3 नवंबर 2019

पुरुष द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को छठ के संध्या एवं प्रातः अर्ध्य की शुभकामनायें। पिछले लेख में आपने माता अदिति द्वारा किये जाने वाले सर्वप्रथम छठ पूजा के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम आपको बताएँगे कि वो कौन सा पहला पुरुष था जिसके द्वारा सर्वप्रथम छठ पूजा की गयी थी। ये तो हम सभी को पता है कि छठ पूजा कोई लिंग विशेष पूजा नहीं है और इसे स्त्री या पुरुष दोनों कर सकते हैं। पुराणों में भी देवी अदिति और प्रियव्रत द्वारा सर्वप्रथम इस पूजा को करने का प्रसंग आया है।

परमपिता ब्रह्मा के पुत्र हुए मनु, जिन्हे हम स्वम्भू मनु के नाम से भी जानते हैं। ब्रह्मदेव के ही वाम अंग से जन्मी शतरूपा के साथ मनु ने विवाह किया जिससे समस्त मानवों का जन्म हुआ। मनु के नाम से ही हम मानव कहलाते हैं। दोनों के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के पुत्र ही महान भक्त ध्रुव हुए जिन्होंने भगवान विष्णु की कृपा से अनंत लोक को प्राप्त किया।

मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। संतानहीन होने के कारण प्रियव्रत और मालिनी बड़े दुखी रहते थे। एक समय महर्षि कश्यप प्रियव्रत के राज्य में पधारे। वे महर्षि मरीचि के पुत्र और प्रियव्रत और उत्तानपाद के बड़े भाई थे। राजा प्रियव्रत और मालिनी ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया और मन से उनकी सेवा की। महर्षि कश्यप उनकी सेवा से बड़े प्रसन्न हुए किन्तु उन दोनों को दुखी देख कर महर्षि कश्यप ने इसका कारण पूछा। इसपर प्रियव्रत ने उन्हें अपने संतानहीनता के बारे में बताया।

उनका दुःख देखकर महर्षि कश्यप ने प्रियव्रत के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करवाने का निश्चय किया। शुभ मुहूर्त में उन्होंने यज्ञ आरम्भ किया और यज्ञ के समाप्ति तक यज्ञ के फलस्वरूप देवी मालिनी गर्भवती हो गयी। उसके बाद महर्षि कश्यप उन दोनों को आशीर्वाद देकर अपने आश्रम लौट गए। राजा प्रियव्रत और मालिनी अपने होने वाले पुत्र के बारे में सोच कर बड़े प्रसन्न रहते थे।

किन्तु उनकी ये प्रसन्नता अधिक देर तक ना रही। नौवें मास में जब मालिनी को प्रसव हुआ तो उनका पुत्र मृत पैदा हुआ। ये देख कर प्रियव्रत के दुःख का ठिकाना ना रहा और वे पुत्र वियोग में उसका शव लेकर वन-वन भटकने लगे। एक दिन उन्होंने अपने प्राणों का अंत करने का निश्चय किया और स्वयं को भस्म करने के लिए अग्निकुंड की ओर दौड़े। 

इससे पहले कि वे आत्मदाह कर पाते, अचानक स्वर्ग से एक दिव्य विमान उनके सामने उतरा और उससे एक देवी प्रकट हुई। उनका रूप और तेज देख कर प्रियव्रत ने उनसे उनका परिचय पूछा। तब उस देवी ने कहा - "हे राजन! मैं परमपिता ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना हूँ। मेरा प्रादुर्भाव ब्रह्मदेव के छठे अंश से हुआ है इसीलिए मेरा एक नाम षष्ठी भी है। किन्तु आप क्यों अपने जीवन का अंत करना चाहते हैं।

तब प्रियव्रत ने उन्हें बताया कि किस प्रकार उनका पुत्र मृत पैदा हुआ। ये सुनकर उस देवी ने उनके पुत्र को स्पर्श किया और उनके स्पर्श से वो शिशु तत्काल जीवित हो क्रंदन करने लगा। जब प्रियव्रत ने ये चमत्कार देखा तो उन्होंने भिन्न-भिन्न प्रकार से उस देवी की पूजा की। जिस दिन देवसेना ने प्रियव्रत के पुत्र को जीवित किया था वो कार्तिक मास की षष्टी तिथि थी।

तव प्रियव्रत ने उनसे कहा कि वे उनकी और क्या सेवा कर सकते हैं? तब षष्ठी माता ने कहा कि वे चाहती हैं कि पृथ्वी पर उनकी पूजा सदा होती रहे। प्रियव्रत तो प्रजापति थे ही अतः उन्होंने माता षष्ठी की पूजा का विधान बना दिया। सर्वप्रथम उन्होंने स्वयं कठिन व्रत रखकर उनकी पूजा की और तब से लेकर आज तक वो क्रम चलता आ रहा है। उन्ही देवसेना या षष्टी देवी को आज हम छठ मैया के नाम से जानते हैं। दक्षिण भारतीय धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बाद में इन्ही देवसेना का विवाह महादेव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय से हुआ। जय छठी मैया।

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