14 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - २: अर्जुन से सहस्त्रार्जुन की यात्रा

पिछले लेख में आपने परमपिता ब्रह्मा से लेकर कार्तवीर्य अर्जुन तक के वंश का वर्णन पढ़ा। कार्तवीर्य अर्जुन चंद्रवंशी राजाओं में सबसे प्रतापी थे। उनके पिता महाराज कार्तवीर्य ने अपने राज्य को बहुत बढ़ाया। फिर अपने मंत्रियों की सलाह पर उन्होंने भृगुवंशी ब्राह्मणों को अपने पुरोहितों के रूप में नियुक्त किया। उस समय भृगुवंशी ब्राह्मणों का नेतृत्व परशुराम के पिता जमदग्नि कर रहे थे। महर्षि जमदग्नि के साथ कार्तवीर्य के बहुत मधुर सम्बन्ध थे। कार्तवीर्य जमदग्नि का बड़ा आदर करते थे और राजकाज में उनका परामर्श लेते थे।

परशुराम उस समय बालक ही थे और उनका नाम इनके पितामह ऋचीक ने राम रखा था। महर्षि जमदग्नि और उनके आश्रम को महाराज कार्तवीर्य का पूर्ण संरक्षण प्राप्त था। उनके द्वारा किये गए हर यज्ञ को महर्षि जमदग्नि ही पूर्ण करते थे। कार्तवीर्य के ज्येष्ठ पुत्र अर्जुन, जो अपने पिता के नाम पर कार्तवीर्य अर्जुन कहलाते थे उस समय युवा थे। वे शस्त्र एवं शास्त्रों में निपुण थे और अपने पिता को राज-काज चलाने में सहायता करते थे। महाराज कार्तवीर्य की मृत्यु के बाद कार्तवीर्य अर्जुन को राजसिंहासन मिला। 

राजा बनने के पश्चात उन्होंने अपने मंत्रियों से पूछा कि एक राजा में सबसे महत्वपूर्ण गुण कौन सा होता है। तब सभी मंत्रियों ने कहा कि शक्ति ही एक राजा का सर्वाधिक घातक अस्त्र होता है क्यूंकि उसी के बल पर वो शत्रुओं का दमन करता है। अर्जुन स्वयं बहुत शक्तिशाली थे किन्तु अपने मंत्रियों की बात सुनकर उन्होंने तपस्या कर अतुलित शक्ति प्राप्त करने का निश्चय किया। वे तपस्या करने वन की ओर निकल गए। मार्ग में उन्हें देवर्षि नारद मिले। उन्हें प्रणाम कर अर्जुन ने उनसे पूछा कि शक्ति प्राप्त करने के लिए उन्हें किसकी तपस्या करनी चाहिए? तब देवर्षि ने कहा - "हे राजन! इस समय संसार में श्री दत्तात्रेय से महान और कोई नहीं। वे स्वयं भगवान विष्णु के अंश हैं और उन्हें प्रसन्न कर आप अतुल बल को प्राप्त कर सकते हैं।"

तब देवर्षि के परामर्श पर अर्जुन ने १२ वर्षों तक श्री दत्तात्रेय की घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः श्री दत्तात्रेय ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। तब अर्जुन ने कहा - "हे प्रभु! व्यक्ति का सबसे बड़ा आधार उसका बल ही होता है। और मैं तो एक सम्राट हूँ इसी कारण बल को प्राप्त करना मेरे लिए अनिवार्य है। अतः मैं आपसे बल का ही वरदान चाहता हूँ। आप मुझे ऐसा वरदान दीजिये जिससे मेरे सामने कोई भी योद्धा टिक ना सके और मैं अपने राज्य का रक्षण स्वयं के बल पर कर सकूँ।

तब दत्तात्रेय ने उन्हें १००० भुजाओं का वरदान दिया। उन्होंने कहा कि उन भुजाओं के कारण उनकी शक्ति सहस्त्र गुणा बढ़ जाएगी और कोई भी योद्धा उनका सामना नहीं कर सकेगा। वे जब भी चाहेंगे अपनी भुजाओं को प्रकट कर सकेंगे और जब भी चाहेंगे उसे लुप्त कर पाएंगे। युद्ध स्थल में उनकी ये १००० भुजाएं देख कर उनकी सेना को परम अभय की प्राप्ति होगी और वही उनकी भुजाएं देख कर शत्रु सेना के ह्रदय में ऐसा भय व्याप्त हो जाएगा कि वो उनसे युद्ध का साहस ही नहीं कर पाएंगे। भगवान विष्णु और उनके अंशावतार के अतिरिक्त उन्हें और कोई परास्त नहीं कर पायेगा। आज से ये जगत उन्हें "सहस्त्रार्जुन" के नाम से बुलाएगा।

भगवान दत्तात्रेय से ऐसा अद्भुत वरदान पा कर उन्होंने दंडवत उन्हें प्रणाम किया और चिरकाल तक उनकी भक्ति का वरदान भी उनसे माँगा। उसके बाद वापस आकर उन्होंने अपनी अथाह शक्ति के बल पर अपने राज्य को अनंत तक विस्तृत कर लिया। उन्होंने पृथ्वी के सातों द्वीपों पर अधिपत्य कर लिया। कई शक्तिशाली राजाओं ने उनके साथ युद्ध करने का प्रयास किया किन्तु अपनी अतुलित शक्ति के बल पर उन्होंने अकेले ही सभी राजाओं और योद्धाओं को जीत लिया। सातों द्वीपों पर अधिकार प्राप्त करने के बाद वे सप्तद्वीपाधिपति के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उन्होंने सातों द्वीपों पर कुल ७०० यज्ञ किये और ब्राह्मणों एवं भिक्षुकों को बहुत धन एवं भूमि दान की। इस प्रकार वे सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सुख पूर्वक राज्य करने लगे। पूरी पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं था जो सहस्त्रार्जुन को युद्ध की चुनैती देने का साहस कर सके। अन्य योद्धाओं की तो क्या बात थी, जब लंकाधिपति रावण सातों द्वीपों को जय करता हुआ महिष्मति पहुँचा तो वो भी सहस्त्रार्जुन से परास्त हुआ। बाद में रावण के दादा महर्षि पुलत्स्य की आज्ञा पर सहस्त्रार्जुन ने रावण को मुक्त किया। इस विषय में एक विस्तृत लेख अलग से धर्मसंसार पर प्रकाशित किया जाएगा।

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