16 अक्तूबर 2019

भूरिश्रवा - २

पिछले लेख में आपने भूरिश्रवा के वंश के बारे में पढ़ा। वो भी कुरुवंशी थे और धृतराष्ट्र के भाई और भीष्म के भतीजे थे। उनके पिता सोमदत्त और सात्यिकी के पिता शिनि की प्रतिद्वंदिता के कारण कुरुओं और यादवों में वैमनस्व बढ़ गया। दोनों ने भगवान शंकर से पुत्र की कामना की जिससे भूरिश्रवा और सात्यिकी का जन्म हुआ। अब आगे...

महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से पहले पितामह भीष्म प्रधान सेनापति बनाये गए। उसके बाद भीष्म ने अपनी ११ अक्षौहिणी सेना के लिए ११ सेनापति नियुक्त किये जिनमे से भूरिश्रवा को १ अक्षौहिणी सेना का सेनापति बनाया गया। महाभारत में वर्णित है कि भूरिश्रवा ने बड़ी कुशलता से अपनी सेना का नेतृत्व किया और भीष्म को युद्ध जीतने में सहायता की। कर्ण के युद्ध में भाग लेने से पहले भूरिश्रवा ने ही पांचालों को रोके रखा। 

युद्ध के पांचवें दिन सात्यिकी के १० पुत्र भूरिश्रवा से प्रतिशोध लेने को उससे जा भिड़े। उन १० योद्धाओं ने एक साथ भूरिश्रवा पर आक्रमण कर दिया किन्तु वो बिलकुल भी विचलित नहीं हुए। उनकी युद्धकला बहुत उत्कृष्ट थी और इसी कारण उन्होंने ना केवल उन सभी के प्रहार रोके बल्कि केवल आधे प्रहार के युद्ध में ही उन्होंने सात्यिकी के सभी १० पुत्रों का वध कर दिया। 

जब सात्यिकी को अपने पुत्रों के वीरगति को प्राप्त होने का समाचार मिला तो उन्हें भूरिश्रवा पर बड़ा क्रोध आया। उन्होंने ये प्रतिज्ञा की कि चाहे जैसे भी हो किन्तु वो भूरिश्रवा का वध इस युद्ध में अवश्य कर देंगे। इसके बाद भी आने वाले दिनों में सात्यिकी और भूरिश्रवा के बीच युद्ध हुआ किन्तु कोई निर्णय नहीं हो पाया। दोनों के बीच हुए कई युद्धों में दोनों ने एक दूसरे को पराजित किया किन्तु उन्हें एक दूसरे का वध करने का समय नहीं मिला। 

उधर युद्ध के १०वें दिन पितामह भीष्म शिखंडी और अर्जुन के छल के कारण धराशायी हो गए। उनके पतन के बाद दोनों पक्षों ने युद्ध के नियमों को ताक पर रख दिया। जो अधर्म पितामह भीष्म के साथ आरम्भ हुआ था उसकी भेंट कई अन्य योद्धा भी चढ़े। युद्ध के १३वें दिन जब अर्जुन सप्तशंशकों से युद्ध में व्यस्त थे तब उनके पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फसा कर ७ महारथियों द्वारा मार डाला गया। 

जब अर्जुन को इस बात का पता चला तब उसने अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा कर ली। अगले दिन प्रातः अर्जुन और श्रीकृष्ण सबसे पहले जयद्रथ को खोजते हुए कौरव सेना का संहार करते हुए आगे बढ़ने लगे। उनकी सहायता को भीम आगे बढे और कौरव सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया। तब कौरव सेना के सेनापति आचार्य द्रोण ने भूरिश्रवा को जयद्रथ की रक्षा करने को कहा और अर्जुन को रोकने स्वयं आगे बढे। 

तब सात्यिकी आगे ढ़ कर भूरिश्रवा से भिड़ गए। दोनों में द्वेष तो था ही, अब भयानक युद्ध छिड़ गया। बहुत देर युद्ध होने के पश्चात अचानक भूरिश्रवा ने अपनी गदा से सात्यिकी के सर पर प्रहार किया। उससे सात्यिकी मूर्छित होकर वही रथ पर गिर पड़े। उसे अपने सामने इस प्रकार पड़े देख भूरिश्रवा उसके वध को आगे बढे। उन्हें ये ज्ञात था कि महादेव के वरदान के अनुसार अब वो उसका वध कर सकते थे। 

तभी अचानक अर्जुन और श्रीकृष्ण वहाँ आये और देखा कि सात्यिकी के प्राण संकट में हैं। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वो सात्यिकी की सहायता करे। तब अर्जुन ने कहा - "हे माधव! ये तो युद्ध के नियमों के विरुद्ध है। जब दो योद्धा युद्ध कर रहे हों तो तीसरे को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। ये अन्याय है।" तब श्रीकृष्ण ने कहा - "पार्थ! इस युद्ध में हम न्याय-अन्याय से बहुत आगे बढ़ आये हैं। कौरवों ने कब धर्म के बारे में सोचा है? और ये भी तो सोचो कि सात्यिकी तुम्हारा मित्र और शिष्य है और इस नाते उसकी रक्षा करना तुम्हारा धर्म है। अतः सात्यिकी की सहायता करो।"

उधर भूरिश्रवा सात्यिकी का वध करने ही वाला था कि अर्जुन ने अपने बाण से उसकी भुजा काट दी। जब भूरिश्रवा ने ये देखा तो कृष्ण और अर्जुन को धिक्कारते हुए बोला - "पुत्र अर्जुन! मुझे तुमसे ऐसी आशा नहीं थी।कोई कुरुवंशी कभी ऐसी कायरता नहीं कर सकता। जब मुझमे और सात्यिकी में द्वन्द चल रहा था तब तुमने मुझे चेतावनी दिए बिना पीछे से मुझपर प्रहार किया। तुम किस प्रकार अपने आपको वीर कह सकते हो?"

तब श्रीकृष्ण ने कहा - "हे वीरश्रेष्ठ! सात्यिकी अर्जुन का शिष्य था और अर्जुन उसकी रक्षा को वचनबद्ध था। और आपने ही कौन से धर्म का पालन किया? आप उसका वध उस स्थिति में करना चाह रहे थे जब वो मूर्छित है। आप भी अधर्म ही कर रहे थे और उसे रोकना अर्जुन का धर्म था। इस प्रकार मूर्छित योद्धा का वध करने के प्रयास करने के कारण आपको लज्जा आनी चाहिए। 

श्रीकृष्ण द्वारा ऐसी बातें सुनकर भूरिश्रवा उस अधर्म से दुखी और क्रोधित होकर वहीँ रणभूमि पर अनशन पर बैठ गए। उसी समय सात्यिकी की मूर्छा टूटी। अपने सामने भूरिश्रवा को इस प्रकार बैठा देख कर उसे धर्म-अधर्म का ज्ञान ना रहा। वो नंगी तलवार लेकर समाधि में बैठे भूरिश्रवा की ओर बढ़ा। ये देख कर दोनों ओर की सेना हाहाकार कर उठी। अर्जुन और श्रीकृष्ण ने उसे ऐसा करने से मना किया किन्तु उसने तत्काल अपनी तलवार से निहत्थे भूरिश्रवा का सर काट डाला। इस प्रकार छल द्वारा एक और महान योद्धा का वध हुआ। 

युद्ध के ३६ वर्ष के बाद प्रभास तीर्थ पर कृतवर्मा ने इस बात का उल्लेख करते हुए सात्यिकी को धिक्कारा कि उसने निहत्थे भूरिश्रवा का वध किया। इससे क्रोधित होकर सात्यिकी ने असावधान कृतवर्मा का भी वध कर डाला। उसी से यादव आपस में लड़ मरे और यादव वंश समाप्त हो गया। इस बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। ॐ शांति।

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