14 अक्तूबर 2019

भूरिश्रवा - १

भूरिश्रवा महाभारत के सबसे प्रसिद्ध योद्धाओं में से एक थे। इन्होने महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष से युद्ध किया था। कौरव सेना के प्रधान सेनापति भीष्म ने अपनी ११ अक्षौहिणी सेना के लिए जिन ११ सेनापतियों का चयन किया था, भूरिश्रवा उन सेनापतियों में से एक थे। भूरिश्रवा का वध युद्ध के १४वें दिन सात्यिकी ने किया था। वास्तव में भूरिश्रवा कुरुवंशी ही थे और महाभारत युद्ध में उनके साथ उनके पिता और दादा ने भी युद्ध किया था। 

चक्रवर्ती सम्राट ययाति से समस्त राजवश चले। उनके सबसे बड़े पुत्र यदु से यदुवंश चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। इसी कुल में एक योद्धा हुए शिनि, जो श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव के मित्र थे। शिनि के पुत्र हुए महारथी सात्यिकी जो श्रीकृष्ण के घनिष्ठ मित्र थे। शिनि ने वसुदेव के साथ कई युद्धों में भाग लिया था और उनके प्राणों की रक्षा की थी। दोनों तत्कालीन राजा उग्रसेन और उसके पश्चात कंस के विश्वासपात्र थे।

दूसरी ओर ययाति के सबसे छोटे पुत्र पुरु से पुरुवंश चला जिसमे दुष्यंत, भरत, कुरु, हस्ती इत्यादि महान सम्राट हुए। इसी वंश में एक प्रतापी सम्राट हुए प्रतीप। उनके तीन पुत्र थे - देवापि, बाह्लीक एवं शांतनु। देवापि ने संन्यास ग्रहण कर लिया और बाह्लीक हस्तिनापुर की सीमा बढ़ाने और उसकी सुरक्षा का दायित्व उठा कर युद्ध में रत हो गए। इसी कारण सिंहासन प्रतीप के सबसे छोटे बेटे शांतनु को प्राप्त हुआ। शांतनु ने गंगा से विवाह किया जिनसे उन्हें ८ संतानें हुईं। ७ शीघ्र मुक्त हो गए और ८वें पुत्र गंगापुत्र देवव्रत हुए जो भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए।

प्रतीप के पुत्र बाह्लीक के पुत्र हुए सोमदत्त जो अपने पिता की भांति ही श्रेष्ठ योद्धा थे। सोमदत्त भीष्म के चचेरे भाई थे। इन्ही सोमदत्त के पुत्र हुए भूरिश्रवा जो भीष्म के भतीजे थे। इस प्रकार भूरिश्रवा कुरुवंशी ही थे और उन्होंने युद्ध में अपने पिता सोमदत्त और दादा बाह्लीक के साथ कौरव पक्ष का साथ दिया। इस प्रकार एक ही वंश की तीन पीढ़ियों ने महाभारत युद्ध में हिस्सा लिया।

अब थोड़ा पीछे चलते हैं। कंस की बहन थी देवकी जो भगवान श्रीकृष्ण की माता थी। यादवों ने देवकी का स्वयंवर बड़ी धूम-धाम से रचाया जिसमे वसुदेव, शिनि और अन्य यादव वीरों ने भाग लिया। किन्तु देवकी के रूप और गुण की चर्चा इतनी थी कि कुरु राजकुमार बाह्लीक पुत्र सोमदत्त भी उस स्वयंवर में भाग लेने आये। किन्तु यादव नहीं चाहते थे कि यादवों की कन्या कुरुओं से ब्याही जाये। इसी कारण वहाँ देवकी को प्राप्त करने हेतु सभी योद्धा आपस में उलझ पड़े। 

शिनि ये जानते थे कि वसुदेव देवकी से प्रेम करते हैं इसीलिए उन्होंने वसुदेव के लिए देवकी का हरण कर लिया और उसे अपने रथ पर लेकर वसुदेव के साथ स्वयंवर स्थल से लेकर भागे। जब सोमदत्त ने शिनि को कन्या का हरण करते हुए देखा तो वे उसका प्रतिकार करने हेतु उनके पीछे लपके। उन्होंने बीच राह में शिनि को युद्ध के लिए ललकारा। तब शिनि ने देवकी को वसुदेव के साथ भेज दिया और वे सोमदत्त को रोकने के लिए वही रुक गए।

दोनों में घोर युद्ध प्रारम्भ हुआ जो बहुत देर तक चला। किन्तु अंततः शिनि ने सोमदत्त को पराजित कर दिया। वे सोमदत्त का सर काटना चाहते थे किन्तु अंत समय में उन्होंने दया में आकर सोमदत्त को जीवनदान दिया। सोमदत्त लज्जित होकर हस्तिनापुर लौट आये। जब भीष्म ने ये सुना तो उन्होंने यादवों पर आक्रमण करने की ठानी किन्तु फिर सोमदत्त के पिता और उनके चाचा बाह्लीक ने उन्हें ये कहकर रोक लिया कि कन्या तो वसुदेव से ब्याही जा चुकी है इसी कारण उसके लिए इतना व्यापक युद्ध नहीं छेड़ना चाहिए। किन्तु तब तक यादवों और कुरुओं के बीच वैमनस्व बढ़ गया।

सोमदत्त अपने अपमान से इतने दुखी हुए कि उन्होंने शिव की तपस्या आरम्भ कर दी। उधर वसुदेव के विवाह के पश्चात शिनि ने भी महादेव की तपस्या आरम्भ की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे दर्शन दिए तो शिनि ने उनसे एक अजेय पुत्र माँगा। तब महादेव ने उसे ऐसे पुत्र का वरदान दिया जो अजेय होगा और जिसपर प्रभु (श्रीकृष्ण) की कृपा रहेगी। उन्ही के कृपास्वरूप शिनि के घर एक पुत्र हुआ जिसका नाम सात्यिकी रखा गया। वो एक श्रेष्ठ यादव वीर और श्रीकृष्ण के परम मित्र हुए। 

उसी दिन महादेव सोमदत्त की तपस्या से भी प्रसन्न हुए और उन्हें भी दर्शन दिए। तब सोमदत्त ने वरदान में एक ऐसे पुत्र की कामना की जो शिनि के पुत्र का वध कर सके। तब महादेव बोले कि उन्होंने पहले ही शिनि को अजेय पुत्र का वरदान दे दिया है इसी कारण वो उसे ऐसे पुत्र का वरदान नहीं दे सकते। किन्तु सोमदत्त की तपस्या विफल ना जाये इसीलिए महादेव ने उसे एक ऐसे पुत्र का वरदान दिया जो शिनि के पुत्र को युद्ध में मूर्छित कर सकेगा और अगर उस समय उसे किसी की सहायता ना मिले तो वो उसका वध कर सकेगा। यही नहीं, वो युद्ध में शिनि के उस पुत्र के सभी पुत्रों का वध करेगा। उसी वरदान स्वरुप सोमदत्त के पुत्र के रूप में भूरिश्रवा ने जन्म लिया। 

...शेष

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें