6 अक्तूबर 2019

माद्री - १

आज पंजाब में जिस स्थान पर रावी और चिनाब नदियों का मिलन होता है उसे ही पहले मद्रदेश कहा जाता था। वहाँ के एक राजा थे भगवान, जिन्होंने लम्बे समय तक मद्र पर शासन किया। मद्रदेश उस समय आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राज्यों में से एक माना जाता था। उनकी दो संतानें थी, एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम शल्य और पुत्री का माद्री था। 

कहा जाता है कि माद्री उस समय आर्यावर्त की सबसे सुन्दर राजकुमारियों में से एक थी। उसके सौंदर्य की गाथा देश-विदेशों तक फैली हुई थी। महाराज भगवान के बाद शल्य ने शासन संभाला। माद्री के संग विवाह के लिए देश-विदेशों से कई राजाओं ने अनुरोध किया किन्तु शल्य ने ना उसका विवाह करवाया और ना ही उसके स्वयंवर का आयोजन किया। 

उसी समय दूसरी और हस्तिनापुर का प्रभाव पूरे आर्यावर्त में था। अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र की नेत्रहीनता के कारण पाण्डु राजा बने। उन्होंने कुन्तिभोज की कन्या कुंती से विवाह किया और राजा बनने के बाद वे अपने तात भीष्म की आज्ञा लेकर दिग्विजय के लिए निकले। वैसे ही पूरा आर्यावर्त भीष्म के पराक्रम से घबराता था। उसके ऊपर पाण्डु ने अपने शौर्य से अधिकतर राजाओं को अधीनता स्वीकार करने को विवश कर दिया। 

अपने दिग्विजय के दौरान पाण्डु मद्रदेश पहुँचे। वहाँ उन्होंने शल्य को अधीनता स्वीकार करने को कहा किन्तु उन्होंने युद्ध करना स्वीकार किया। शल्य महारथी थे किन्तु हस्तिनापुर की सेना का सामना अधिक देर तक नहीं कर सके और पराजित हुए। उन्हें पराजित करने के बाद भी पाण्डु ने उन्हें बड़े आदर के साथ मद्रदेश की सत्ता सँभालने की जिम्मेदारी सौंपी। उनका ऐसा व्यहवार देख कर शल्य ने अपनी बहन माद्री का विवाह पाण्डु के साथ कर दिया। 

एक अन्य कथा के अनुसार माद्री के गुणों की चर्चा सुनकर स्वयं भीष्म पाण्डु के लिए माद्री को मांगने मद्रदेश पहुँचे। हस्तिनापुर की ओर से रिश्ता आने पर शल्य बड़े प्रसन्न हुए किन्तु उन्होंने भीष्म को अपने देश की एक प्रथा बताई। उन्होंने भीष्म से कहा - "हे महावीर! आप हस्तिनापुर नरेश के विवाह का प्रस्ताव लेकर मद्रदेश पधारे हैं ये हमारे लिए अत्यंत गौरव का विषय है किन्तु हमारी एक प्रथा है कि हम कन्या उसी राजा को देते हैं जो यथोचित उपहार के साथ आकर कन्या का हाथ हमसे माँगता है। चूँकि आपने ऐसा नहीं किया इसी कारण हम माद्री का विवाह पाण्डु से नहीं कर सकते।"

ऐसा सुनकर भीष्म तनिक भी क्रोधित नहीं हुए। उसके उलट उन्होंने शल्य की स्पष्टवादिता की प्रशंसा की। उन्होंने तत्काल हस्तिनापुर से बहुत सारे मणि, माणिक्य, आभूषण, गज, अश्व इत्यादि मंगाए और तब फिर पाण्डु के लिए माद्री को शल्य से माँगा। ऐसा देख कर शल्य बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने माद्री को भीष्म के साथ हस्तिनापुर विदा किया। बाद में पाण्डु और माद्री का विवाह हुआ।

जिस समय पाण्डु का विवाह माद्री के साथ हुआ उस समय तक पाण्डु अपनी पहली पत्नी कुंती के साथ अपने गृहस्थ जीवन का आरम्भ भी नहीं कर पाए थे। यही कारण है कि कई ग्रंथों में कुंती और माद्री के बीच वैमनस्व होने की बात बताई जाती है। हालाँकि अधिकतर ग्रंथों में दोनों के बीच आदर्श सामंजस्य होने के बारे में कहा जाता है। ये भी कहा जाता है कि माद्री कुंती का बहुत आदर करती थी और उनके परामर्श अनुसार ही वे अपनी गृहस्थी संभालती थी।

अपने दिग्विजय से लौट कर पाण्डु ने अपनी नवविवाहिता पत्नियों के साथ एकांतवास में जाने का निर्णय लिया। भीष्म ने भी उनके इस निर्णय का अनुमोदन किया। तब धृतराष्ट्र को कार्यकारी राजा बना कर पाण्डु कुंती और माद्री के साथ वन में एकांतवास को चले गए। जब ऋषियों को ये पता चला कि महाराज पाण्डु अपनी पत्नियों सहित वन पधारे हैं तो उन्होंने उनका बड़ा स्वागत किया। वहाँ पाण्डु अपनी पत्नियों के साथ किंदम ऋषि के आश्रम में रुके। वहीँ पर एक ऐसी घटना घटी जिसने उनके जीवन को झकझोर कर रख दिया।

...शेष

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