22 नवंबर 2019

प्रतिशोध गाथा - ४: देवराज की कृपा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि यवक्रीत परावसु की पत्नी से काम याचना करता है जिससे क्रोधित होकर रैभ्य ऋषि कृत्य का आह्वान करते हैं। यवक्रीत सोचता है कि वो कृत्य को परास्त कर देगा किन्तु ऐसा नहीं हो पता है और अंततः कृत्य के हाथों उसकी मृत्यु हो जाती है। जब भारद्वाज ऋषि को इस बात का पता चलता है तो वो क्रोधित होकर रैभ्य को श्राप दे देते हैं। अब आगे... 

जब यज्ञ की समाप्ति का समय आता है तो उससे केवल १ मास पूर्व परावसु अपनी पत्नी से मिलने आये। उस समय तक उन्हें भारद्वाज ऋषि द्वारा अपने पिता को दिए गए श्राप के बारे में कोई ज्ञान नहीं था। जब परावसु अपने घर आये तो सुप्रभा और अर्वावसु बड़े प्रसन्न हुए। हालाँकि अर्वावसु को इस बात का आश्चर्य हुआ कि किस प्रकार परावसु यज्ञ को बीच में छोड़ कर केवल १ मास पहले घर वापस आ गए किन्तु उसने कुछ पूछा नहीं। 

परावसु भोजन करते हुए दोनों को नगर में होने वाले यज्ञ के बारे में बता रहे थे। तब अर्वावसु ने परावसु से कहा कि उसे भी यज्ञ को देखने की अत्यधिक इच्छा है अतः वो उसे अपने साथ ही नगर ले जाएँ। तब परावसु उसे अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हो गए। रात्रि का समय था और उसी समय रैभ्य ऋषि घर की ओर आ रहे थे। जब परावसु ने उनके आने की आहट सुनी तो उन्हें लगा कि कोई वन्य पशु आश्रम में घुस आया है। परावसु ने तत्काल उस दिशा में शब्दवेधी बाण छोड़ा जिससे रैभ्य मुनि की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार भारद्वाज ऋषि का श्राप फलीभूत हो गया। 

अब जब परावसु को सत्य का पता चला तो वे बड़े दुखी हुए। एक तो ब्रह्महत्या और वो भी अपने पिता का, इससे बड़ा पाप और क्या हो सकता था। अब वो यज्ञ करवाने के अधिकारी नहीं रह गए किन्तु यज्ञ अपने अंतिम चरण में था और उसकी सफलता पर उस देश की समृद्धि निर्भर करती थी। तब परावसु ने अर्वावसु को अपने पिता का अंतिम संस्कार करने को कहा और वापस यज्ञ करवाने नगर लौट गए। 

अर्वावसु ने अपने बड़े भाई की आज्ञा के अनुसार अपने पिता का अंतिम संस्कार किया और फिर अपने भाई को सूचित करने नगर की यञशाला में पहुँच गए। वहाँ जब परावसु ने अपने भाई को देखा तो वे भयभीत हो गए कि अगर कहीं अर्वावसु ने सबको सत्य बता दिया तो वे इस यज्ञ के राजपुरोहित नहीं रह जायेंगे। इसी कारण उन्होंने अपने भाई को पहचानने से मना कर दिया। 

उन्होंने उससे पूछा कि वो कौन है और यहाँ किस लिए आया है? जब अर्वावसु ने अपने भाई को इस प्रकार की बातें करते देखा तो बड़ा आश्चर्यचकित हुआ। किन्तु सबके सामने वो क्या कहता? उसने कहा कि वो एक ब्राह्मण है और अपने पिता का अंतिम संस्कार कर यहाँ आया है। तब परावसु ने पूछा कि उसके पिता की मृत्यु किसके द्वारा हुई? अब अर्वावसु ने सोचा कि परावसु का नाम लेना उचित नहीं है इसी कारण उसने कह दिया कि उनकी मृत्यु उनके पुत्र के हाथों हुई है। 

ये सुनते ही परावसु ने राजा से कहा कि इस व्यक्ति ने अपने पिता का वध किया है। ये ब्रह्महत्या का दोषी है अतः इसे यञशाला से बाहर निकाल दिया जाये। राजा की आज्ञा पर प्रहरियों ने अर्वावसु को बहुत मारा और उसे यञशाला से बाहर फेंक दिया। उसने बार बार ये बताने का प्रयास किया कि वो परावसु का भाई है और हत्या उसने नहीं बल्कि परावसु ने की है, पर उसकी किसी ने ना सुनी। 

वहाँ से अपमानित होकर अर्वावसु वहीँ यञशाला के बाहर बैठ कर देवराज का आह्वान करने लगा। उसके अपमान की अग्नि इतनी तीव्र थी कि तीनों लोक उससे दग्ध होने लगा। जब इंद्र ना आये तो अर्वावसु ने आत्मदाह करने का निश्चय किया। वो यञकुंड में कूदने ही वाला था कि देवराज प्रकट हुए। उन्होंने राजा को सत्यता से अवगत करवाया और परावसु को राजपुरोहित के पद से निष्काषित करवा दिया। इससे अपमानित होकर परावसु ने आत्मदाह कर लिया। 

अब देवराज ने अर्वावसु से वर माँगने को कहा। तब अर्वावसु ने कहा - "हे देवराज! अगर आप मुझपर प्रसन्न हैं तो समय के चक्र को घुमा दें। मेरे पिता, भाई और यवक्रीत जीवित हो जाएँ। मेरे भाई को उसके द्वारा किये गए कर्म याद ना रहें और इस प्रदेश का दुर्भिक्ष समाप्त हो जाये।" फिर देवराज की कृपा से घोर वर्षा होने लगी और ऋषि रैभ्य, परावसु और यवक्रीत जीवित हो गए। यवक्रीत ने देवराज से क्षमा मांगी और कहा कि वे सही थे कि बिना उद्योग के प्राप्त विद्या मनुष्य के किसी काम नहीं आती। देवराज सबको आशीर्वाद देकर वापस स्वर्गलोक चले गए।

ये कथा बताते हुए महर्षि लोमश ने युधिष्ठिर से कहा - "हे धर्मराज! ये उसी रैभ्य मुनि का आश्रम है। इसे प्रणाम करो और कुछ दिन अपने भाइयों और पत्नी सहित यही निवास करो। यहाँ रहने से तुम्हे इस बात का ज्ञान हो जाएगा कि प्रतिशोध की भावना से मनुष्य का केवल अहित ही हो सकता है अतः हमें अपने भीतर की प्रतिशोध की अग्नि का तत्काल त्याग कर देना चाहिए। 

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