10 अक्तूबर 2019

रावण का मानमर्दन २: असुरराज शंभर

ये रावण के मानमर्दन श्रृंखला का दूसरा लेख है। इससे पहले के लेख में हमने ये बताया था कि किस प्रकार रावण दैत्यराज बलि के हाथों परास्त होने के बाद अपमानित होता है। इस लेख के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। इस लेख में हम असुरराज शंभर के हाथों रावण के पराजय की कथा बताएंगे। शंभर वैजंतपुर के सम्राट थे। उनकी पत्नी माया मय दानव की पुत्री एवं रावण की पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी। इस प्रकार रावण शंभर का सम्बन्धी था।

अपने दिग्विजय के दौरान रावण वैजंतपुर पहुँचा। जब असुरराज शंभर को इसका पता चला तो उन्होंने रावण का बड़ा स्वागत किया। उन्होंने रावण की वीरता की प्रशंसा करते हुए कहा - "वत्स! तुम्हारे बारे में जो सुना था तुम्हारा तेज उससे भी अधिक है। तुम अवश्य ही सातों द्वीपों के अधिपति होने योग्य हो। तुम्हारी वीरता की चर्चा तो स्वयं स्वर्गलोक में हो रही है।"

तब रावण ने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा - "तात! आपके दर्शनों से मैं कृतार्थ हुआ। आपके सामर्थ्य से तो स्वयं देवराज इंद्र भी कांपते है। यही सोचकर मैं आपके देशों को चला आया। मंदोदरी ने भी अपनी बड़ी बहन और आपकी भार्या देवी माया की कुशल पूछी है। मैं उनका भी आशीर्वाद लेकर वापस लंका लौट जाऊंगा।"

तब शंभर ने कहा - "तुम तो हमारे अतिथि हो। अभी ही आये हो अतः दिन यहीं वैजयंतपुरी में सुखपूर्वक रहो। मेरे पूर्वजों द्वारा बसाई गयी ये नगरी ऐश्वर्य में तुम्हारी लंका से कम नहीं है।" ये कहकर शंभर ने रावण को अतिथिशाला में रुकवा दिया। वहाँ रावण कुछ दिन सुखपूर्वक रहा। उधर शंभर ने अपनी पत्नी माया को बताया की उनकी बहन के पति वैजयंतपुर पधारे हैं जिसे सुनकर वो बड़ी प्रसन्न हुई। 

कुछ समय के बाद शंभर अपनी पत्नी माया को लेकर रावण के पास आया। जैसे ही रावण ने माया को देखा तो देखता ही रह गया। ऐसा अद्वितीय सौंदर्य उसने पहले कही नहीं देखा था। उसके मन में माया को पाने की लालसा जाग उठी किन्तु महाराज शंभर के सामने उसने अपनी इच्छा प्रकट ना होने दी और माया से केवल शिष्टाचार की बातें कर उन दोनों को विदा किया। 

माया चली तो गयी किन्तु रावण को अब उसके अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं था। वैजयंतपुर में कुछ समय तक रहने के बाद रावण धीरे-धीरे माया से घुल मिल गया। शंभर के महल में रावण का मुक्त प्रवेश था इसी कारण वो यदा कदा माया से मिलने जाता रहता था। पहले माया को रावण के अंदर की वासना का भान नहीं था। वो उसका आथित्य अपनी बहन के पति के रूप में करती थी किन्तु समय के साथ वो भी रावण के साथ साधारण हास-परिहास करने लगी। 

रावण युवा और सुदर्शन था। उसके तेज से स्वयं देवता भी घबराते थे। कदाचित यही कारण था कि माया भी रावण के प्रति आकर्षित हो गयी और उससे मुक्त रूप से मिलने लगी। शंभर अपने राज-काज में लगे रहते थे इसी कारण उन्हें इस बात का भान नहीं हुआ। किन्तु एक दिन उन्होंने रावण और माया को एक साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया। वो अत्यंत क्रोधित हुए और रावण को धिक्कारते हुए बोले - "रे लम्पट! तेरा अंतर्मन इतना कलुषित होगा ये मैंने सोचा नहीं था। माया तेरी पत्नी की बड़ी बहन है अतः तेरी माता के समान है। तूने उसके साथ इस प्रकार के सम्बन्ध बना कर घोर पाप किया है।"

ये कहकर शंभर ने रावण को युद्ध के लिए ललकारा। रावण तो युद्ध के लिए सदैव तैयार ही रहता था इसीलिए उसने भी शंभर की चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों वीर योद्धा थे और मायावी विद्याओं के जानकर थे। बहुत समय तक दोनों के बीच युद्ध चलता रहा किन्तु हार जीत का निर्णय नहीं हो पाया। इस प्रकार शंभर के सामने अपमानित होने से रावण का तेज पहले ही क्षीण हो चुका था और दूसरे शंभर अपने पूरे क्रोध में युद्ध कर रहे थे। इसी कारण रावण का पडला हल्का हो गया। 

अचानक शंभर ने अपनी गदा से रावण पर प्रचंड प्रहार किया जिससे रावण मूर्छित हो गया। तब शभर ने उसे बंदी बना कर कारागार में डाल दिया। शंभर ने माया को भी उसके कृत्य के क्षमा नहीं किया और उसका त्याग कर दिया। माया के लिए जीवन अत्यंत कठिन हो गया। उसे अपने किये पर पछतावा था किन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी।

उसी समय देवराज इंद्र की सहायता हेतु दशरथ ने शंभर पर आक्रमण कर दिया। ये वही युद्ध था जिसमे कैकयी ने दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी और दशरथ ने उन्हें दो वरदान देने का वचन दिया था। जब शंभर ने आक्रमण के विषय में सुना तो तुरंत युधःक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया। दुर्भाग्यवश उस युद्ध में शंभर वीरगति को प्राप्त हुए। 

जब माया को इसका पता चला तो उसने शंभर के साथ ही सती होने का निर्णय किया। उसने रावण को मुक्त कर दिया और वापस लंका जाने को कहा। जब रावण को ये पता चला कि वो शंभर के साथ सती हो रही है तब उसने उसे कई प्रकार से समझाया और अपने साथ लंका चलने को कहा। ये सुनकर माया ने रावण को धिक्कारते हुए कहा - "हे लंकेश! क्या तुम्हे लज्जा नहीं आती? मैं तुम्हारी अग्रज हूँ इसीलिए मेरे प्रति तुम्हारा काम भाव निंदनीय है। पता नहीं कैसे मैं तुम्हारे बहकावे में आ गयी? मेरे पति शंभर ही थे और मैं उनके साथ ही सती हो रही हूँ किन्तु मैं तुम्हे श्राप देती हूँ कि तुम्हारा सर्वनाश एक स्त्री के कारण ही होगा।"

ये कह कर माया शंभर के साथ सती हो गयी। रावण अत्यंत दुःख में लंका वापस लौटा और मंदोदरी को उसकी बहन की मृत्यु का समाचार दिया। माया के श्राप के कारण ही नियति ने देवी सीता का अपहरण रावण द्वारा करवाया और अंततः सीता के कारण ही रावण का सर्वनाश हुआ।

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