24 नवंबर 2019

धर्मव्रता - १

धर्मव्रता सप्तर्षियों में से प्रथम महर्षि मरीचि की धर्मपत्नी है। पुराणों में महर्षि मरीचि की तीन पत्नियों का वर्णन है। उनकी एक पत्नी प्रजापति दक्ष की कन्या सम्भूति थी। उनकी दूसरी पत्नी का नाम कला था और तीसरी पत्नी धर्मराज की कन्या ऊर्णा थी। ऊर्णा को ही धर्मव्रता कहा जाता है। इनकी माता का नाम विश्वरूप बताया गया है। जब धर्मव्रता बड़ी हुई तो उसके पिता धर्मराज ने उसके लिए योग्य वर ढूँढना चाहा किन्तु अपनी पुत्री के लिए उन्हें कोई योग्य वर नहीं मिला। तब धर्मराज ने अपनी पुत्री को वर प्राप्ति हेतु तपस्या करने को कहा।

अपने पिता की आज्ञा अनुसार धर्मव्रता वन में जाकर वर प्राप्ति हेतु तपस्या करने लगी। उसी समय भ्रमण करते हुए महर्षि मरीचि वहाँ आ पहुँचे। एक सुन्दर कन्या को इस प्रकार गहन वन में तपस्या करते देख उन्होंने उससे उसका परिचय पूछा। तब धर्मव्रता ने बताया कि वो धर्मराज की कन्या ऊर्णा है और वर प्राप्ति हेतु यहाँ इस जंगल में तपस्या कर रही है। 

तब महर्षि मरीचि ने कहा कि - "हे सुंदरी! मैं भी विवाह हेतु एक सर्वगुण संपन्न कन्या को ढूंढता फिर रहा हूँ किन्तु आज तक मुझे ऐसी कोई कन्या नहीं दिखी। किन्तु तुम्हे देख कर मुझे लगता है कि हम दोनों का संयोग अत्यंत ही शुभ होगा। अतः अगर तुम उचित समझो तो मुझसे विवाह कर लो।"

तब धर्मव्रता ने पूछा - "हे पुरुषश्रेष्ठ! तेज में स्वयं देवताओं को भी पीछे छोड़ने वाले आप कौन हैं? कृपया अपना परिचय दीजिये।" तब महर्षि मरीचि ने कहा - "भद्रे! मैं परमपिता ब्रह्मा का मानस पुत्र और सप्तर्षियों में से एक मरीचि हूँ। मेरा कुल और गोत्र सर्वथा तुम्हारे योग्य है। हम दोनों का संयोग निश्चय ही जगत को सुख देने वाला होगा। अतः तुम मुझसे विवाह कर लो।"

तब धर्मव्रता ने उनसे कहा - "हे महर्षि! मैं आपसे विवाह कर अत्यंत प्रसन्न होउंगी किन्तु इस समय मैं अपने पिता के अधीन हूँ। इसीलिए आप कृपया मेरे पिता धर्मराज के पास जाइये और उनसे मेरा दान मांगिये। यदि उनकी सहमति मिल गयी तब ही मैं आपसे विवाह कर सकती हूँ।"

ये सुनकर महर्षि मरीचि उसे वही छोड़ कर तत्काल उसके पिता धर्मराज के पास पहुंचे। जब धर्मराज ने स्वयं ब्रह्मापुत्र महर्षि मरीचि को अपने यहाँ आया देखा तो तत्काल उनके स्वागत के लिए द्वार पर आये। उन्होंने अर्ध्य-पान से उनका स्वागत किया और उनसे वहाँ आने का कारण पूछा।

तब महर्षि मरीचि ने कहा - "हे धर्मराज! मुझे ज्ञात हुआ है कि आप अपनी पुत्री धर्मव्रता के लिए एक योग्य वर की खोज कर रहे हैं। मैं भी अभी आपकी पुत्री से ही मिल कर आ रहा हूँ जो वर प्राप्ति के लिए पृथ्वी पर घोर तपस्या कर रही है। मैं भी बहुत काल से एक योग्य पत्नी की तलाश में पूरी पृथ्वी का भ्रमण कर रहा हूँ किन्तु आज तक मुझे अपने योग्य कोई कन्या ना मिली। किन्तु आपकी कन्या कसे मिलने के बाद मुझे लगा कि मेरी खोज पूर्ण हो गयी। अतः अगर आप उचित समझे तो अपनी कन्या का विवाह मुझसे कर दीजिये।"

ये सुनकर धर्मराज की प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा। उन्होंने प्रसन्न होते हुए कहा - "हे महर्षि! ये तो मेरी पुत्री का सौभाग्य है कि उसे पति के रूप में परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र प्राप्त होने वाले हैं। अपनी पुत्री के लिए आपसे योग्य वर मुझे तो कही नहीं दीखता। अतः मैं प्रसन्नतापूर्वक आपको अपनी पुत्री का दान देता हूँ।

उसके बाद धर्मराज ने अपनी पुत्री को अपने पास बुलाया और शुभ मुहूर्त देख कर दोनों का विवाह कर दिया। समस्त देवता परमपिता ब्रह्मा सहित उस विवाह में सम्मलित हुए। फिर धर्मव्रता विदा होकर अपने पति के साथ मेरु पर्वत पर स्थित उनके आश्रम में चली आयी। जिस प्रकार भगवान विष्णु के संग देवी लक्ष्मी स्वछन्द विचरण करती हैं, उसी प्रकार धर्मव्रता सुख पूर्वक अपने पति के संग रहने लगी।

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