28 नवंबर 2019

धर्मव्रता - ३

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि मरीचि बिना जाने-बूझे अपनी पत्नी धर्मव्रता को शिला बनने का श्राप दे देते हैं। इससे क्रोधित होकर धर्मव्रता भी मरीचि को श्राप दे देती है कि उन्हें भी भगवान शंकर का श्राप झेलना होगा। ये सुनकर ब्रह्मदेव व्यथित होकर वहाँ से चले जाते हैं। अब आगे...

धर्मव्रता और महर्षि मरीचि दोनों श्राप पाने के बाद ब्रह्मदेव से पूछते हैं कि अब उन्हें क्या करना चाहिए। तब परमपिता उन्हें तप करने का आदेश देकर वहाँ से चले गए। उनके आदेशानुसार धर्मव्रता और महर्षि मरीचि घोर तप में लीन हो जाते हैं। महर्षि मरीचि भगवान शंकर की और धर्मव्रता भगवान विष्णु की तपस्या करने लगे। 

धर्मव्रता सती थी और निर्दोष होकर भी श्राप पाने के कारण अत्यंत व्यथित भी। उन्होंने ऐसा भीषण तप किया कि उसके ताप से समस्त विश्व जलने लगा। धर्मव्रता के तप की ऊष्मा बढ़ते हुए स्वर्गलोक तक जा पहुँची। उन्हें ऐसा भीषण तप करते देख देवराज इंद्र और समस्त देवता घबरा गए। उससे मुक्ति का उपाय जानने सभी देवता भगवान विष्णु के शरण में गए और उनसे सहायता की गुहार लगाई। 

तब श्रीहरि ने अंततः धर्मव्रत को दर्शन दिए। धर्मव्रता उन्हें देखकर आत्मविभोर हो गयी और उन्हें प्रणाम किया। तब श्रीहरि ने उनसे पूछा कि वो ऐसा कठिन तप क्यों कर रही है। इसपर धर्मव्रता ने कहा - "प्रभु! आप तो सब जानते ही है। मेरे पति ने मुझ निरपराध को शिला हो जाने का श्राप दे दिया। मेरी आपसे विनती है कि आप मुझे इस श्राप से मुक्ति दे दीजिये।"

तब नारायण ने कहा - "हे देवी! तुम्हारे पति ब्रह्मदेव के पुत्र हैं और साथ ही सप्तर्षि भी अतः उनके श्राप का पूर्ण निराकरण कर देना उचित नहीं होगा। किन्तु मैं कुछ ऐसा कर सकता हूँ कि ये श्राप तुम्हारे लिए वरदान बन जाये। मैं तुम्हे वरदान देता हूँ कि तुम जिस शिला में परिणत होगी वो अत्यंत ही पवित्र होगी। समस्त देवता सहित स्वयं मैं, ब्रह्मदेव और महादेव उसपर आसीन होंगे। कालांतर में तुम गयासुर के सर पर राखी जाओगी।"

तब धर्मव्रता ने एक वरदान और माँगा कि जो कोई भी मेरा स्पर्श करे उसे स्वर्ग प्राप्त हो। श्रीहरि ने ये वरदान भी दे दिया और बैकुंठ पधारे। उनके आशीर्वाद से धर्मव्रता एक अत्यंत पवित्र शिला में परिणत हो गयी और जो कोई भी उसे स्पर्श करता वो सीधा स्वर्गलोक जाता था। धीरे-धीरे ये बात प्रसिद्ध हो गयी और सभी प्राणी शिला रुपी धर्मव्रता को स्पर्श कर स्वर्गलोक जाने लगे। 

ऐसा होने से सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया और यमपुरी खाली हो गयी। तब धर्मराज परमपिता ब्रह्मा के पास गए और उनसे इस समस्या का हल पूछा। इसपर ब्रह्मदेव ने कहा - "हे धर्मराज! धर्मव्रता स्वयं तुम्हारी पुत्री है और नारायण के दिए वरदान के कारण ही ऐसा हो रहा है। अब नारायण का वरदान तो व्यर्थ नहीं जा सकता किन्तु हम प्राणियों को उससे वंचित अवश्य कर सकते हैं। तुम उसके पिता हो अतः तुम्ही उसे अपने पास यमपुरी में रख लो।"

ब्रह्मदेव की आज्ञा से धर्मराज ने शिलरूपी अपनी पुत्री को अपने पास धर्मपुरी में रख लिया जिससे सृष्टि का संतुलन पुनः स्थापित हुआ। कालांतर में यही महान पवित्र शिला गयासुर को स्थिर करने हेतु उसके सर पर रखी गयी। आज बिहार में स्थित तो अति पवित्र गया नामक स्थान है वो भी गयासुर के नाम पर ही पड़ा है और ये शिला वहाँ आज भी देखी जा सकती है।

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