4 सितंबर 2019

गणेश चतुर्थी - २

पिछले लेख में आपने श्रीगणेश के जन्म की कथा पढ़ी। आपने ये भी जाना कि साल के हर महीने में श्रीगणेश की पूजा होती है जिसे हम "विनायक चतुर्थी" कहते हैं पर उनमे से भाद्रपद की चतुर्थी तिथि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है जिसे हम "गणेश चतुर्थी" कहते हैं। ये तो सभी जानते हैं कि गणेश चतुर्थी का त्यौहार १० दिनों तक रहता है और उसके बाद उनकी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा के पीछे भी एक कथा है। 

बात तब की है जब ब्रह्मदेव की प्रेरणा से महर्षि व्यास ने महाभारत की कथा को लिखने का निर्णय लिया। उन्होंने ये निश्चय किया कि वे केवल श्लोकों की रचना करेंगे। किन्तु फिर उस महान कथा को लिपिबद्ध कौन करे? तब उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वे उस कथा को लिखने की कृपा करें। उनका अनुरोध सुनकर श्रीगणेश उस कथा को लिखने के लिए तैयार तो हो गए पर उन्होंने एक शर्त रख दी कि एक बार लिखना शुरू होने के बाद उनकी लेखनी कभी रुकनी नहीं चाहिए। अगर व्यास ने कथा सुनाना बंद किया और उनकी लेखनी रुकी तो वे आगे उस कथा को नहीं लिखेंगे।

ऐसी विचित्र शर्त सुन कर महर्षि व्यास ने भी एक शर्त रख दी कि जब तक वे उनके द्वारा बोले श्लोकों को ठीक-ठीक समझ ना लें तब तक वे उसे ना लिखें। श्रीगणेश ने उनकी शर्त मान ली। कथा आरम्भ हुई। श्रीगणेश का लेखन अत्यंत त्वरित था। ये देख कर व्यास मुनि बीच-बीच में अपने श्लोकों को कठिन बना देते थे जिसको पूर्ण रूप से समझने के लिए श्रीगणेश को थोड़ा समय लग जाता था। उसी बीच व्यास अन्य श्लोकों की रचना कर लेते थे। इस प्रकार महाभारत की कथा समाप्त हुई।

किन्तु जब श्रीगणेश ने कथा लिखनी आरम्भ की तो उस समय वे ना भोजन कर सकते थे और ना ही जल पी सकते थे। इस कारण उनका तापमान बहुत बढ़ गया। उस ताप को महसूस कर महर्षि व्यास ने उन्हें मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया ताकि उनके शरीर का ताप थोड़ा कम हो जाये। किन्तु जब १० दिन के बाद कथा समाप्त हुई तो उस मिट्टी से ढंके होने के बाद भी श्रीगणेश का तापमान बहुत बढ़ गया। तब व्यास मुनि ने उन्हें पास के सरोवर में डुबकी लगाने का सुझाव दिया। जल में प्रवेश करने के बाद ही श्रीगणेश का तापमान पुनः सामान्य हो पाया। तभी से गणेश चतुर्थी के उपलक्ष्य पर श्रीगणेश की मिट्टी की प्रतिमा बनाने और उसके १० दिन के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन उसके विसर्जन की परंपरा आरम्भ हुई।

श्रीगणेश से जुडी एक कथा श्रीकृष्ण की भी है। जब सत्राजित ने समयान्तक मणि की चोरी का आरोप श्रीकृष्ण पर लगाया तब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि आपने अशुभ मुहूर्त में चंद्रदेव के दर्शन किये थे जिस कारण आप पर चोरी का आरोप लगा है। तब श्रीकृष्ण ने इसका रहस्य जानना चाहा। तब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि श्रीगणेश ने चंद्रदेव की धृष्टता के कारण उन्हें क्षय होने का श्राप दिया था और ये भी कहा था कि उस समय जो भी मनुष्य चंद्र के दर्शन करेगा, उसका भी अनिष्ट होगा। तब श्रीकृष्ण ने विधिवत रूप से गणेश चतुर्थी के दिन श्रीगणेश की पूजा की और उनकी कृपा से अंततः वे समयान्तक मणि को वापस पाने में सफल रहे।

गणेश चतुर्थी का ऐतिहासिक महत्त्व भी है। सन १८९२ तक गणेश चतुर्थी का आयोजन इतने वृहद् रूप में नहीं होता था। लोग अपने घरों में ही श्रीगणेश का पूजन किया करते थे। किन्तु फिर अंग्रेज सरकार का अत्याचार देख कर श्री बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी को अंग्रेजी सरकार के विरोध में वृहद् और सार्वजानिक रूप मानाने का निश्चय किया। इस प्रकार १८९२ में प्रथम बार बॉम्बे (आज का मुंबई) में प्रथम बार इतने वृहद् स्तर पर गणेश चतुर्थी का आयोजन किया गया जो आज तक बिना रुके चल रहा है।

श्रीगणेश को समर्पित ये १० दिन हमारे पापों का नाश करती है और आपसी सद्भाव को बढाती है। हमारे देश में आपसी सद्भाव का ऐसा अद्भुत संगम विरले ही देखने को मिलता है। आइये इस गणेश चतुर्थी को हम अपनी आंतरिक शुद्धि का संकल्प लें और आपसी सद्भावना को बढ़ाएं। गणपति बप्पा मोरया।

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