20 अक्तूबर 2019

अतिकाय - २

पिछले लेख में आपने रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के जन्म के बारे में पढ़ा। आपने ये भी पढ़ा कि किस प्रकार अतिकाय ने अपने पराक्रम से महारुद्र को प्रसन्न किया और उनसे कई वरदान और दिव्यास्त्र प्राप्त किये। अतिकाय को भगवान रूद्र से एक दिव्य त्रिशूल भी प्राप्त हुआ जो अचूक था। जब अतिकाय शक्ति संपन्न होकर वापस आया तब रावण की शक्ति और बढ़ गयी। अब आगे...

अतिकाय के जन्म के विषय में एक कथा और आती है कि वो और उसका भाई त्रिशिरा, जो रावण और धन्यमालिनी का पुत्र था दोनों दैत्य मधु और कैटभ के अवतार थे। पिछले जन्म में भगवान विष्णु के द्वारा दोनों का वध किये जाने के बाद दोनों ने उनसे प्रतिशोध के लिए पुनः त्रेतायुग में रावण के पुत्र के रूप में जन्म लिया।

लंका के युद्ध में अतिकाय के अद्भुत पराक्रम का वर्णन मिलता है। जब युद्ध में रावण के बड़े-बड़े योद्धा मारे गए तब रावण ने अपने दो पुत्रों देवान्तक और नरान्तक को युद्ध के लिए भेजा। दोनों ने वानर सेना में त्राहि-त्राहि मचा दी। ये देख कर युवराज अंगद ने दोनों भाइयों को युद्ध के लिए ललकारा और बहुत देर तक भीषण युद्ध कर उन्होंने देवान्तक और नरान्तक का वध कर दिया। 

जब रावण को ये समाचार मिला तब उसने अपने दोनों पुत्रों त्रिशिरा और अतिकाय को युद्ध के लिए भेजा। दोनों का रूप देख कर वानर सेना तितर बितर हो गयी। अपनी सेना का ये हाल देख कर पवनपुत्र हनुमान त्रिशिरा के साथ भिड़ गए। त्रिशिरा बलशाली अवश्य था किन्तु हनुमान से पार ना पा सका और उनके हाथों युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। 

तभी श्रीराम ने देखा कि एक विशालकाय राक्षस वानर सेना को यूँ काट रहा है जैसे कृषक खेतों से खर-पतवार काटता है। उन्होंने विभीषण से पूछा - "हे लंकेश! ये महान वीर कौन है जिसका आकार आकाश को छू रहा है? कही यही तो प्रसिद्ध कुम्भकर्ण नहीं है?" तब विभीषण ने कहा - "प्रभु! ये कुम्भकर्ण नहीं बल्कि रावण का पुत्र अतिकाय है। किन्तु आप इसे कुम्भकर्ण से कम समझने की भूल ना करें। ये वो वीर है जिसने स्वयं रूद्र का त्रिशूल बीच मार्ग में पकड़ लिया था। यही नहीं इसने धनुर्विद्या का ज्ञान भी महारुद्र से ही लिया है। अगर इसे ना रोका गया तो ये पूरी सेना का नाश कर देगा। अतः इसका अंत तत्काल कर देना चाहिए।"

तब श्रीराम लक्ष्मण और हनुमान के साथ अतिकाय के समक्ष पहुंचे। उन्हें अपने सामने आया देख कर अतिकाय ने साधारण वानरों को मारना छोड़ दिया और उनके समक्ष आकर बोला - "तो तुम राम हो? लंका के कुछ वीरों का अंत कर ये ना समझना कि लंका वीरों से रिक्त हो गयी है। पिताश्री बिना कारण ही तुम जैसे तुच्छ मनुष्य के कारण पीड़ित हो रहे हैं। आज मैं तुम्हे तुम्हारे भाई और कुटुंब सहित यमलोक भेज दूंगा।"

इस प्रकार उसने श्रीराम को और भी कई अपशब्द बोले। उसकी बातें श्रीराम तो शांति से सुनते रहे किन्तु लक्ष्मण उनका अपमान सहन नहीं कर सके और श्रीराम से उसके वध की आज्ञा मांगी। तब श्रीराम ने उन्हें आश्रीवाद देकर युद्ध करने भेजा। स्वयं लक्ष्मण को युध्क्षेत्र में आया देख कर वानर सेना हर्ष के मारे सिंहनाद करने लगी। अब अतिकाय और लक्ष्मण में भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ।

अतिकाय के द्वारा किये गए सारे वार लक्ष्मण ने बात ही बात में काट दिए किन्तु उनका एक भी वार अतिकाय को रोकने में सफल नहीं हुआ। ये देख कर लक्ष्मण और अतिकाय ने एक दूसरे पर दिव्यास्त्रों से प्रहार करना आरम्भ किया किन्तु कोई परिणाम नहीं निकला। जब अतिकाय ने देखा कि लक्ष्मण पर विजय दिव्यास्त्रों से भी संभव नहीं है तो उसने रूद्र द्वारा प्रदान किया गया त्रिशूल उनपर छोड़ा। ये देख कर महाबली हनुमान ने अतिकाय की ही भांति उस त्रिशूल को मार्ग में भी पकड़ कर तोड़ डाला। 

अब लक्ष्मण आश्चर्य में पड़ गए कि क्यों अतिकाय पर उनके प्रहारों का प्रभाव नहीं पड़ रहा है। ये देख कर देवराज इंद्र ने वायुदेव को लक्ष्मण के पास भेजा। वायुदेव ने लक्ष्मण के पास पहुँच कर उनसे कहा - "हे शेषावतार! इस राक्षस को ये वरदान प्राप्त है कि इसका वध केवल ब्रह्मास्त्र द्वारा ही संभव है। अतः बिना समय गवाए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करें।"

तब पवनदेव का परामर्श मान कर लक्ष्मण ने सबसे घातक महास्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान किया और अंततः अतिकाय का वध कर दिया। अतिकाय के मरते ही राक्षस सेना रोते बिलखते युध्क्षेत्र से भाग खड़ी हुई। जब रावण को अपने वीर पुत्र के मृत्यु का समाचार मिला तो वो मारे शोक के शक्तिहीन हो अपने सिंहासन पर गिर पड़ा। तब श्रीराम ने अतिकाय के पराक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उसके शव को अंतिम क्रिया के लिए उसके पिता के पास भिजवा दिया। ॐ शांति।

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