30 अक्तूबर 2019

यम द्वितीया

कल आप सबने यम द्वितीया का पर्व मनाया। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पड़ने के कारण ही इस पर्व का नाम यम द्वितीया पड़ा है। इस नाम का एक कारण ये भी है कि ये पर्व दीपावली के दो दिनों के बाद आता है। इसी को भाई दूज के नाम से भी जाना जाता है। भाई दूज का महत्त्व रक्षा बंधन के समान ही है जिसमे बहनें अपने भाइयों को रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनके वज्र के समान शक्तिशाली होने की कामना करती हैं। बदले में भाई भी अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है।

इसके पीछे की कथा कुछ इस प्रकार है। भगवान सूर्यनारायण के उनकी पत्नी संध्या से दो संतानें थी - पुत्र यम एवं पुत्री यमुना। ब्रह्मदेव ने प्राणियों के जीवन मरण का भार यमराज को सौंपा। अब जन्म और मृत्यु तो सदा चलने वाली प्रक्रिया है अतः यमराज सदैव उसी में व्यस्त रहते थे। उनकी बहन यमुना प्रायः उनसे मिलने यमलोक जाया करती थी। वापस लौटते हुए वो सदैव अपने भाई से अपने यहाँ आने का अनुरोध करती रहती थी किन्तु यमराज अपनी व्यस्तताओं के कारण कभी यमुना का घर नहीं जा पाते थे।

28 अक्तूबर 2019

गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पूजा हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्यौहार है जो दीपावली के दो दिन के बाद मनाया जाता है। उत्तरप्रदेश के ब्रज, गोकुल और वृन्दावन में तो दीवाली के अगले दिन से ही गोवर्धन पूजा का आरम्भ हो जाता है। उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड और मध्यप्रदेश में इस पूजा को धूम धाम से मनाया जाता है। इसका एक नाम अनंतकूट भी है और बिहार में इस पर्व को भाई दूज और चित्रगुप्त पूजा के साथ ही मनाया जाता है। बिहार में इसे अपभ्रंश रूप से "गोधन पूजा" भी कहा जाता है।

26 अक्तूबर 2019

नरक चौदस

आज नरक चौदस का त्यौहार है। हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, दीवाली से एक दिन पहले ये त्यौहार आता है और इसी कारण इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं। इसके कई और नाम हैं - काली चौदस, रूप चौदस, नर्क निवारण चतुर्दशी, भूत चतुर्दशी, नर्का पूजा इत्यादि। कहते हैं कि इस दिन प्रातः काल तेल की मालिश कर के स्नान करने पर नर्क की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है। इसी दिन शाम को दीप दान किया जाता है जिससे यमराज प्रसन्न होते हैं। 

24 अक्तूबर 2019

श्रीकृष्ण के तीन सबसे घनिष्ठ मित्र

श्रीकृष्ण की मित्रता जिसे प्राप्त हो जाये उसे और क्या चाहिए। महाभारत में ऐसे कई व्यक्ति हैं जिन्हे श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त थी। पांडवों पर तो वैसे ही उनकी कृपा थी पर इसके अतिरिक्त भी वे जिनसे मिलते थे उसे अपने स्वाभाव से अपना मित्र बना लेते थे। वैसे तो उनके मित्रों की संख्या बहुत अधिक है किन्तु इस लेख में हम श्रीकृष्ण के उन ३ मित्रों के बारे में बताएँगे जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय थे।

सुदामा: जब भी मित्रता की बात होती है तो कृष्ण-सुदामा का नाम अवश्य आता है। सुदामा श्रीकृष्ण के बाल सखा और अनन्य भक्त थे। कंस के वध के बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने गए तो वहाँ उनकी भेंट सुदामा से हुई। सुदामा एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण कुमार थे जो पहले से ही सांदीपनि मुनि के यहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उनका एक स्वाभाव था कि वो किसी से कुछ मांगते नहीं थे। एक बार वर्षाकाल में कृष्ण और सुदामा जंगल में अलग-अलग वृक्षों पर फस गए। उनकी गुरुमाता ने उन्हें कुछ चावल दिए थे जो सुदामा के पास थे। भूख लगने पर सुदामा ने वो सारे चावल खा लिए। जब श्रीकृष्ण को ये पता चला तो उन्होंने हँसते हुए कहा कि अब उनपर श्रीकृष्ण का ऋण है।

22 अक्तूबर 2019

श्रीफल के जन्म की कथा

नारियल हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र वस्तुओं में से एक माना जाता है। इसे श्रीफल भी कहते हैं, अर्थात समृद्धि देने वाला फल। इसीलिए इसे माता लक्ष्मी से भी जोड कर देखा जाता है। दुनिया में केवल नारियल ही एक ऐसा फल है जो पूर्ण रूप से शुद्ध है और जिसमें किसी भी प्रकार की मिलावट नहीं की जा सकती। यही नहीं, केवल नारियल ही एक ऐसा वृक्ष है जिससे जुडी हर चीज मनुष्य के काम आती है। इसीलिए भारत, विशेषकर दक्षिण भारत में इसे "कल्पवृक्ष" भी कहा जाता है।

20 अक्तूबर 2019

अतिकाय - २

पिछले लेख में आपने रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के जन्म के बारे में पढ़ा। आपने ये भी पढ़ा कि किस प्रकार अतिकाय ने अपने पराक्रम से महारुद्र को प्रसन्न किया और उनसे कई वरदान और दिव्यास्त्र प्राप्त किये। अतिकाय को भगवान रूद्र से एक दिव्य त्रिशूल भी प्राप्त हुआ जो अचूक था। जब अतिकाय शक्ति संपन्न होकर वापस आया तब रावण की शक्ति और बढ़ गयी। अब आगे...

अतिकाय के जन्म के विषय में एक कथा और आती है कि वो और उसका भाई त्रिशिरा, जो रावण और धन्यमालिनी का पुत्र था दोनों दैत्य मधु और कैटभ के अवतार थे। पिछले जन्म में भगवान विष्णु के द्वारा दोनों का वध किये जाने के बाद दोनों ने उनसे प्रतिशोध के लिए पुनः त्रेतायुग में रावण के पुत्र के रूप में जन्म लिया।

18 अक्तूबर 2019

अतिकाय - १

हम सबने रावण के ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद के विषय में जरूर पढ़ा होगा किन्तु रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में अधिक जानकारी नहीं दी गयी है। इस लेख में रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में बताया जाएगा। वो रावण के ७ पुत्रों में से एक था जो मंदोदरी से उत्पन्न हुआ था। हालाँकि कई ग्रंथों में रावण की दूसरी पत्नी धन्यमालिनी को अतिकाय की माता बताया जाता है। धन्यमालिनी मंदोदरी की छोटी बहन थी जो मय दानव और हेमा अप्सरा की पुत्री थी। 

16 अक्तूबर 2019

भूरिश्रवा - २

पिछले लेख में आपने भूरिश्रवा के वंश के बारे में पढ़ा। वो भी कुरुवंशी थे और धृतराष्ट्र के भाई और भीष्म के भतीजे थे। उनके पिता सोमदत्त और सात्यिकी के पिता शिनि की प्रतिद्वंदिता के कारण कुरुओं और यादवों में वैमनस्व बढ़ गया। दोनों ने भगवान शंकर से पुत्र की कामना की जिससे भूरिश्रवा और सात्यिकी का जन्म हुआ। अब आगे...

14 अक्तूबर 2019

भूरिश्रवा - १

भूरिश्रवा महाभारत के सबसे प्रसिद्ध योद्धाओं में से एक थे। इन्होने महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष से युद्ध किया था। कौरव सेना के प्रधान सेनापति भीष्म ने अपनी ११ अक्षौहिणी सेना के लिए जिन ११ सेनापतियों का चयन किया था, भूरिश्रवा उन सेनापतियों में से एक थे। भूरिश्रवा का वध युद्ध के १४वें दिन सात्यिकी ने किया था। वास्तव में भूरिश्रवा कुरुवंशी ही थे और महाभारत युद्ध में उनके साथ उनके पिता और दादा ने भी युद्ध किया था। 

12 अक्तूबर 2019

शरद पूर्णिमा

कल शरद पूर्णिमा का पर्व है। इस पर्व का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है। आश्विन महीने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। शरद का एक अर्थ चन्द्रमा भी है और इस दिन चाँद की किरणों का अपना एक अलग ही महत्त्व होता है। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र की किरणों में स्वयं अमृत समाहित होता है। यही कारण है कि आज के दिन गावों में लोग खुले आकाश एवं चांदनी के नीचे सोते हैं। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की रौशनी में रहने से कई प्रकार के रोग समाप्त हो जाते हैं। 

10 अक्तूबर 2019

रावण का मानमर्दन २: असुरराज शंभर

ये रावण के मानमर्दन श्रृंखला का दूसरा लेख है। इससे पहले के लेख में हमने ये बताया था कि किस प्रकार रावण दैत्यराज बलि के हाथों परास्त होने के बाद अपमानित होता है। इस लेख के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। इस लेख में हम असुरराज शंभर के हाथों रावण के पराजय की कथा बताएंगे। शंभर वैजंतपुर के सम्राट थे। उनकी पत्नी माया मय दानव की पुत्री एवं रावण की पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी। इस प्रकार रावण शंभर का सम्बन्धी था।

8 अक्तूबर 2019

माद्री - २

पिछले लेख में अपने पढ़ा कि किस प्रकार दिग्विजय के दौरान हस्तिनापुर के नरेश पाण्डु को अपनी पहली पत्नी कुंती के रहते हुए भी माद्री से विवाह करना पड़ता है। हालाँकि उसके बाद भी कुंती और माद्री के बीच सम्बन्ध सौहार्दयपूर्ण ही रहता है। उसके बाद वे तीनों एकांतवास के लिए वन को जाते हैं और किंदम ऋषि के आश्रम में ठहरते हैं। अब आगे...

6 अक्तूबर 2019

माद्री - १

आज पंजाब में जिस स्थान पर रावी और चिनाब नदियों का मिलन होता है उसे ही पहले मद्रदेश कहा जाता था। वहाँ के एक राजा थे भगवान, जिन्होंने लम्बे समय तक मद्र पर शासन किया। मद्रदेश उस समय आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राज्यों में से एक माना जाता था। उनकी दो संतानें थी, एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम शल्य और पुत्री का माद्री था। 

4 अक्तूबर 2019

माँ गौरी और उनके वाहन की कथा

माता सती की मृत्यु के उपरांत भगवान शिव बैरागी हो गए। तब सती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उस जन्म में भी उनका महादेव के प्रति अनुराग था और इसी कारण उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की और अंततः उन्हें पति के रूप में प्राप्त किया। दोनों का विवाह बड़ी धूम धाम से हुआ और फिर वे दोनों अपने निवास कैलाश पर लौट आये और कुछ काल उन्होंने बड़े सुख से बिताये। 

एक दिन महादेव और देवी पार्वती कैलाश में बैठे हास-परिहास कर रहे थे कि अचानक महादेव ने उन्हें परिहास में "काली" शब्द से सम्बोधित कर दिया। महादेव का ये सम्बोधन माता पार्वती को चुभ गया और वे तत्काल अपने श्याम रंग से मुक्ति पाने हेतु तपस्या के लिए निकल गयी। महादेव ने उन्हें रोकने का बड़ा प्रयत्न किया किन्तु उन्होंने ये निश्चय कर लिया था कि वो गौर वर्ण प्राप्त कर के ही रहेंगी। 

2 अक्तूबर 2019

माँ दुर्गा के १०८ नाम

माता पार्वती ही संसार की समस्त शक्तियों का स्रोत हैं। उन्ही का एक रूप माँ दुर्गा को भी माना जाता है। उनपर आधारित ग्रन्थ "दुर्गा सप्तसती" में माँ के १०८ नामों का उल्लेख है। प्रातःकाल इन नामों का स्मरण करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर होते हैं। आइये उन नामों और उनके अर्थों को जानें:
  1. सती: भगवान शंकर की पहली पत्नी। अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाली इन देवी का माहात्म्य इतना है कि उसके बाद पति परायण सभी स्त्रियों को सती की ही उपमा दी जाने लगी।
  2. साध्वी: ऐसी स्त्री जो आशावादी हो।
  3. भवप्रीता: जिनकी भगवान शिव पर अगाध प्रीति हो। 
  4. भवानी: समस्त ब्रह्माण्ड ही जिनका भवन हो।