1 नवंबर 2019

स्त्री द्वारा की गयी सर्वप्रथम छठ पूजा

आप सभी को खरना की शुभकामनायें। कल से छठ महापर्व का शुभारम्भ हो चुका है। नहाय खाय (कद्दू भात) से आरम्भ होने वाला ये महापर्व खरना, संध्या अर्ग एवं प्रातः अर्ग पर समाप्त होता है। छठ माई की कोई तस्वीर आपको नहीं मिलेगी क्यूंकि ये स्वयं सृष्टि देवी का अवतार मानी जाती है। साथ ही ये पर्व किसी लिंग विशेष के लिए नहीं है अपितु स्त्री और पुरुष दोनों इस व्रत को रख सकते हैं।

जब बात छठ पूजा के आरम्भ की आती है तो इस बारे में अलग अलग मत हैं। सबसे पहले छठ पूजा करने का वर्णन दो कथाओं में मिलता है। एक तो ब्रह्मपुत्र मनु के पुत्र प्रियव्रत द्वारा जिसके बारे में एक अलग लेख बाद में प्रकाशित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त छठ पूजा के व्रत को रखने का जो सबसे प्राचीन इतिहास मिलता है वो है दक्षपुत्री एवं देवमाता अदिति के द्वारा। इन दोनों को सबसे प्राचीन छठ व्रत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

ब्रह्मा के पुत्र हुए प्रजापति दक्ष। इनकी १३ कन्याओं का विवाह महर्षि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप से हुआ। कहते हैं दक्ष कन्याओं और महर्षि कश्यप से ही सभी योनि के प्राणियों का जन्म हुआ। उन १३ कन्याओं में सबसे ज्येष्ठ थी दिति जिनसे सभी दैत्यों का जन्म हुआ। दक्ष की दूसरी पुत्री अदिति से सभी देवताओं का जन्म हुआ जिन्हे आदित्य कहा गया। इस प्रकार दैत्य देवताओं के बड़े भाई हुए।

समय के साथ साथ दैत्यों और देवों में वैमनस्य बढ़ता गया जिसने अंततः देवासुर संग्राम का रूप ले लिया। दैत्य स्वाभाविक रूप से दैत्यों से अधिक शक्तिशाली थे और साथ ही साथ मायावी भी। त्रिदेवों के तटस्थ रहने के कारण उनकी सहायता देवताओं को नहीं मिल पायी और पहले देवासुर संग्राम में देवताओं की पराजय हुई। दैत्यों ने स्वर्ग सहित तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया।

तब देवों की माता अदिति परमपिता ब्रह्मा के पास गयी और उनसे अपनी स्थिति बताई। तब ब्रह्मदेव ने स्वयं से उत्पन्न देवसेना, जो षष्ठी देवी के नाम जानी जाती थी, उनकी पूजा करने को कहा। तब माता अदिति ने १०० वर्षों तक षष्ठी देवी की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर षष्ठी देवी ने उन्हें दर्शन दिए और ४ दिनों का अत्यंत कठिन व्रत रखने को कहा। उस व्रत की सम्पति के बाद माता ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा।

तब अदिति ने उनसे अपनी स्थिति बताई जिसे सुनकर षष्ठी देवी ने उन्हें एक सर्वगुण संपन्न पुत्र का आशीर्वाद दिया। उनके वरदान के फलस्वरूप माता अदिति को त्रिदेवों के गुणों से युक्त पुत्र की प्राप्ति हुई जिनका नाम आदित्य हुआ। यही आदित्य बाद में जाकर विवस्वान या सूर्य के रूप में प्रसिद्ध हुए। तब देवताओं ने आदित्य के तेज को साथ लेकर दैत्यों पर आक्रमण किया और अंततः विजय प्राप्त की।

माता अदिति द्वारा रखे गए इस ४ दिन के व्रत को ही प्रथम छठ पूजा माना जाता है। माता षष्ठी ही बाद में अपभ्रंश होकर छठ माई कहलाने लगी। जहाँ माता अदिति ने ये व्रत रखा था वो विश्व में देव सूर्य मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ जो बिहार के औरंगाबाद जिले के देव नमक गांव में है। ये मंदिर भी अपने आप में चमत्कारी मंदिर है और इसके चमत्कार के समक्ष तो स्वयं औरंगजेब जैसा पापी भी नतमस्तक हो गया था। इस मंदिर के विषय में विस्तृत लेख किसी और समय प्रकाशित किया जाएगा।

माता अदिति द्वारा किये जाने और आदित्य के जन्म के कारण ही छठ पूजा में भगवान सूर्यनारायण का इतना महत्त्व है। यही कारण है कि छठ में हम अस्त होते हुए और उदित होते हुए सूर्यनारायण को अर्घ्य देते हैं और हमें जीवन देने के लिए उनका धन्यवाद करते हैं। इस पर्व का महत्त्व इतना अधिक है कि इसे महापर्व की संज्ञा दी गयी है। जय छठी मैया।

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