2 सितंबर 2019

गणेश चतुर्थी - १

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें। गणेश चतुर्थी श्रीगणेश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्द पर्व है जिसे पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। विशेषकर महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इस पर्व की बहुत अधिक मान्यता है और वहाँ इस उत्सव को भव्य रूप से १० दिनों तक मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को महाचतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन श्रीगणेश का जन्म हुआ था और दुर्भाग्य से इसी दिन उनकी मृत्यु भी हो गयी थी। बाद में भगवान शंकर की कृपा से इसी दिन उन्हें जीवनदान भी प्राप्त हुआ। यही कारण है कि इस पर्व का इतना अधिक महत्त्व है।

वैसे तो श्रीगणेश के जन्म की कथा सब को पता है पर यहाँ संक्षेप में उसके बारे में बताते हैं। कहते हैं कि एक बार माँ पार्वती स्नान कर रही थी कि अचानक भगवान शंकर वहाँ आ गए। ये देख कर माता को बड़ी लज्जा आई और अगली बार उन्होंने नंदी को अपना द्वारपाल बना कर खड़ा कर दिया। जब महादेव वहाँ आये तो नंदी ने उनसे रुकने का अनुरोध किया पर भगवान शंकर नहीं माने और अंतःपुर में प्रवेश किया। जब माता पार्वती ने ये देखा तो उन्होंने सोचा कि एक ऐसे पुत्र की उत्पत्ति की जाये जो केवल उनका ही आदेश माने। 

तब उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की मूर्ति बनाई और फिर उसमे प्राण डाल दिए। उस महा-तेजस्वी बालक में अपनी माता को प्रणाम किया और उनसे पूछा कि उनका जन्म किस लिए किया गया है? तब माँ पार्वती ने उन्हें द्वारपाल नियुक्त किया और एक दिव्य दंड प्रदान किया और कहा कि चाहे कोई भी हो, उसे प्रवेश ना करने दिया जाये। थोड़ी देर बाद भगवान शंकर वहाँ आये किन्तु उन्हें ना पहचानते हुए उस बालक ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। इतने सुन्दर बालक को देख कर भगवान शंकर भी बड़े प्रसन्न हुए और इसी कारण उसपर बल का प्रयोग ना करते हुए वे वापस लौट गए। 

वापस जाकर उन्होंने नंदी, भृंगी आदि शिवगणों से कहा कि वे उस बालक को द्वार पर से हटा दें। शिवगण उस बालक के पास पहुँचे और उसे प्रेमपूर्वक समझाना चाहा किन्तु वो द्वार छोड़ने को तैयार ना हुआ। तब महादेव के क्रोध के भय से शिवगणों ने उसे बलपूर्वक हटाना चाहा किन्तु उस बालक की शक्ति के आगे उनकी एक ना चली। सारे परास्त होकर वापस भगवान शंकर के पास लौटे। तब महादेव की प्रेरणा से ब्रह्मदेव और नारायण वहाँ आये और उस बालक को समझाने का प्रयास किया। किन्तु अपने बल का ज्ञान होने और अपनी माता के आदेश के कारण उसने ब्रह्मदेव और भगवान विष्णु पर ही प्रयास कर दिया।

ब्रह्मदेव और श्रीहरि ने उसे बालक समझ कर उसपर प्रहार नहीं किया किन्तु उसकी ये धृष्टता देखकर महादेव को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने अंतिम बार उस बालक को समझाना चाहा किन्तु उसने अपने दंड से महादेव पर ही प्रहार कर दिया। इससे क्रोधित होकर भगवान रूद्र ने उसका सर काट डाला और वहाँ से चले गए। जब देवी पार्वती बाहर आई तो अपने पुत्र का शव देख कर विलाप करने लगी। उन्होंने भी अपना रौद्ररूप धरा और पृथ्वी के संहार को तत्पर हो गयी। उनका ये रूप देख कर देवता भयभीत हो गए। 

तब भगवान शिव ने उन्हें समझने का प्रयास किया तो उन्होंने कहा कि जब तक उसका पुत्र जीवित नहीं होता तब तक वो उसी अवस्था में रहेंगी। अब उस बालक का शीश तो स्वयं महादेव के त्रिशूल से कटा था अतः उसे वापस नहीं लगाया जा सकता था। तब भगवान शंकर के आदेश से शिवगणों एक शिशु गज का शीश कैलाश लेकर आये जिसे जोड़कर उस बालक को जीवित किया गया। तब उस बालक को "गजानन" नाम दिया गया और सभी देवताओं ने उन्हें कई अवतार दिए। भगवान शंकर ने उसे सभी शिवगणों का अधिपति बनाया इसी कारण उसका एक नाम "गणेश" भी पड़ा। इसी दिन से गणेश चतुर्थी मानाने का आरम्भ हुआ।

एक बात विशेष रूप से ध्यान रखने वाली है कि श्रीगणेश की पूजा का मुहूर्त हर महीने की चतुर्थी तिथि को आता है। अर्थात एक वर्ष में १२ बार गणेश जी की पूजा की जाती है। इसे "विनायक चतुर्थी" के नाम से जाना जाता है। किन्तु इन सभी विनायक चतुर्थी में भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है क्यूंकि इसी दिन श्रीगणेश का जन्म हुआ था। इसी कारण इसे विनायक चतुर्थी ना कहकर "गणेश चतुर्थी" कहा जाता है। तो वर्ष में ११ विनायक और १ गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। उदाहरण के लिए जैसे आज २ सितम्बर को गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है उसी प्रकार अगले महीने २ अक्टूबर को विनायक चतुर्थी मनाई जाएगी।

गणेश चतुर्थी को १० तक मानाने और उसके बाद श्रीगणेश का विसर्जन करने के पीछे भी एक कथा है। साथ ही साथ श्रीकृष्ण के द्वारा भी गणेश चतुर्थी के व्रत करने का वर्णन आता है। इसके अतिरिक्त श्रीगणेश के जन्म की अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं जो गणेश चतुर्थी से जुडी हैं। पहले गणेश चतुर्थी केवल घरों तक सीमित थी किन्तु बाद में इस सार्वजानिक रूप से मानाने का भी एक विशेष कारण था। इसके बारे में इस श्रृंखला के अगले लेख में जानकारी दी जाएगी। जय श्रीगणेश।

...शेष

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