20 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - ३: कृत्य का आह्वान

कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के कारण पिछले कुछ दिनों से कोई लेख नहीं प्रकाशित पाया, इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार यवक्रीत ने अपने हठ से, जो उसके योग्य ना था, उस ज्ञान को देवराज इंद्र से प्राप्त कर लिया। देवराज ने हालाँकि उसके हठ के कारण उसे वरदान अवश्य दिया किन्तु वे जानते थे कि इस प्रकार प्राप्त वरदान से किसी का कल्याण नहीं होता और यवक्रीत को भी इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।

जब यवक्रीत लौट कर आया तब तक सभी जगह ये प्रसिद्ध हो चुका था कि उसने इंद्र को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया है। अब विद्वानों की सभाओं में उसकी भी पूछ होने लगी। जब कोई व्यक्ति लगन और कड़े परिश्रम से स्वयं को प्रशंसा के योग्य बनाता है तो उसे ये ज्ञात रहता है कि उसे कोई सम्मान क्यों दे रहा है। यही कारण है कि उनके व्यहवार में स्थिरता होती है। किन्तु यवक्रीत के साथ ऐसा नहीं था। उसे वरदान उसके हठ के कारण प्राप्त हुआ था। यही कारण था कि शीघ्र ही यवक्रीत के मन में घमंड ने अपना घर कर लिया। अब वो अपने समक्ष किसी को कुछ ना समझने लगा।

एक बार यवक्रीत भ्रमण कर रहा था कि उसकी दृष्टि परावसु की पत्नी सुप्रभा पर पड़ी। उसका सौंदर्य देखकर यवक्रीत हित-अहित भूल गया। उसे ये भी ध्यान ना रहा कि वो एक ब्याहता स्त्री है। जब सुप्रभा ने यवक्रीत को देखा तो उसका स्वागत किया किन्तु शीघ्र ही उसकी बातों से उसे यवक्रीत की नीयत का पता चल गया। पहले यवक्रीत ने सुप्रभा को अपनी मधुर बातों से रिझाना चाहा किन्तु जब वो सफल ना हो सका तो उसने सुप्रभा को बलात वश में करना चाहा। सुप्रभा बहुत कठिनाई से वहाँ से भागी और अपने आश्रम पहुँची। 

वहाँ जब रैभ्य ने अपनी पुत्रवधु की ऐसी दशा देखी तो उसका कारण पूछा। तब सुप्रभा ने उन्हें सब कुछ बता दिया। ये देख कर ऋषि रैभ्य आग-बबूले हो गए। उन्होंने यवक्रीत को धिक्कारते हुए कहा - "रे अधम यवक्रीत! तेरा ये दुःसाहस! क्या देवराज इंद्र से तूने यही ज्ञान प्राप्त किया है कि किसी परस्त्री पर कुदृष्टि डाले? मैं तुझे इसका दंड दूँगा। मैं कृत्य का आह्वान करता हूँ और उसे तेरे प्राण लेने भेजूंगा। अपने मित्र भारद्वाज का मैं सम्मान करता हूँ इसीलिए अगर तुझे अपने प्राण बचाने हों तो अपने पिता के आश्रम में छिपा रह। किसी अन्य स्थान पर और कोई तुझे नहीं बचा सकता।"

ये कहकर रैभ्य ने अपनी एक जटा को तोडा और उसे अभिमंत्रित कर धरती पर पटका। उस जटा से काजल से भी काले और यम से भी भयंकर एक कृत्य की उत्पत्ति हुई। उसका रूप ऐसा भयानक था कि सुप्रभा तो उसे देख कर ही मूर्छित हो गयी। वो महाकाय कृत्य अपना विकराल शूल लेकर यवक्रीत को खोजने निकला। उधर गाँव के लोगों ने यवक्रीत को उस कृत्य के विषय में सूचित किया और कहा कि वो तत्काल अपने पिता के आश्रम चला जाये किन्तु यवक्रीत तो अपने पांडित्य पर मुग्ध था। उसे लगा कि वो अपने तपोबल से उस कृत्य को भस्म कर देगा। उसी घमंड में वो बाहर ही कृत्य की प्रतीक्षा करने लगा।

तभी उसे ढूंढता हुआ कृत्य वहाँ पर पहुँचा। उसके आने से दिन में ही अंधकार छा गया, पशु पक्षी भागने लगे और हवाएं तेज चलने लगी। जब यवक्रीत ने उस भयंकर कृत्य को देखा तो भय से कांप उठा। मारे भय के उसकी बुद्धि कुंठित हो गयी और वो मन्त्रों का गलत उच्चारण करने लगा। उसे समझ में आ गया कि उसने कितनी बड़ी गलती कर दी है। वो प्राण बचाने के लिए अपने पिता के आश्रम की ओर भागा किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। कृत्य ने उसे मार्ग में ही पकड़ा और अपने शूल के एक ही प्रहार से उसके प्राण हर लिए।

उसकी मृत्यु के पश्चात जब भारद्वाज को इस बात का पता चला तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे जानते थे कि उनके पुत्र ने पाप किया था किन्तु वो स्वयं भी रैभ्य के पुत्र के समान ही था। इसीलिए उसे इतना कठोर दंड देना भारद्वाज को न्याय नहीं ज्ञात हुआ और पुत्रशोक में उन्होंने रैभ्य को श्राप दे दिया कि उनकी मृत्यु स्वयं उनके पुत्र के हाथों ही होगी। जब रैभ्य को इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे नियति समझकर स्वीकार कर लिया।

...शेष

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