12 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - १: वंश वर्णन

कार्तवीर्य अर्जुन पौराणिक काल के एक महान चंद्रवंशी सम्राट थे जिनकी राजधानी महिष्मति नगरी थी। परमपिता ब्रह्मा के पुत्र अत्रि ऋषि हुए। अत्रि से चंद्र और चंद्र से बुध हुए। बुध और उनकी पत्नी इला के पुत्र महान पुरुरवा हुए जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया। दोनों के पुत्र आयु हुए और आयु के पुत्र नहुष हुए। नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए जिनके ज्येष्ठ पुत्र यदु हुए। इन्ही से यदुकुल चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। यदु के पुत्र सहस्त्रजीत हुए और उनके पुत्र शतजीत हुए। इन्ही शतजीत के पुत्र हैहय हुए जिनसे हैहयवंश चला। इसी वंश में कार्तवीर्य अर्जुन ने जन्म लिया। महाराज हैहय ने प्रतिष्ठानपुर को अपनी राजधानी बनाया।

हैहय शतजीत के सबसे छोटे पुत्र थे। उनके अन्य दो भाई महाहय एवं वेणुहय थे जिनके कुल अलग चले। हैहय ने महाराज रम्य की पुत्री एकावली से विवाह किया। उनका दूसरा विवाह महाराज रम्य के महामंत्री की पुत्री यशोवती के साथ हुआ। इन दोनों का एक पुत्र हुआ जिसका नाम धर्म था और महाराज हैहय के बाद उसे राजगद्दी मिली। धर्म राजयपालन में अपने नाम के समान ही था। महाराज धर्म के नेत्र नामक एक पुत्र हुए जो उनके बाद सम्राट बने।

महाराज नेत्र के बाद उनके पुत्र कुंती राजा बने जिनका विवाह विद्यावती नामक कन्या से हुआ। इन दोनों के सोहंजि नामक एक पुत्र हुआ जिसे बाद में सिंहासन प्राप्त हुआ। उन्होंने अपनी राजधानी प्रतिष्ठानपुर से हटा पर सौहंजीपुर के नाम से बनाई। आज उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में जो शाहजनवा नगर है, वही प्राचीनकाल में सौहंजीपुर था। महाराज सोहंजि का विवाह राजकुमारी चम्पावती से हुआ जिससे इन्हे महिष्मान नाम का पुत्र प्राप्त हुआ। 

महिष्मान बड़े प्रतापी राजा बने और उन्होंने पूरे दक्षिण प्रदेश को विजित कर लिया। बहुत दूर तक अपने राज्य का विस्तार करने के बाद इन्होने नर्मदा नदी के किनारे महिष्मति नगर की स्थापना की और उसे अपनी राजधानी बनाया। आज वही महिष्मति नगर महेश्वर (ओंकारेश्वर) के नाम से जाना जाता है जो मध्यप्रदेश के खण्डवा जिले में है। इनका विवाह महारानी सुभद्रा से हुआ जिनसे इन्हे भद्रश्रेय नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।

भद्रश्रेय ने अपनी राजधानी को महिष्मति से हटा कर काशी में स्थापित कर लिया। किन्तु ये उनकी एक भूल सिद्ध हुई क्यूंकि पास में ही अयोध्या में सूर्यवंशियों का राज्य था। सूर्यवंशियों और चंद्रवंशियों में राज्य विस्तार की प्रतिस्पर्धा चलती ही रहती थी। इसी कारण अयोध्या की सेना ने भद्रश्रेय की सेना पर आक्रमण कर उन्हें काशी से खदेड़ दिया और वहाँ अपना अधिपत्य जमा लिया। भद्रश्रेय का विवाह राजकुमारी दिव्या से हुआ जिनसे उन्हें दर्मद नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। 

महाराज भद्रश्रेय की आकस्मिक मृत्यु हो गयी जिससे दर्मद को किशोरावस्था में ही राज्य संभालना पड़ा। जब उसे सूर्यवंशियों के द्वारा किये गए अपने पिता के अपमान के बारे में पता चला तो उसने सूर्यवंशियों पर आक्रमण कर दिया और बहुत सा धन और भूमि प्राप्त की। उनका विवाह महारानी ज्योतिष्मति से किया गया जिससे उन्हें धनद नाम का एक पुत्र प्राप्त हुआ। धनद का विवाह काम्भोजपुर के राजा शर्मा की पुत्री राखीदेवी के साथ किया गया। धनद ने अपने राज्य का विस्तार किया और अथाह धन एकत्रित किया। उसके पास इतना स्वर्ण था कि उसका दूसरा नाम ही कनक पड़ गया। किन्तु अकालमृत्यु के कारण वो कभी अपनी संपत्ति का उपयोग नहीं कर सके और उनकी संपत्ति और स्वर्ण उनके वंशजों को प्राप्त हुआ।

धनद और राखीदेवी के चार पुत्र थे - कार्तवीर्य, क्रतोजा, कृतवर्मा एवं कृताग्नि। धनद की असमय मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र कार्तवीर्य को राज्य मिला। कार्तवीर्य ने कौशकी नामक कन्या से विवाह किया और इनसे ही उन्हें अर्जुन नाम का पुत्र प्राप्त हुआ जो उनके नाम से कार्तवीर्य अर्जुन कहलाया। कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म कार्तिक शुक्ल की सप्तमी तिथि को कृतिका नक्षत्र में हुआ था। आगे श्री दत्तात्रेय से वरदान मिलने के बाद उनका एक नाम सहस्त्रार्जुन भी प्रसिद्ध हुआ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें