24 अक्तूबर 2019

श्रीकृष्ण के तीन सबसे घनिष्ठ मित्र

श्रीकृष्ण की मित्रता जिसे प्राप्त हो जाये उसे और क्या चाहिए। महाभारत में ऐसे कई व्यक्ति हैं जिन्हे श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त थी। पांडवों पर तो वैसे ही उनकी कृपा थी पर इसके अतिरिक्त भी वे जिनसे मिलते थे उसे अपने स्वाभाव से अपना मित्र बना लेते थे। वैसे तो उनके मित्रों की संख्या बहुत अधिक है किन्तु इस लेख में हम श्रीकृष्ण के उन ३ मित्रों के बारे में बताएँगे जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय थे।

सुदामा: जब भी मित्रता की बात होती है तो कृष्ण-सुदामा का नाम अवश्य आता है। सुदामा श्रीकृष्ण के बाल सखा और अनन्य भक्त थे। कंस के वध के बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने गए तो वहाँ उनकी भेंट सुदामा से हुई। सुदामा एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण कुमार थे जो पहले से ही सांदीपनि मुनि के यहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उनका एक स्वाभाव था कि वो किसी से कुछ मांगते नहीं थे। एक बार वर्षाकाल में कृष्ण और सुदामा जंगल में अलग-अलग वृक्षों पर फस गए। उनकी गुरुमाता ने उन्हें कुछ चावल दिए थे जो सुदामा के पास थे। भूख लगने पर सुदामा ने वो सारे चावल खा लिए। जब श्रीकृष्ण को ये पता चला तो उन्होंने हँसते हुए कहा कि अब उनपर श्रीकृष्ण का ऋण है।

आश्रम से निकलने के बाद सुदामा अपने ग्राम चले गए और विवाह के पश्चात बड़ी गरीबी में दिन गुजारने लगे। वे वेद-वेदाङ्गों में पारंगत थे किन्तु नियति ने उन्हें दरिद्र ही बनाये रखा। एक दिन अपनी पत्नी के कहने पर वे श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका पहुँचे। उनकी पत्नी ने उन्हें श्रीकृष्ण के उपहार स्वरुप थोड़े चावल दिए। जब श्रीकृष्ण को पता चला कि सुदामा उनसे मिलने आये हैं तो वे नंगे पांव उन्हें लेने नगर से बाहर आये और उनका अत्यधिक सत्कार किया। जब उन्होंने सुदामा के पास उपहार स्वरुप वो तीन मुट्ठी चावल देखे तो प्रसन्न होकर कहा कि इन तीन मुट्ठी चावल के बदले वे तीनों लोक दे सकते हैं। अपने स्वाभाव के अनुरूप सुदामा ने कुछ माँगा नहीं पर जब वे घर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि श्रीकृष्ण ने उन्हें बिना मांगे ही सब कुछ दे दिया है।

उद्धव: उद्धव श्रीकृष्ण के अनिद्य मित्र और सलाहकार थे। इनके पिता का नाम उपंग था। कई जगह इन्हे वसुदेव के भाई देवभाग का पुत्र माना गया है। इस प्रकार ये श्रीकृष्ण के चचेरे भाई लगते थे। ये देवगुरु बृहस्पति के शिष्य थे। मथुरा से लेकर द्वारका तक इन्होने सदैव श्रीकृष्ण का साथ दिया। जरासंध के सभी आक्रमणों के समय ये कृष्ण के साथ थे। कहते हैं कि ये श्रीकृष्ण की प्रतिलिपि थे। दूर से देखने पर कोई कृष्ण और इनमे भेद नहीं बता सकता था। गोकुल छोड़ने के बाद कृष्ण ने उद्धव को अपना सन्देश लेकर गोकुल भेजा। वहाँ जब गोपियों ने इन्हे देखा तो उन्हें लगा कि श्रीकृष्ण लौट आये हैं। और तो और उनकी माता यशोदा भी इन्हे देख कर भ्रम में पड़ गयी। तब उद्धव ने उन सभी को अपना परिचय दिया और कृष्ण का सन्देश सुनाया। जब श्रीकृष्ण ने निर्वाण लेने का निर्णय लिया तब उद्धव ने भी साथ चलने की इच्छा जताई। तब कृष्ण ने बताया कि वे वसु नामक देव के अवतार हैं और ये उनका अंतिम जन्म है। फिर कृष्ण ने उन्हें योगमार्ग का उपदेश दिया जो "उद्धव गीता" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसका महत्त्व भी श्रीमद्भगवद गीता के समान ही है। कृष्ण के निर्वाण के बाद उद्धव बद्रिकाश्रम चले गए और वही तप करते हुए अपने प्राण त्यागे।

अर्जुन: कृष्ण और अर्जुन की मित्रता तो जग जाहिर है। ये दोनों नर और नारायण के अवतार थे और इन्हे साथ में कृष्णार्जुन कहा जाता है। अर्जुन कृष्ण की बुआ कुंती के पुत्र थे और कृष्ण के भाई थे। आयु में ये श्रीकृष्ण के ही जितने बड़े थे। महाभारत में कई स्थानों पर श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि इन्हे जितने प्रिय अर्जुन थे उतने और कोई नहीं। अर्जुन भी कृष्ण पर पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रखते थे। यहाँ तक कि निहत्थे कृष्ण के लिए उन्होंने १ अक्षौहिणी नारायणी सेना को छोड़ दिया था। महाभारत युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन का सारथि बनना स्वीकार किया। यही नहीं केवल अर्जुन को ही उन्होंने गीता ज्ञान के योग्य समझा और इस गूढ़ रहस्य का ज्ञान दिया। अर्जुन के प्राणों की रक्षा हो सके इसके लिए कृष्ण ने हर उपाय किया। यहाँ तक कि अर्जुन और पांडवों की विजय के लिए इन्होने धर्म-अधर्म का त्याग करते हुए छल का भी सहारा लिया। जब युद्ध समाप्त हुआ तो अर्जुन के रथ से उतरने के बाद जैसे ही श्रीकृष्ण उतरे, उनका रथ भस्म हो गया। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें ये रहस्य बताया कि वही अब तक उनकी रक्षा कर रहे थे। महाभारत के ३६ वर्षों के बाद जब श्रीकृष्ण ने निर्वाण लिया तब अर्जुन और पांडवों ने भी पृथ्वी को त्यागने का निर्णय लिया। तब अर्जुन द्वारिका की स्त्रियों और धन सम्पदा को अपने साथ ले चले किन्तु मार्ग में कुछ दस्युओं ने सब कुछ लूट लिया। महारथी अर्जुन उस समय अपने गांडीव पर प्रत्यंचा भी ना चढ़ा सके। तब महर्षि व्यास ने उन्हें बताया कि उनका जो बल था वो भी श्रीकृष्ण के साथ ही चला गया। फिर पांडवों ने द्रौपदी सहित इस पृथ्वी का त्याग कर दिया।

2 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरत वर्मा जी,
    आपके ब्लॉग्स में नित कुछ न कुछ नया पढ़ने को मिलता है।
    धन्यवाद, हिंदुत्व पर इतना ज्ञान प्रसार करने के लिये।।।

    दीवान भारद्वाज
    शिमला हि० प्र०

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    1. धन्यवाद दीवान भाई। बहुत अच्छा लगा ये जानकर कि आप भी हमारे लेख पढ़ते हैं। कृपया औरों को भी इसके बारे में बताएं।

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