10 सितंबर 2019

सोलह सिद्धियाँ - २

पिछले लेख में आपने इन १६ सिद्धियों में से पहली आठ सिद्धियों के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम अगली ८ सिद्धियों के विषय में जानेंगे।

९. देवक्रियानुदर्शन: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक विभिन्न देवताओं का सानिध्य प्राप्त कर सकता है। यही नहीं वो देवताओं को अपने अनुकूल बना कर उनसे उचित सहयोग ले सकता है। हमारे पुराणों में कई महान ऋषि हुए हैं जो अपनी इच्छा अनुसार देवताओं से मिल सकते हैं। दुर्वासा, भृगु, वशिष्ठ इत्यादि ऐसे कई ऋषि इसके उदाहरण हैं।

१०. कायाकल्प: कायाकल्प का अर्थ होता है "शरीर परिवर्तन"। इस सिद्धि को पूर्ण रूप से प्राप्त करने के बाद सहक कभी बूढा नहीं होता। यदि उसका शरीर वृद्ध एवं जर्जर भी है तब भी इस सिद्धि के बल पर वो पुनः अपने आप को युवा बना सकता है। ऐसे कई ऋषि थे जिन्होंने अपने वृद्ध आयु को छोड़ कर यौवन को पुनः प्राप्त किया। कई ऐसे ऋषि हैं जो अजर हैं, अर्थात जिनपर बुढ़ापे का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

११. सम्मोहन: ये बहुत प्रसिद्ध सिद्धि है जिससे साधक किसी को भी अपने अनुकूल कर सकता है और उनसे जो भी चाहे वो करवा सकता है। मनुष्य तो मनुष्य, इस सिद्धि को प्राप्त साधक पशु-पक्षियों को भी अपने अनुकूल कर सकता था। इसे वशीकरण विद्या भी कहते हैं। रावण वशीकरण विद्या में माहिर था। नाग जाति के लोगों में स्वाभाविक रूप से समोहन की सिद्धि होती थी। यहाँ तक कि आधुनिक काल में भी ऐसे कई कई सिद्ध पुरुष हुए हैं जो किसी को भी सम्मोहित कर सकते थे।

१२. गुरुत्व: गुरुत्व सिद्धि प्राप्त होने पर मनुष्य गरिमावान हो जाता है। प्राचीन का काल में गुरु का पद अत्यंत महान माना जाता था। यहाँ तक कि ये कहा गया है कि गुरु ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर के सामान है। देवताओं के गुरु बृहस्पति एवं दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को सर्वश्रेष्ठ गुरु के रूप में मान्यता प्राप्त है। उनके अतिरिक्त वशिष्ठ, परशुराम एवं द्रोण के गुरुत्व की भी बहुत ख्याति है। भगवान शंकर को जगतगुरु कहा गया है।

१३. पूर्ण पुरुषत्व: इस सिद्धि को प्राप्त कर साधक बचपन में भी अपने पूर्ण पुरुषत्व एवं शक्ति को प्राप्त कर सकता है। श्रीराम एवं श्रीकृष्ण में ये सिद्धि बाल्यकाल से ही विद्यमान थी। इसी सिद्धि के बल पर श्रीकृष्ण ने बचपन में ही पूतना, भौमासुर इत्यादि कई दैत्यों का वध कर दिया। १६ वर्ष की आयु में ही उन्होंने चाणूर, मुष्टिक एवं कंस जैसे महावीरों का वध कर दिया। पांडवों में भीम के पास भी ये सिद्धि थी। यही कारण था कि वे अपने बाल्यकाल में भी अपराजेय थे। श्रीराम के पुत्र लव और कुश ने भी इसी सिद्धि के बल पर अपने बचपन में ही पूरी अयोध्या की सेना को परास्त कर दिया।

१४. सर्वगुणसंपन्न: कुछ ऐसे उत्तम पुरुष होते हैं जिनमे संसार के सभी उत्कृष गुण समाहित होते हैं। ऐसे व्यक्ति को सर्वगुणसम्पन्न कहा जाता है। श्रीराम इस के सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। संसार में ऐसा कोई भी उत्तम गुण नहीं था जो उनमे नाम हो। इसीलिए श्रीराम को "पुरुषोत्तम" कहा जाता है। कई ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जिनमे ये सिद्धि थी। सीता एवं द्रौपदी ऐसी ही स्त्रियाँ थी जो सर्वगुणसम्पन्न थी। इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक की प्रसिद्धि पूरे विश्व में फ़ैल जाती है और वो अपने इन गुणों का प्रयोग लोक कल्याण के लिए करते हैं।

१५. इच्छा मृत्यु: जैसा कि इसके नाम से पता चलता है, इस सिद्धि को प्राप्त साधक अपनी इच्छानुसार अपनी मृत्यु का चुनाव कर सकता है। अर्थात उनकी इच्छा के बिना स्वयं काल भी उन्हें छू नहीं सकता है। यही नहीं, वो अपनी इच्छा अनुसार एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण कर सकता है। इच्छा मृत्यु की सिद्धि प्राप्त व्यक्तियों में सबसे प्रसिद्ध पितामह भीष्म हैं। उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था। वे वैसे ही एक अजेय योद्धा थे और उनकी इच्छा मृत्यु की सिद्धि के कारण उनकी मृत्यु और पराजय असंभव थी। यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को स्वयं पितामह से उनकी मृत्यु का उपाय पूछने को कहा। जब अर्जुन ने उन्हें अपने बाणों की शैय्या पर बांध दिया तब अपनी इसी सिद्धि के बल पर भीष्म युद्ध के पश्चात भी उसी शर-शैय्या पर ५८ दिनों तक जीवित रहे थे। उसके बाद जब भगवान सूर्य नारायण उत्तरायण को आये, भीष्म ने अपनी इच्छा अनुसार अपने शरीर का त्याग कर दिया।

१६. अनुर्मि: इस सिद्धि को प्राप्त व्यक्ति पर सृष्टि की किसी भी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसा व्यक्ति भूक-प्यास, सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, भावना-दुर्भावना इत्यादि से परे होता है। उसके लिए जीवन एवं मृत्यु सामान होती है और संसार के सभी योनि के जीव उनके लिए सामान होते हैं। जो सिद्ध पुरुष ईश्वर का वास्तविक स्वरुप जान लेते हैं वो स्वाभाविक रूप से इस सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ने भी गीता में अर्जुन को इस ज्ञान को देने का प्रयास किया है।

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