28 सितंबर 2019

महर्षि भृगु - १

पुराणों में महर्षि भृगु के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। ये भारतवर्ष के सर्वाधिक प्रभावशाली, सिद्ध और प्रसिद्ध ऋषियों में से एक है। ये परमपिता ब्रह्मा और महर्षि अंगिरा के छोटे भाई थे और वर्तमान के बलिया (उत्तरप्रदेश) में जन्मे थे। ये एक प्रजापति भी हैं और स्वयंभू मनु के बाद के मन्वन्तरों में कई जगह इनकी गणना सप्तर्षियों में भी की जाती है। इनके वंशज आगे चल कर भार्गव कहलाये और उनसे भी भृगुवंशियों का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण के छठे अवतार श्री परशुराम भी इन्ही के वंश में जन्मे और भृगुवंशी कहलाये।

ये ज्योतिष शास्त्र के महान ज्ञाता माने जाते हैं और आधुनिक ज्योतिष शास्त्र के यही जनक है। इन्होने प्रसिद्द "भृगु संहिता" की रचना की जो ज्योतिष शास्त्र की सर्वोत्तम कृति मानी जाती है। मनु स्मृति में इस बात का वर्णन है कि महर्षि भृगु स्वयंभू मनु के मित्र एवं सलाहकार थे। ये भी कहा गया है कि मनुस्मृति की रचना करने के समय इन्होने मनुदेव की बड़ी सहायता की थी। इन्होने पहले अपने आश्रम की स्थापना वर्तमान के हरियाणा और राजस्थान के सीमा पर की थी। स्कंदपुराण के अनुसार बाद में अपना नया आश्रम वर्तमान भरुच (गुजरात) में नर्मदा नदी के तट पर बनाया।

महर्षि भृगु का पहला विवाह दैत्यराज हिरण्यकशिपु की पुत्री "दिव्या" (इन्हे काव्यमाता भी कहा जाता है) से हुआ जिनसे उनके दो पुत्र हुए - "काव्य शुक्र" एवं "त्वष्टा विश्वकर्मा"। इनके पहले पुत्र महान ज्ञानी हुए और अपने पिता की भांति ही ज्योतिष और खगोल शास्त्र के बहुत बड़े विद्वान बने। अपने मातृकुल में इन्हे आचार्य की उपाधि मिली और वे शुक्राचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। दैत्यराज के अनुरोध पर इन्होने दैत्यगुरु की उपाधि ग्रहण की। देवताओं के गुरु बृहस्पति से इनकी चिर-प्रतिद्वंदिता रही। ये भगवान शंकर के अनन्य भक्त थे और उन्होंने उनकी घोर तपस्या कर उनसे मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त कर ली जिससे वे युद्ध में मरे सैनिकों को पुनर्जीवित कर देते थे। इनके कारण ही दैत्य साम्राज्य विनाश से बचा रहा। इनकी पुत्री देवयानी बाद में ययाति से ब्याही गयी और उन्ही से समस्त राजकुल चले।

महर्षि भृगु के दूसरे पुत्र सर्वोत्तम शिल्पी थे। उनके नाम की भांति ही उनकी निपुणता भी देव विश्वकर्मा के समान ही थी। जिस प्रकार विश्वकर्मा देवताओं के प्रधान शिल्पी थे, उसी प्रकार त्वष्टा विश्वकर्मा भी दैत्यों के प्रधान शिल्पी बने और जगत में मय के नाम से प्रसिद्द हुए। आगे चल कर इन्ही की पुत्री मंदोदरी राक्षसराज रावण से ब्याही गयी। महाभारत में युधिष्ठिर के इंद्रप्रस्थ नगर का निर्माण भी इन्होने ही किया था। 

महर्षि भृगु का दूसरा विवाह दानव अधिपति पुलोम की पुत्री "पौलमी" से हुआ। उनसे इन्हे दो पुत्र प्राप्त हुए जो आगे चलकर महान ऋषि बने। इनके पहले पुत्र का नाम "च्यवन" जो औषधिशास्त्र के महान ज्ञाता थे। इसका ज्ञान उन्हें अश्विनीकुमार से प्राप्त हुआ था जो उनके गुरु थे। यज्ञ में इंद्र द्वारा अश्विनीकुमारों को अपमानित करने के लिए उन्होंने भयानक कृत्या को उत्पन्न कर इंद्र का गर्व भंग किया था।

इनके दूसरे पुत्र ऋषियों में श्रेष्ठ ऋचीक हुए। ये अपने पिता के समान ही तेजस्वी और सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। इन्ही ऋचीक के पुत्र महर्षि जमदग्नि हुए जिन्होंने हैहय वंशी राजाओं के कुलगुरु का स्थान संभाला। महर्षि जमदग्नि के सबसे छोटे पुत्र राम के रूप में भगवान विष्णु ने अवतार लिया जो आगे चलकर परशुराम के नाम से विख्यात हुए। इस प्रकार परशुराम के रूप में श्रीहरि ने स्वयं महर्षि भृगु के कुल में ही जन्म लिया।

महर्षि भृगु का तीसरा विवाह प्रजापति दक्ष और मनुकन्या प्रसूति की पुत्री "ख्याति" से हुआ। ख्याति से इन्हे "धाता" एवं "विधाता" नामक दो पुत्र एवं "लक्ष्मी" नामक एक पुत्री प्राप्त हुई। लक्ष्मी का ही एक और नाम श्री था और उन्होंने नारायण को अपने पति के रूप में चुना। इस प्रकार महर्षि भृगु भगवान विष्णु के श्वसुर भी बन गए। बाद में त्रिदेवों की परीक्षा लेने के प्रयास में इन्होने श्रीहरि विष्णु के वक्ष पर अपने पैरों से प्रहार किया। इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। 

...शेष

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें