30 नवंबर 2019

गयासुर - १

पिछले लेख में आपने महर्षि मरीचि की सती पत्नी और धर्मराज की पुत्री धर्मव्रता के बारे में पढ़ा जो उनके श्राप के कारण एक शिला में परिणत हो गयी। बाद में ब्रह्मदेव की आज्ञा के अनुसार धर्मराज ने शिलरूपी अपनी पुत्री को धर्मपुरी में रख दिया। इसी कथा से सम्बद्ध एक और कथा आती है जो गयासुर की है। दैत्यकुल में एक से एक दुर्दांत दैत्य हुए किन्तु जिस प्रकार कीचड में ही कमल खिलता है, उसी प्रकार दैत्य कुल ने महान भगवत भक्त भी इस संसार को दिए। प्रह्लाद, बलि इत्यादि भक्तों के श्रेणी में ही गय नामक दैत्य भी था।

गय, जिसे गयासुर भी कहा जाता है, की उत्पत्ति के विषय में भिन्न-भिन्न मत हैं। सनत्कुमार और देवर्षि नारद के वार्तालाप में इस बात का वर्णन आया है कि गयासुर की उत्पत्ति स्वयं परमपिता ब्रह्मा से हुई थी। हालाँकि उसका सम्बन्ध महर्षि कश्यप और दिति की संतानों के वंश में बताया गया है। कश्यप और दिति की संतानें ही दैत्य कहलाई और उसी कुल में गय दैत्य भी जन्मा।

गय जन्म से ही भक्ति-भाव में डूबा रहता था। उसका शरीर बहुत विशाल था। भागवत में ऐसा वर्णन आया है कि गयासुर का शरीर १२५ योजन लम्बा और ६० योजन चौड़ा था। एक बार उसने तपस्या करने की ठानी और कोलाहल नामक पर्वत पर १००० वर्षों तक श्रीहरि की घोर तपस्या की। उसके तप के प्रभाव से डरकर इन्द्रादि देवता ब्रह्माजी के पास पहुँचे और उनसे इसका निराकरण करने को कहा। तब ब्रह्मदेव उन सभी को लेकर भगवान शिव के पास पहुँचे।

महादेव ने उनसे कहा कि अगर कोई भी मनुष्य तप करता है तो उसे उसका फल प्राप्त होता ही है। वैसे भी गयासुर भगवान विष्णु की तपस्या कर रहा है अतः हमें नारायण से ही इसका उपाय पूछना चाहिए। तब महादेव ब्रह्मा और अन्य देवताओं को लेकर भगवान विष्णु के पास पहुँचे। वहाँ भगवान विष्णु ने उन सभी का स्वागत किया और कहा कि वे गयासुर की तपस्या से अत्यंत प्रसन्न है अतः वे उन्हें अवश्य ही दर्शन देंगे। साथ ही उन्होंने देवराज इंद्र को आश्वासन दिया कि वे गयासुर को स्वर्ग का राज्य नहीं देंगे।

इसके बाद श्रीहरि ने गयासुर को दर्शन दिए और उससे पूछा कि वो क्यों इतना घोर तप कर रहा है? तब गयासुर ने उन्हें कहा कि वो तो केवल उन्ही के दर्शन हेतु तप कर रहा था। उसकी सच्चरित्रता देखकर श्रीहरि बड़े प्रसन्न हुए और उससे कोई भी वरदान मांगने को कहा। अब गयासुर सोचने लगा कि वो उनसे क्या आशीर्वाद मांगे। उसके मन में तो सदैव जीवमात्र के कल्याण की चिंता रहती थी। उसने सोचा कि अगर वो सभी जीवों की मुक्ति का साधन बन सके तो उससे सभी का बड़ा कल्याण होगा।

ये सोचकर गयासुर ने भगवान विष्णु से कहा - "हे सर्वेश्वर! वैसे तो आपके दर्शनों के अतिरिक्त मेरी और कोई लालसा नहीं है किन्तु यदि आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं तो ये वरदान दीजिये कि मेरे दर्शन मात्र से कोई भी जीव मोक्ष को प्राप्त हो जाये।" भगवान विष्णु ने उसे वैसा ही वरदान दिया और वापस अपने लोक लौट गए।

अब तो गयासुर का माहात्म्य और भी बढ़ गया। कोई भी प्राणी जो उसे देख लेता सीधा वैकुण्ठ को चला जाता था। इस कारण यमपुरी खाली हो गयी और सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया। पापी पुरुष अब बिना किसी भय के पास करने लगे कि एक बार गयासुर के दर्शन करने से तो उन्हें मोक्ष प्राप्त हो ही जाएगा। सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गयी। गयासुर ने जीव कल्याण के लिए जो वरदान माँगा था वही जीवों के लिए श्राप बन गया। सृष्टि की जो दशा धर्मव्रता के कारण हो गयी थी वही गयासुर के कारण भी हो गयी।

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