यवक्रीत के स्वाभाव में ही नहीं थी। किन्तु समाज में कहीं मान ना मिलने के कारण अंततः यवक्रीत ने ये निर्णय किया कि वो घोर तप करेगा। उसने अपने पिता से विदा ली और देवराज इंद्र की घोर तपस्या करने लगा। दैवयोग से उस समय वर्षा ना होने के कारण अकाल पड़ गया। तब वहाँ के राजा ऋषि भारद्वाज के पास आये और उनसे उस आपदा का उपाय पूछा। तब भारद्वाज ने उन्हे लगातार ७ वर्षों तक यज्ञ कर इंद्र को प्रसन्न करने को कहा।

तब राजा भारद्वाज से कहा कि आप ही ये यज्ञ करवाइये। तब उन्होंने कहा कि वे तो संन्यास की श्रेष्ठता को मानते हैं और कर्मकांडों का आयोजन नहीं करवाते। किन्तु राजा के बड़ा आग्रह करने पर उन्होंने उसे अपने मित्र रैभ्य के पास भेज दिया। रैभ्य ने राजा का स्वागत किया और कहा कि अब वे वृद्ध हो चुके हैं इसी कारण अनवरत ७ वर्षों तक यज्ञ नहीं करवा सकते।

अब राजा बड़े धर्म संकट में पड़ गए कि क्या किया जाये। उनकी समस्या देखकर ऋषि रैभ्य ने अपने परम ज्ञानी ज्येष्ठ पुत्र परावसु को उनकी जगह यज्ञ को पूरा करवाने के लिए राजा के साथ जाने को कहा। परावसु का विवाह कुछ समय पूर्व ही सुप्रभा नामक कन्या से हुआ था किन्तु अपने पिता की आज्ञा पालन करने को वे ७ वर्षों के लिए राजा के साथ चले गए।

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