16 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - ३: परशुराम के साथ युद्ध और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि अपने पिता कार्तवीर्य की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कार्तीवीर्य अर्जुन को सिंहासन प्राप्त हुआ। और अधिक शक्ति प्राप्त करने के लिए अर्जुन ने श्री दत्तात्रेय की घोर आराधना कर उनसे १००० भुजाओं का वरदान प्राप्त किया। उन १००० भुजाओं के कारण ही उनका एक नाम सहस्तार्जुन भी हुआ। अपनी इस शक्ति के बल पर उसने सातों द्वीपों पर अपना अधिकार जमा लिया और सप्तद्वीपाधिपति कहलाया। यहाँ तक कि लंकापति रावण को भी उसने युद्ध में परास्त किया। अब आगे...

सहस्त्रार्जुन अपनी शक्ति के बल पर प्राप्त किये गए राज्य को बहुत काल तक भोगता रहा। अपने पिता कार्तवीर्य की भांति उसने भी भार्गववंशी ऋषियों को अपने राजपुरोहितों के स्थान पर नियुक्त किया। उनके नेता परशुराम के पिता जमदग्नि का वो भी सम्मान करता था किन्तु उनपर उसे अपनी पिता की भांति श्रद्धा और आस्था नहीं थी। पुराणों में ऐसा कोई वर्णन नहीं मिलता कि अपने वरदान और बल के कारण सहस्त्रार्जुन को किसी प्रकार का अभिमान हो गया था। इसके उलट उनकी गिनती उन महान सम्राटों में होती थी जो अपनी प्रजा का अपने पुत्र की भांति ध्यान रखते थे। किन्तु उनसे भी एक बहुत बड़ी गलती हुई जो उनके जीवन की अंतिम भूल साबित हुई।

उस समय सहस्त्रार्जुन अपनी प्रौढ़ावस्था तक पहुँच चुके थे। दूसरी ओर जमदग्नि के पुत्र राम की कीर्ति पूरे विश्व में फ़ैल चुकी थी। वे त्रिदेवों से वरदान प्राप्त कर अजेय हो चुके थे। महादेव ने उन्हें प्रसन्न होकर एक विकराल परशु दिया था जो संसार के सबसे अधिक घातक शस्त्रों में से अग्रणी था। उस परशु के कारण वे विश्व में परशुराम के नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे। विश्व में ये प्रसिद्ध था कि वो स्वयं श्रीहरि विष्णु के अवतार हैं और उन्हें परास्त करना असंभव है। साथ ही साथ उन्हें महादेव से चिरंजीवी होने का भी वरदान प्राप्त था।

एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी विशाल सेना सहित महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुँचे। उस समय परशुराम वहाँ उपस्थित नहीं थे। महर्षि जमदग्नि ने उनका स्वागत किया और कहा कि वे अपनी सेना सहित उनके आश्रम में ही विश्राम करें तब तक वे उनके भोजन आदि का प्रबंध करते हैं। तब सहस्त्रार्जुन ने आश्चर्य से पूछा - "हे महर्षि! आप तो एक ब्राह्मण हैं फिर आप किस प्रकार मेरी इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कर सकते हैं?" तब जमदग्नि ने कहा - "हे राजन! ईश्वर की कृपा से मेरे पास कामधेनु गाय है जो किसी भी कामना को पूर्ण कर सकती है।"

तब उन्होंने स्वयं सहस्त्रार्जुन को कामधेनु का चमत्कार दिखाया। केवल उनकी इच्छा मात्र से कामधेनु ने बात ही बात में पूरी सेना के भोजन का प्रबंध कर दिया। उस महान गौ का ऐसा चमत्कार देख कर दैवयोग से सहस्त्रार्जुन के मन में उसे प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गयी। उसने अपनी इच्छा महर्षि जमदग्नि से कही तो उन्होंने नम्रतापूर्वक उन्हें मना कर दिया। बस यही सहस्त्रार्जुन के अभिमान को ठेस पहुँच गयी और वो बलात ही कामधेनु को अपने साथ ले गया। उसकी सेना ने महर्षि जमदग्नि का आश्रम भी तहस नहस कर दिया।

थोड़ी देर बाद जब परशुराम आश्रम वापस लौटे तो वहाँ की हालत देख कर अपने पिता से उसका कारण पूछा। तब जमदग्नि ने उन्हें सारी बातें बता दी। ये सुनकर परशुराम के क्रोध का ठिकाना ना रहा। वे अपना विकराल परशु लेकर तीव्र गति से उसी दिशा में बढे जिधर सहस्त्रार्जुन की सेना गयी थी। पूरी सेना होने के कारण उनकी गति बड़ी धीमी थी इसी कारण परशुराम ने उन्हें मार्ग में ही देख लिया। उन्होंने अकेले ही पूरी सेना को रोकते हुए सहस्त्रार्जुन से कहा - "हे राजन! तुम जैसे सम्राट को इस प्रकार ब्राह्मणों का अपमान कर उनकी संपत्ति हड़पना शोभा नहीं देता। अगर अपने प्राणों की रक्षा चाहते हो तो कामधेनु को मुझे लौटा दो।"

एक युवा को इस प्रकार आह्वान देता देख सहस्त्रार्जुन की सेना ने परशुराम पर आक्रमण कर दिया पर उन्होंने बात ही बात में उन सभी को परलोक पहुँचा दिया। कार्तवीर्य अर्जुन बहुत काल से कोई युद्ध नहीं लड़े थे इसी कारण परशुराम जैसे योद्धा को देख कर वे प्रसन्नता पूर्वक युद्ध के लिए आगे आये। दोनों ओर ऐसे योद्धा थे जिन्होंने कभी पराजय का मुख नहीं देखा था। दोनों ने कई प्रकार के वरदान को प्राप्त किया था। बस अंतर इतना था कि परशुराम युवा थे और सहस्तार्जुन वृद्ध हो चले थे। किन्तु वे वृद्ध अवश्य थे किन्तु उनकी शक्ति को पूरा विश्व जानता था।

जब परशुराम अपना विकराल परशु लेकर और सहस्तार्जुन अपने १००० भुजाओं के साथ युद्ध के आगे बढे तो ऐसा लगा जैसे दोनों के टकराव से प्रलय आ जाएगा। दोनों के बीच भयानक युद्ध होने लगा। दोनों को युद्ध करते हुए कई दिन बीत गए और ऐसा लगा जैसे दोनों में से कोई नहीं जीत पायेगा। किन्तु परशुराम युवा थे और साथ ही उनके पास त्रिदेवों के वरदान के साथ-साथ चिरंजीवी होने का भी वरदान था। कई दिनों के युद्ध के पश्चात अंततः युवा परशुराम ने वृद्ध सहस्त्रार्जुन को परास्त कर दिया। उन्होंने सहस्त्रार्जुन की १००० भुजाओं को अपने परशु से काट डाला और अंततः उसी परशु ने उनका वध कर दिया। उनके वध के बाद उनकी बची हुई सेना वहाँ से भाग निकली। उसके पश्चात परशुराम कामधेनु को लेकर वापस अपने पिता के आश्रम लौट आये।

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