20 सितंबर 2019

दिक्पाल - १

दिशाओं के विषय में सबको पता है। हमें मुख्यतः ४ दिशाओं के बारे में पता होता है जो हैं पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण। वैज्ञानिक और वास्तु की दृष्टि से ४ और दिशाएं है जो इन चारों दिशाओं के मिलान बिंदु पर होती हैं। ये हैं - उत्तरपूर्व (ईशान), दक्षिणपूर्व (आग्नेय), उत्तरपश्चिम (वायव्य) एवं दक्षिणपश्चिम (नैऋत्य)। तो इस प्रकार ८ होती हैं जो सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

इसके अतिरिक्त उर्ध्व (आकाश) एवं अधो (पाताल) को भी दो दिशाएं मानी जाती है। तो दिशाओं की संख्या १० हुए। अंततः जहाँ हमारी वर्तमान स्थिति होती है उसे मध्य दिशा कहते हैं। इस प्रकार दिशों की कुल संख्या ११ होती है। किन्तु इनमे से भी १०, उनमे से ८ एवं उनमे से भी ४ दिशाओं का विशेष महत्त्व है।

पुराणों के अनुसार सृष्टि के आरम्भ से पहले जब महाब्रह्मा तपस्या से उठे और उन्होंने सृष्टि की रचना का विचार किया तब उनके कर्णों से १० कन्याओं की उत्पत्ति हुई। इनमें से ६ मुख्य एवं ४ गौण कन्याएं थी। उन सभी कन्याओं ने परमपिता को प्रणाम किया और उनसे याचना की कि वे उनके रहने का स्थान निश्चित करें और उन्हें योग्य जीवनसाथी भी प्रदान करें।

तब ब्रह्मदेव ने कहा कि वे जिधर भी जाना चाहें वहाँ जा सकती हैं। वही उनका निवास स्थान होगा। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अभी सृष्टि का आरम्भ नहीं हुआ है इसी कारण कुछ समय बाद वे उन सब के लिए योग्य पति की भी सृष्टि करेंगे। ऐसा सुनकर वे सभी कन्यायें अलग-अलग स्थानों पर चली गयीं और उससे ही वे स्थान "दिशाएं" कहलायी। वे १० कन्यायें थीं:
  1. पूर्वा - जो पूर्व दिशा कहलाई। 
  2. आग्नेयी: जो आग्नेय दिशा कहलाई। 
  3. दक्षिणा - जो दक्षिण दिशा कहलाई। 
  4. नैऋती - जो नैऋत्य दिशा कहलाई। 
  5. पश्चिमा - दो पश्चिम दिशा कहलाई। 
  6. वायवी - जो वायव्य दिशा कहलाई। 
  7. उत्तरा - जो उत्तर दिशा कहलाई। 
  8. ऐशानी - जो ईशान दिशा कहलाई। 
  9. ऊर्ध्वा - जो उर्ध्व दिशा कहलाई।
  10. अधस्‌ - जो अधो दिशा कहलाई। 
उसके पश्चात ब्रह्मदेव ने आठ दिशाओं के लिए ८ देवताओं का निर्माण किया और उन कन्याओं को पति के रूप में समर्पित किया। ब्रह्मदेव ने उन सभी को "दिक्पाल" की संज्ञा दी जिसका अर्थ होता है दिशाओं के पालक। ये आठ दिक्पाल हैं:
  1. पूर्व के इंद्र 
  2. आग्नेय के अग्नि 
  3. दक्षिण के यम 
  4. नैऋत्य के सूर्य
  5. पश्चिम के वरुण
  6. वायव्य के वायु
  7. उत्तर के कुबेर
  8. ईशान के सोम
अन्य दो दिशाओं अर्थात उर्ध्व में ब्रह्मदेव स्वयं चले गए और अधो (पाताल) में उन्होंने अनंत (शेषनाग) को प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार सभी १० दिशाओं को उनके दिक्पाल मिले।

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