18 अक्तूबर 2019

अतिकाय - १

हम सबने रावण के ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद के विषय में जरूर पढ़ा होगा किन्तु रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में अधिक जानकारी नहीं दी गयी है। इस लेख में रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में बताया जाएगा। वो रावण के ७ पुत्रों में से एक था जो मंदोदरी से उत्पन्न हुआ था। हालाँकि कई ग्रंथों में रावण की दूसरी पत्नी धन्यमालिनी को अतिकाय की माता बताया जाता है। धन्यमालिनी मंदोदरी की छोटी बहन थी जो मय दानव और हेमा अप्सरा की पुत्री थी। 

मेघनाद जैसे पराक्रमी पुत्र को प्राप्त करने के बाद रावण ने एक और महापराक्रमी पुत्र की कामना से भगवान रूद्र की आराधना की। उनकी कृपा से रावण को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जो जन्म लेते ही पर्वताकार आकार का हो गया। उसका इतना विशाल रूप देख कर रावण ने उसका नाम अतिकाय (विशाल काया वाला) रखा। कहा जाता है कि अतिकाय आकार में जांबवंत जी के समान और अपने चाचा कुम्भकर्ण से थोड़ा ही छोटा था।

जब उसका जन्म हुआ तो उसने भयंकर गर्जना की। उस गर्जना को सुनकर स्वर्ग में देवता तक भयभीत हो गए। सब देवता परमपिता ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि पहले से ही रावण और कुम्भकर्ण के अत्याचारों से हम आक्रांत हैं और अब इतना महाकाय राक्षस भी उन्ही के कुल में जन्मा है। इसके वध का क्या उपाय है? तब ब्रह्मदेव ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि समय आने पर भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम के छोटे भाई के द्वारा इस राक्षस का वध होगा।

जब अतिकाय युवा हुआ और हर तरह की युद्धकला में प्रवीण हो गया तब उसने एक दिन अपने पिता को महारुद्र की पूजा करते हुए देखा। तब उसने रावण से पूछा - "हे पिताश्री! आप ये किसकी पूजा कर रहे है? आपने तो देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर सब पर विजय पायी है। आप तो स्वयं तीनों लोकों में अजेय हैं फिर आपको किसी की पूजा करने की क्या आवश्यकता?"

तब रावण ने कहा - "पुत्र! ये महारुद्र है जो कैलाश पर निवास करते हैं। इन्होने सर्वप्रथम मुझे खेल-खेल में ही परास्त कर दिया था। तीनों लोकों में ऐसा कोई नहीं जो इनके पराक्रम का क्षण भर भी सामना कर सके। मुझे तो दिव्यास्त्र प्राप्त हुए है और उससे भी घातक मेरे पास जो चन्द्रहास खड्ग है वो भी इन्ही की कृपा से प्राप्त हुआ है। तुम्हारा बड़ा भाई मेघनाद जो आज तीनों लोकों में अविजित है वो भी केवल महारुद्र द्वारा प्रदान किये बल के कारण है। इसीलिए मैंने जीवन में केवल इन्ही की अधीनता स्वीकार की है।"

ये सुनकर अतिकाय ने कहा - "पिताश्री! आपके द्वारा महारुद्र का वर्णन सुनकर मुझे भी उनके दर्शन की लालसा हो रही है। मुझे बताइये कि किस प्रकार मैं उनकी कृपा प्राप्त कर सकता हूँ?" ये सुनकर रावण अत्यंत प्रसन्न हुआ और अतिकाय से बोला - "पुत्र! ये सुनकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम आज ही कैलाश प्रस्थान करो और महारुद्र के दर्शन प्राप्त करने का प्रयास करो। अगर उनकी कृपा तुम्हे प्राप्त हो गयी तो तुम भी अपने भाई की भांति अजेय हो जाओगे। किन्तु एक बात का ध्यान रखना कि उनके समक्ष किसी प्रकार का दुस्साहस ना करना और सदैव विनम्र रहना अन्यथा तुम्हारा नाश अवश्यम्भावी है।"

अपने पिता से परामर्श प्राप्त कर अतिकाय कैलाश पहुँचा। वहां पर शिवगणों द्वारा रोके जाने पर उसने उत्पात मचाना प्रारम्भ कर दिया। वहाँ का कोलाहल सुनकर भगवान रूद्र क्रोध में वहाँ पहुंचे। जब अतिकाय ने उन्हें देखा तो उनके तेज को सामने उसे और कुछ नहीं सुझा। जब रूद्र ने एक राक्षस को ऐसा उत्पात मचाते देखा तो क्रोध में आकर उन्होंने उसपर अपने  त्रिशूल से प्रहार किया। तब अतिकाय ने असाधारण वीरता का प्रदर्शन करते हुए उनके त्रिशूल को मार्ग में ही पकड़ लिया और तत्काल महारुद्र को प्रणाम करते हुए उनके समक्ष दंडवत लेट गया।

उसका ऐसा पराक्रम और नम्रता देख कर महारुद्र अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उससे उसका परिचय पूछा तब उसने बताया कि वो रावण का पुत्र है। तब भगवान रूद्र ने कहा - "अद्भुत! ऐसी वीरता केवल रावण के पुत्र में ही हो सकती है। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, वर मांगों।" तब अतिकाय ने उनसे शक्ति का वरदान माँगा। उसकी कामना सुनकर भगवान रूद्र ने उसे अतुल शक्ति प्रदान की और साथ ही विभिन्न प्रकार के दिव्यास्त्रों का भी उसे ज्ञान दिया।

चूँकि अतिकाय ने महारुद्र का त्रिशूल पकड़ा था इसीलिए भगवान रूद्र ने उसे अपने त्रिशूल के समान ही एक त्रिशूल प्रदान किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने उसे कई दुर्लभ अस्त्रों का ज्ञान दिया और उसे वरदान दिया कि उसका वध केवल ब्रह्मास्त्र द्वारा ही किया जा सकता है। इस प्रकार भगवान रूद्र से विभिन्न वरदान प्राप्त कर अजेय हो वो अपने पिता के पास लौटा जिससे रावण को बड़ा संतोष हुआ। 

...शेष

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