26 नवंबर 2019

धर्मव्रता - २

पिछले लेख में हमने धर्मराज की पुत्री ऊर्णा (धर्मव्रता) के बारे में पढ़ा जो वर प्राप्ति के लिए घोर तपस्या करती हैं। उनकी भेंट ब्रह्मदेव के मानस पुत्र और सप्तर्षियों में से एक महर्षि मरीचि से होती है। मरीचि धर्मव्रता से विवाह करने की इच्छा प्रकट करते हैं और फिर धर्मव्रता के अनुरोध पर वे उनके पिता धर्मराज के पास जाते हैं और उनसे उनकी सहमति प्राप्त करते हैं। इसके बाद दोनों का विधिवत विवाह हो जाता है। अब आगे... 

विवाह के पश्चात कुछ काल उन्होंने बड़े सुख से बिताया। कुछ दिन के पश्चात एक दिन महर्षि मरीचि कही बाहर से अपने आश्रम आये। वे बड़े श्रमित थे और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। वे आते ही शैय्या पर लेट गए और धर्मव्रता से कहा - "प्रिये! आज मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है और मैं बहुत थका हुआ भी हूँ। मैं विश्राम करता हूँ और तुम कृपया मेरी पाद-सेवा करो। जब तक मैं सोकर ना उठूं, तुम उसी प्रकार मेरी पाद-सेवा करती रहना।"

अपने पति को ऐसा कहता देख कर धर्मव्रता प्रसन्नतापूर्वक उनकी चरण-सेवा करने लगी और उनकी सेवा से संतुष्ट होकर महर्षि मरीचि गहरी नींद में सो गए। अभी कुछ ही समय हुआ था कि अकस्मात् परमपिता ब्रह्मा स्वयं अपने पुत्र से मिलने मेरु पर्वत पर पधारे। वे महर्षि मरीचि के आश्रम के द्वार पर ही खड़े होकर अपने पुत्र या पुत्रवधु की प्रतीक्षा करने लगे।

जब धर्मव्रता ने देखा कि उनके स्वसुर एवं जगत के स्वामी भगवान ब्रह्मा स्वयं उनके आश्रम पधारे हैं और द्वार पर खड़े हैं तो वे बड़े धर्मसंकट में पड़ गयी। अगर वे अपने पति को छोड़ कर अपने स्वसुर के स्वागत को जाती तो उनके पति के आदेश की अवहेलना होती। अगर वो ना जाती तो उनके स्वसुर का अपमान होता। वे कुछ समय तक ये सोचती रही कि वे क्या करे?

थोड़ी देर सोचने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि ब्रह्मदेव उनके पति के पिता है इसीलिए सम्मान पर उनका अधिकार अधिक है। इसके अतिरिक्त वे सृष्टिकर्ता हैं और तीनों लोकों के स्वामी भी। उस अधिकार से भी स्वागत और सम्मान पर ब्रह्मदेव का अधिकार उनके पति से अधिक है। साथ ही साथ वे इस समय अतिथि भी है और गृहस्थ धर्म के अनुसार उनकी सेवा करना उनका कर्तव्य है। 

ये सोच कर धर्मव्रता महर्षि मरीचि की पाद-सेवा छोड़ कर ब्रह्मदेव के स्वागत को आश्रम के द्वार तक आयी और उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात उन्होंने ब्रह्मदेव को आसान प्रदान किया और उनके जलपान की व्यवस्था करने लगी। ठीक उसी समय महर्षि मरीचि की निद्रा टूटी। अपनी पत्नी को वहाँ ना देख कर उन्हें बड़ा क्रोध आया और दैवयोग से उनके मन में संदेह भी उत्पन्न हो गया कि इस प्रकार उन्हें छोड़ कर उनकी पत्नी कहाँ और किसके साथ चली गयी। 

उसी संदेह और क्रोध में महर्षि मरीचि ने बिना सत्य को जाने ही धर्मव्रता को शिला में बदल जाने का श्राप दे दिया। जब धर्मव्रता ने ये सुना तो उनके शोक की सीमा ना रही। वे महर्षि मरीचि के पास गयी और उन्हें रोषपूर्ण स्वर में कहा - "स्वामी! मैंने सारा जीवन आपका अनुसरण किया और आपकी इच्छा के विपरीत कुछ भी नहीं किया किन्तु फिर भी आज आपने बिना सत्यता को जाने मुझे ऐसा भीषण श्राप दे दिया। आपने निश्चय ही मेरे साथ अन्याय किया है इसीलिए मैं भी आपको श्राप देती हूँ कि आपको स्वयं महादेव का श्राप झेलना होगा।"

जब महर्षि मरीचि को सत्यता का पता चला तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उधर ब्रह्मदेव भी दोनों का व्यहवार देख कर बड़े दुखी हुए। उन्होंने दुखी स्वर में मरीचि से कहा - "पुत्र! तुम तो स्वयं ज्ञानी हो फिर किस प्रकार तुमने बिना सत्य को जाने अपनी पत्नी को श्राप दे दिया? यदि तुम चाहते तो अपनी दिव्य दृष्टि से सत्य का पता लगा सकते थे।"

फिर उन्होंने धर्मव्रता से कहा - "पुत्री! स्त्री तो सहनशीलता का प्रतीक होती है। ये सत्य है कि मेरे पुत्र ने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया है किन्तु तुमने भी बिना सोचे समझे उसे वापस श्राप दे दिया। यदि तुम मुझसे कहती तो मैं तुम्हे श्राप से मुक्ति दिलवा सकता था किन्तु अब तुम दोनों का प्रायश्चित यही है कि दोनों अपने भाग का श्राप भोगो।"

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