18 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - ४: सहस्तार्जुन के बाद का वंश

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार अर्जुन को अपने पिता कार्तवीर्य के बाद राजगद्दी मिलती है और वो महर्षि जमदग्नि के आश्रम से उनकी प्रिय गाय कामधेनु को बलात अपने साथ ले जाता है। जब परशुराम को इस बात की जानकारी मिलती है हो तो वे सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारते हैं और दोनों में भीषण युद्ध होता है। उस युद्ध में अंततः सहस्त्रार्जुन की मृत्यु हो जाती है। अब आगे...

अपने महान कार्यों, अद्भुत पराक्रम और अपने साम्राज्य को इतनी दूर फैला देने के कारण कार्तवीर्य अर्जुन के मुख्य ७ नाम हुए:
  1. अर्जुन: जन्म का नाम 
  2. कार्तवीर्य अर्जुन: अपने पिता कार्तवीर्य के कारण 
  3. महषिमति नरेश: महिष्मति के राजा होने के कारण
  4. सहस्त्रार्जुन/सहस्त्रबाहु: भगवान दत्तात्रेय के द्वारा १००० भुजाओं का वरदान पाने के कारण
  5. सप्तद्वीपेश्वर: सातों द्वीपों को जीतने के कारण
  6. दशग्रीवजयी: लंकापति रावण को परास्त करने के कारण
  7. राजराजेश्वर: राजाओं के भी राजा होने के कारण
सहस्त्रार्जुन की मृत्यु के पश्चात जब उनके पुत्रों को इसका समाचार मिलता है तो वे जमदग्नि ऋषि के आश्रम जाकर उनकी हत्या कर देते हैं। जब परशुराम को ये पता चलता है तो वे इतने क्रोधित होते हैं कि हैहयवंश का समूल नाश कर देते हैं। उनका क्रोध यहाँ ही नहीं रुकता बल्कि वे उससे भी आगे जाकर २१ बार पृथ्वी को क्षत्रियों से शून्य कर देते हैं। बाद में महर्षि कश्यप उन्हें समझा-बुझा कर ये हत्याकांड रुकवाते हैं और परशुराम को महेंद्र पर्वत पर निवास करने की आज्ञा देते हैं। 

सहस्त्रार्जुन की पत्नियों के विषय में पुराणों में कोई सटीक जानकारी तो नहीं है पर उनकी कई रानियों का वर्णन है जिनमे से सात रानियाँ प्रमुख हैं:
  1. सुकृति
  2. पुद्यागंधा
  3. मनोरमा
  4. यमघंत्ता
  5. बसुमती
  6. विष्ट्भाद्र
  7. मृगा
जब महर्षि कश्यप ने परशुराम को क्षत्रियों की हत्या करने से रोका और महेंद्र पर्वत पर भेज दिया तब महर्षि कश्यप ने सहस्त्रार्जुन के बचे हुए पाँच पुत्रों में से सबसे ज्येष्ठ पुत्र जयध्वज को महिष्मति का सम्राट बना दिया। जयध्वज का एक नाम क्रताग्नि भी था। ऐसा वर्णन मिलता है कि जयध्वज बड़े प्रतापी एवं प्रराक्रमी थे और अपने पिता सहस्त्रबाहु के समान ही भगवान दत्तात्रेय के परम भक्त थे। उन्होंने भी महिष्मति को ही अपनी राजधानी बनाया और उनका विवाह राजकुमारी सत्य-भू से हुआ।

इन दोनों के ज्येष्ठ पुत्र का नाम तालजंघ था जिसे अपने पिता के बाद सिंहासन मिला। तालजंघ के कुल १०० पुत्र हुए जिन्हे तालजंघवंशी कहा गया। आपने पिछले लेख में सहस्त्रार्जुन के पूर्वज महाराज धनद (कनक) के बारे में पढ़ा था। उनके द्वारा संचित धन इन्ही तालजंघवंशियों को मिला जिससे महिष्मति की बड़ी उन्नति हुई। आगे चल कर हैहयवंश पाँच भागों में विभक्त हो गया:
  1. बीतिहोत्र कुल
  2. भोज कुल
  3. अवान्ति कुल
  4. शौदिकेय कुल
  5. स्वयाजात कुल
पुराणों के अनुसार बीतिहोत्र कुल के संस्थापक महाराज बीतिहोत्र ही हैहयवंश के अंतिम राजा हुए जिन्हे उस विशाल साम्राज्य का दक्षिणी भाग प्राप्त हुआ। इन्होने पुनः महिष्मति को अपने राज्य की राजधानी बनाया। बीतिहोत्र के अनंत नामक एक पुत्र हुए और अनंत के पुत्र हुए दुर्जय। इन्ही दुर्जय ने अवंतिकापुरी नगरी का निर्माण करवाया जिसे आजकल हम उज्जैन कहते हैं। 

यही कारण है कि उज्जैन और मध्यप्रदेश में महाराज सहस्त्रार्जुन एवं उनके वंशजों का बड़ा सम्मान है। मध्यप्रदेश के महेश्वर में सहस्त्रबाहु का एक मंदिर है जिसे राजराजेश्वर मंदिर कहते हैं। यहाँ पर ११ दीपक अनंतकाल से अखंड जल रहे हैं। ये कैसे हो रहा है वो भी एक रहस्य ही है। जय सहस्त्रबाहु।

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